ताज़ा खबर
 

कहानी: लखोटिया साहब

लखोटिया साहब एकदम परफेक्ट थे। वे हर किसी से उसी तरह परफेक्शन चाहते। वे आॅफिस भी आते एकदम टिपटाप होकर। संजय गौतम का लेख।
Author नई दिल्ली | November 5, 2016 23:57 pm
प्रतीकात्मक तस्वीर।

संजय गौतम

एक थे लखोटिया साहब। कहते हैं कि लखोटिया साहब जब आॅफिस की गैलरी में चलते थे तो उनके जूते की चमक गैलरी की दीवारों पर पड़ती थी और आंखे वैसे ही चुंधियाती थीं जैसे शीशे की रोशनी में चुंधियाती हैं। खट-खट करते हुए साहब किसी भी आॅफिस में पहुंच जाते थे। जिस आॅफिस में पहुंचते थे, हड़कंप मच जाता था। सारे कर्मचारी हड़बड़ा कर खड़े हो जाते। अपना-अपना कागज-पत्तर संभालने लगते। लखोटिया साहब चिल्ला-चिल्ला कर पूछना शुरू करते। यह काम कैसे हो रहा है, वह काम कैसे हो रहा है। क्या कर रहे हो तुम लोग। सब एकदम बेबकूफ हैं। कुछ करना ही नहीं चाहते।  लखोटिया साहब पूछते रहते, चिल्लाते रहते, चीखते रहते।लेकिन क्या मजाल कि कोई बोल दे, कोई किसी सवाल का जवाब दे दे।अंत में वे बोलते-बोलते वापस चले जाते। उनकी सांसें तेज धड़कने लगतीं। वे चेंबर में जाकर बैठ जाते, तब लोग राहत महसूस करते और अपना-अपना काम शुरू करते।

लखोटिया साहब एकदम परफेक्ट थे। वे हर किसी से उसी तरह परफेक्शन चाहते। वे आॅफिस भी आते एकदम टिपटाप होकर। उन्हें कभी किसी ने बिना टाई के नहीं देखा, कभी बिना मैचिंग के शर्ट-पैंट पहनते नहीं देखा। जाड़े के दिनों में कभी बिना सूट के नहीं देखा। जूते हमेशा चमचमाते रहते थे। बाल हमेशा करीने से कढ़े हुए। वे अपने चेंबर में बैठें तो घड़ी मिला लीजिए, ठीक नौ पर सुई अटकी हुई मिलेगी।इसके लिए उन्होंने अपने ड्राइवर को कह रखा था। ठीक पौने नौ बजे उन्हें नॉक करने के लिए। न एक मिनट इधर, न एक मिनट उधर। ड्राइवर ठीक पौने नौ बजे नॉक करता। साहब तैयार मिलते। आकर गाड़ी में बैठ जाते। ठीक नौ बजे साहब चेंबर में। जाने का कोई भरोसा नहीं। जब तक साहब एक-एक फाइल निबटा नहीं लेते, तब तक आॅफिस नहीं छोड़ते। रोज का काम रोज। क्या मजाल कि कोई अधिकारी साहब से बिना टाइम लिए हुए मिल ले। उनके पीएस को निर्देश था। किसी को भी बिना एप्वाइंटमेंट के मत भेजो। मिलना है तो पहले कागज पर नाम और काम लिख कर भेजिए। समय तय किया जाएगा, तो मिलने आइए। तय समय से एक मिनट की देरी हुई तो चेंबर में घुसते-घुसते ही डांट सुनिए देरी के लिए। इसी डांट में लोग काम की बात भूल जाते थे।

‘क्या काम था?’
‘कुछ नहीं साहब ऐसे ही।’
‘कुछ नहीं, क्या फालतू मिलने के लिए बैठे हैं?’
‘हां साहब, जरा इस फाइल के बारे में बात करनी है।’
‘क्या बात करोगे तुम, जब तुम्हें ठीक से याद नहीं?’
‘याद है साहब, जरा-सा यह देख लीजिए।’
‘क्या देख लें, ले आओ इधर।’
‘पूरा पढ़े हो फाइल, क्या लिखा है इसमें?’
‘पढ़ चुका हूं सर, लेकिन ई लेटर जरा आप देख लें।’
‘इसमें क्या करूं सर?’

‘जाओ पहले स्टडी करो, ब्रीफ बनाओ, तब बात करो मुझसे, फालतू समय नहीं है मेरे पास।’
‘अधिकारी हड़बड़-हड़बड़ फाइल उठाते और चेंबर से बाहर हो जाते।’
हर आदमी के पास एक किस्सा है साहब का।

कहते हैं, जब पहले ही दिन ज्वाइन किया साहब ने इस आॅफिस में, तो तुरंत एक मीटिंग बुलाई। सभी अधिकारियों को बुलाया।
मीटिंग में आए तो सबसे पहले टेबल के नीचे के स्पेस की हल्की-सी धूल पर निगाह गई उनकी।
साहब गरजे, ‘किसकी जिम्मेदारी है, काल हिम राइट नाऊ, हू इज रिस्पांसिबल, आइ वार्न, यह सब नहीं चलेगा। सस्पेंड कर दो उसे।’
मीटिंग के दौरान ही किसी का मोबाइल बज गया।

‘स्विच आफ योर मोबाइल आल आॅफ यू, आई नेवर रिपीट इट ऐंड आइ कांट बियर इट।’
‘प्लीज कीप इट इन साइलेंस मोड।’
तब से आज तक उनकी मीटिंग में मोबाइल नहीं बजा।
एक बार साहब बीमार पड़े। डॉक्टर ने कहा, ‘तीन-चार दिन आराम कर लीजिए सर।’ ‘क्या बोल रहे हो, आराम कर लें। ऐसी दवा दो कि दफ्तर चलें, फुरसत कहां है।’
डॉक्टर ने दे दी दवा।
दवा खाकर साहब चेंबर में।

साहब पर दवा का असर पुरजोर था। उनकी आंखें भारी थीं। जैसे लगता था झपकी आ रही हो। लेकिन बार-बार घंटी बजती थी। सुरेश घंटी सुन कर जब अंदर जाता, साहब नींद से उठते हुए लाल आंखों से गुरार्ते, फलाने को बुलाओ।
साहब ने खूब सबको बुलाया।
बार-बार चाय पी, सिगरेट पी।
लेकिन आराम करने घर नहीं गए।
एक दिन सुबह-सुबह ही चेंबर में जाने से पहले वे एक आॅफिस में घुस गए। आॅफिस के बड़े बाबू आकर अपनी कुर्सी पर बैठे ही थे। दो-तीन कर्मचारियों के अलावा आॅफिस खाली ही था।
‘कौन हो तुम?’
‘बड़े बाबू, साहब।’
‘पूरा आॅफिस क्यों नहीं आया।’
बड़े बाबू चुप।
‘बोलो क्यों नहीं आया।’
बड़े बाबू चुप।

‘रिमूव कर दूंगा तुम्हें, नौकरी करने की जरूरत नहीं।’ लखोटिया साहब गरजते हुए चले गए। बड़े बाबू थऊस कर अपनी कुर्सी पर बैठ गए। जिंदगी भर समय से आने और जाने का फर्ज निभाया था उन्होंने। इन कर्मचारियों के आगे उन्हें सुनना पड़ा। बड़े बाबू बीमार पड़ गए, वालंटरी ले लिया। लोग कहते हैं इसी शॉक में उनकी जान चली गई। साहब के परफेक्शन से आॅफिस ऐसा परफेक्ट हो गया कि जब साहब मेन गेट से अंदर खट-खट करते हुए घुसते, तो किनारे-किनारे लोग खड़े हो जाते।साहब को जोरदार नमस्ते करते। साहब हल्के से हाथ उठाते और गर्दन जरा-सा हिलाते दाहिनी ओर। इतने लोगों को अपने से पहले आया देख कर साहब खुश हो जाते। जिसको साहब ठीक से देख लेते, वह उस दिन गद्गद् रहता। उसे लगता, वह सबसे पक्का कर्मचारी है और साहब इस बात को जानते हैं।  साहब की प्रतिष्ठा बढ़ने लगी। सब लोग साहब-साहब कहने लगे। चेंबर में बैठे-बैठे भी साहब को अपनी जयकार की गूंज कानों में सुनाई देती। आखिर ठीक कर दिया उन्होंने सबको। कितनी मेहनत करनी पड़ती है ठीक करने में। साहब ने इस आॅफिस को सुधार दिया। विकास के खूब काम कराए।
आॅफिस के लिए ऐसा समर्पित कौन साहब होगा, जो बीमारी के वक्त भी आॅफिस में ही रहे। बीमारी तो छोड़िए साहब, जब उनकी मां मरी थीं तब भी वे दो दिन बाद दिल्ली वाले बड़े साहब के साथ मीटिंग निबटा कर ही गए थे।

इस मामले में वे किसी पर भरोसा नहीं करते थे। मीटिंग का सारा इंतजाम उन्होंने खुद देखा। दिल्ली वाले साहब के रहने का पूरा इंतजाम देखा। उनके लिए पार्टी आयोजित की। नाच-गाना हुआ। खाना-पीना हुआ। रात बारह बजे एक तरफ दिल्ली वाले बड़े साहब ने गाड़ी पकड़ी, दूसरी तरफ लखोटिया साहब ने अपने घर के लिए गाड़ी पकड़ी। पूरे आॅफिस के कर्मचारी दांत दबा कर रह गए। ऐसी नौकरी किस काम की साहब, सुरेश अब भी कहता है। ऐसा मान-सम्मान पाकर लखोटिया साहब यहीं से रिटायर हुए। इसी कुर्सी से रिटायर हुए। सुरेश बताता है, विदाई का दृश्य अद्भुत था साहब। लोगों ने लखोटिया साहब को माला-फूल से लाद दिया था। सब लोग उनकी तारीफ किए जा रहे थे। सभी लोग इस बात के लिए कृतज्ञ थे कि साहब ने उन्हें अनुशासन का पाठ पढ़ाया, साहब ने उन्हें समय की पाबंदी सिखाई, साहब ने उन्हें काम करने का तरीका सिखाया। सभी लोग इन बातों के लिए साहब का आभार प्रकट कर रहे थे और सेवानिवृत्ति के बाद भी अपने को साहब की सेवा के लिए प्रस्तुत कर रहे थे।

अंत में साहब बोलने के लिए खड़े हुए। अपनी गर्दन पर पड़ी माला का बोझ उतारा। सबके प्रति आभार जताया। कहा, उन्होंने जो कुछ किया, साहबी के चलते किया। साहब का गला भावुकता में थोड़ा भारी होने लगा था, लेकिन उन्होंने साहब की तरह उसे झटक दिया। झट से फिर एक बार आभार जताया और चलने को तत्पर हो गए।साहब यहीं से रिटायर हुए थे, इसलिए यहीं सेटल हुए। बाद में भी वे अपने काम के लिए आॅफिस आते रहे। लोग उन्हें हाथ उठा कर नमस्ते करते। वह पहले की तरह हाथ उठाते, गर्दन थोड़ी टेढ़ी करते। उनका हाथ उठने का और गर्दन टेढ़ी होने की अभ्यस्त हो गई थी। कोई दूर से आता हुआ दिखता। साहब को लगता नजदीक आकर नमस्ते करेगा। कई बार ऐसा भी होता कि उसके नमस्ते करने के पहले ही साहब का हाथ उठ जाता और गर्दन एक दिशा में झुक जाती।  ऐसा लगता साहब सभी को पहचानते हैं, इसलिए हर आदमी को आता देख उनकी गर्दन जवाब में झुकती, लेकिन कुछ लोग साहब को नहीं पहचानते, इसलिए बिना नमस्ते किए आगे बढ़ जाते।

इस तरह लखोटिया साहब को पहचानने वालों की संख्या कम होती गई। लेकिन सबके किए-अनकिए नमस्ते का जवाब देने के लिए लखोटिया साहब का हाथ लगातार उठता रहा, गर्दन लगातार झुकती रही। सुरेश कहता है, साहब की गरदन हरदम हिलती रहती थी। वह उस समय भी हिलती थी, जब सामने कोई नहीं आता हुआ दिखता था। ‘कुछ भी कहो यार, साहब थे बहुत कड़क और ईमानदार।’ सुरेश मुस्कुरा दिया, ‘हां, साहब, सब तो यही जानता है, लेकिन साहब बड़ी ऊंची चीज थे। अरे ऊ लखोटिया साहब थे। छोटी-मोटी मछली पर हाथ मार कर बस्सवाना नहीं चाहते थे। अपना रूतबा बना कर गड्ड माल लेते थे।’
‘धत, तू ऐसे ही कहता है। अरे नाहीं यार, तू ऐसे ही कहता है। छोड़ो ई सब, काम तो बहुत करते थे।’ ‘हां, काम के एतना माहिर कि रिटायरों होने पर उन्हें काम ही दिखता था।’ अरे तबै न मरले के बादौ उनकी आत्मा यहीं घूमती-फिरती रहती है, और कभी-कभी किसी की देह में उतर जाती है। ‘अरे ठीक कह रहा है सुरेशवा। ऊ चौकीदार बताय रहा था। कई बार उसने रात में लखोटिया साहब को आॅफिस में घूमते देखा है। सिर्फ घूमते नहीं कुर्सी पर बैठ कर काम करते भी देखा है। उनकी गर्दन बराबर हिलती रहती है।’  ‘ठीक कह रहा था चौकीदार, लखोटिया साहब कहीं गए नहीं है। दिन में ऊ पीपर पर बैठ कर आॅफिस को अगोरते हैं और रात में उतर कर सबका काम देख लेते हैं।’ ‘उन्हीं के परताप से ई आॅफिस हर्रऊल चल रहा है।’ ‘महेश हरकते हुए उठता है, चल ससुरा, तू लोग अपना काम करो। बेमतलब का अंडा मत उड़ाओ। हवा फैलाय रहे हो। अरे कई जनम लोगे तबौ न बन पाओगे लखोटिया साहब।’
‘तौ का न, लखोटिया साहब आखिर लखोटिया साहब थे।’ ०

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.