December 09, 2016

ताज़ा खबर

 

कहानी: कोयल

वह शराबी तो था ही, थोड़ा मंदबुद्धि भी था। सोचता, रात में दारू कुछ ज्यादा ही चढ़ गई। अभी तक खोपड़ी पर सवार है।

Author November 13, 2016 00:29 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

मोहन कुमार डहेरिया

सुधीर सुबह की सैर से लौट कर अभी घर में घुसा ही था कि रेवा ने उससे कहा- ‘कोई नई खबर सुनी?’
‘कौन-सी नई खबर?’ सुधीर थोड़ा चौंक कर बोला।
‘अरे नैनसुख सरकारी अस्पताल में भर्ती हैं। बहुत चोटें लगी हंै।’
‘कैसे?’ मेरा आश्चर्य यथावत था।
‘अब यह तो अस्पताल में जाकर ही पता लगेगा।’ कह कर रेवा नाश्ता लाने चली गई।
‘फिर भी… तुम्हारे महिला क्लब ने कुछ तो सुराग दिया होेगा।’
‘मैडम मैडम… मैडम गलती हो गई। ऐसा कुछ बड़बड़ा रहा था।’ कह कर रेवा नाश्ता लाने चली गई।

विद्यालय परिसर में रहने वाले सभी जानते थे कि विद्यालय का चपरासी नैनसुख नंबरी शराबी है। उसे छोटी-मोटी चोटें आए दिन लगती ही रहती हैं। शराब के नशे में वह कब कौन-सा कमाल दिखा देगा; कोई नहीं जानता था। एक बार तो वह खड़े ट्रक के नीचे से एक कुत्ते का पीछा करते हुए निकलने की कोशिश करने लगा। अच्छा हुआ ट्रक उस समय चालू नहीं हुआ। इसी तरह जब एक बार विद्यालय की प्राचार्य मैडम सुधा चौधरी ने उसे फीस जमा करने बैंक भेजा, तोे वह दारू भट््टी में जाकर बैठ गया। उसकी पत्नी बहुत सीधी और सुघड़ महिला थी। उसके पांच छोटे-छोटे बच्चे थे, इसलिए सब उसकी उल्टी-सीधी हरकतों को झेल जाते। पर, आज की घटना किसी बड़ी दुर्घटना की ओर संकेत कर रही थी। तभी तो वह मैडम… मैडम गलती हो गई बड़ाबड़ा रहा था। इन दिनों वैसे भी उस पर सुधा चौधरी का आतंक बहुत हावी था।

मैं सोचने लगा, सुधा चौधरी मैडम तक जब यह खबर पहुंचेगी तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी। क्या उनकी आंखों की सुर्खी में थोड़ी तरलता आएगी या उनके अंदर का इस्पात एक विकृत प्रसन्नता अनुभव करेगा। साढ़े नौ बजते ही विद्यालय के मुख्य द्वार पर लग जाने वाला ताला एक-दो मिनट भी विलंब से आने वाले कर्मचारियों के मुंह पर फिर से हथौड़े-सा तो नहीं पड़ेगा!

इसमें कोई शक नहीं, सुधा चौधरी मैडम के प्राचार्य के पद पर आने के पहले यह विद्यालय काफी बदनाम हो चुका था। विद्यालय के कर्मचारी समय पर नहीं आते थे। अधिकतर समय अध्यापक कक्ष या कैंटीन में गपशप करते। पढ़ाने के बजाय बच्चों से टयूशन में आने पर जोर देते। चपरासियों और बाबुओं का अधिकतर समय तंबाकू-खैनी खाने में गुजरता या इधर की बात उधर करने में समर्पित होता। सुधा चौधरी को इस विद्यालय को पटरी पर लाना ही था।
वैसे भी वे अपने शिक्षकीय जीवन से ही उसूलों वाली कड़कदार महिला थीं। नुकीली नाक, विस्फोटक गोरा रंग और लयबद्ध चाल से चलते हुए जब वे विद्यालय जाने के लिए निकलतीं तो एक अलौकिक-सा प्रभामंडल उसके चारों बन जाता। उनकी ठुड्डी पर उगा एकमात्र आधा काला, आधा सफेद बाल उनके खड़ूसपन को और अधिक धारधार बना देता। जाहिर है, विद्यालय जल्दी ही पटरी पर आ गया। सुधा चौधरी की कर्मठता, सिद्धांत प्रियता और बच्चों के प्रति जुनूनी लगाव ने विद्यालय के कर्मचारियों के मन में उनके प्रति एक खौफनुमा आदर पैदा कर दिया।

उनकी सख्ती की एक घटना तो अक्सर कई दिनों तक चटखारे लेकर सुनाई जाती रही। एक शिक्षिका थीं कल्पना स्वर्णकार। जब भी बच्चों को कहीं बाहर ले जाने की उनकी अनुरक्षक की ड््यूटी लगती, तो वे अक्सर गर्भवती होने का बहाना कर देतीं। बाद में फिर गर्भपात का प्रमाण-पत्र प्रस्तुत कर देतीं। बहाना करने के दौरान उनका पेट भी उभरा हुआ दिखाई देता। एक बार सुधा चौधरी ने महिला डॉक्टर और कुछ महिला शिक्षिकाओं को अपने कक्ष में बुलवा कर कल्पना स्वर्णकार के गर्भवती होने की जांच करानी शुरू कर दी। एक-एक करके कल्पना स्वर्णकार के पेट पर से बंधे कपड़ों की पट््िटयां गिरने लगीं। कल्पना मैडम के चरणों में गिर पड़ी। भोजनावकाश के दौरान फिर कई दिनों तक यह घटना कर्मचारियों के बीच चुटकुले की तरह सुनाई जाती रही।
‘अरे! आपने अभी तक चाय नहीं पी।’ रेवा की आवाज से मेरी स्मृतियों की शृंखला भंग हो गई। चाय ठंडी हो चुकी थी। मैंने जैसे-तैसे उसे सुड़का और तैयार होकर रेवा के साथ अस्पताल की ओर चल दिया। मेरा मन लेकिन रास्ते में भी सुधा चौधरी द्वारा रचे गए आतंक और उनके उसूलों की दुनिया से न हट सका।
सुधा चौधरी ने आते ही अपने कक्ष की घंटी बदलवा ली थी। उन्हें परानी घंटी की आवाज पसंद नहीं थी। नई घ्ांटी से कोयल की कुह… कुह… की हूबहू आवाज सुनाई देती। यहीं से नैनसुख की मुसीबतों का सिलसिला शुरू हो गया। जैसे ही उसे घंटी की कुह… कुह… की आवाज सुनाई देती; वह मैडम के कमरे में दाखिल होकर कहता- ‘जी मैडम आपने बुुलाया।’
‘क्या, जी मैडम!’ मैडम उसे घूरते हुए कहतीं।
‘आपने बुलाया है मैडम।’
‘मैंने! कब?’
‘अभी तो घ्ांटी से कुह… कुह… की आवाज आई थी।’
‘अरे मूर्ख, उधर आम के पेड़ पर कोई कोयल चहक रही है। घंटी की आवाज नहीं थी वह और सुन, अब दुबारा रात में शराब पिया तो पंखे से उल्टा लटका दूंगी।’
‘जी मैडम।’ नैनसुख शर्मिंदा होकर कहता।

वह शराबी तो था ही, थोड़ा मंदबुद्धि भी था। सोचता, रात में दारू कुछ ज्यादा ही चढ़ गई। अभी तक खोपड़ी पर सवार है। मैडम इतनी बड़ी अधिकारी हैं; झूठ कैसे बोल सकती हैं! फिर अक्सर यह होने लगा। घंटी की आवाज सुन कर वह जैसे ही मैडम के कमरे में पहुंचता तो मैडम उसे हड़का कर भगा देतीं। जब नहीं पहुंचता तो मैडम कमरे से बाहर निकल कर उस पर अंगारे बरसाने लगतीं। उसे हमेशा लगता, पूरे शहर में मैडम की सच्चाई और स्पष्टवादिता का डंका बजता है। उनको किसी भी तरह का भ्रम होने का सवाल ही नहीं उठता। वह ऐसी विकट स्थिति में खुद का माथा पीटने लगता। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास लड़खड़ाने लगा। मैडम और कोयल उसके दिमाग को एक मोटे रस्से में बांध कर अपनी अपनी तरफ खींचते महसूस होते। वह दोनों ही तरफ हमेशा घिसटते-घिसटते जाता। कई बार ठीक शौचालय के दरवाजे पर पहुंच कर ठिठक जाता। माथे पर बल डाल कर, शरीर की सारी इंद्रियों पर जोर डाल कर सुनने की कोशिश करते हुए शौचालय से बाहर निकलते दूसरे चपरासी से पूछता। ‘घंटी की आवाज आई क्या?’

‘हां आई है न। मैडम आरती की थाली लेकर खड़ी हैं। दौड़ कर पहुंच जाओ।’ दूसरा चपरासी व्यंग्य से मुस्करा कर कहता। नैनसुख बेहद निरीहता से उसे देखते हुए शौचालय में घुस जाता। विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाएं भी नोटिस लेकर आने पर उसे छेड़ने से बाज नहीं आते और उसके बौखलाने पर एक हिंसक ठहाका लगाते। मोहल्ले के बच्चे भी उसे देख कर जोर से कोयल की कुह… कुह… की आवाज निकालते और भीषण द्वंद्व से विकृत होते चेहरे को देख कर खूब मजा लेते। नैनसुख का माथा गरम होने लगता। वह कभी खिसयानी हंसी हंसता। कभी उन्हें मारने के लिए पत्थर ढूंढ़ने लगता।

कोयल ही नहीं, अन्य परिंदों की आवाजें भी उसके लिए अब एक भीषण संकट बन चुकी थीं। ये सारी आवाजें उसके कानों में गुत्थम गुत्था होकर घुसतीं। उन्हें अलग-अलग करने में उसके माथे पर पसीना छलछला जाता। जाहिर है, अब हर परिंदे को वह गौर से देखता। सुबह-सुबह खिड़की खोलते ही पेड़ों पर चहचहाती चिड़ियां भी कभी-कभी उसे अपने विरुद्ध षड्यंत्र करती हुई-सी लगतीं। एक बार उसकी पत्नी ने बताया था कि उसने अपने लड़के का मोबाइल गुस्से में इसलिए पटक कर तोड़ दिया था कि उसने उसमें कोयल की ट््यून डलवा ली थी। लोगों की संवेदनहीन हंसी-ठिठोली और सुधा चौधरी के पथरीले उसूलों ने उसे एक भयानक अंधेरी गुफा के अंदर बहुत दूर तक धकेल दिया।

आॅटो अस्पताल के कंपाउंड में आकर झटके से रुका तो सुधीर भी स्मृृतियों की दुनिया से बाहर निकल आया। जब रेवा और वह अंदर पहुंचे तो देखा नैनसुख के शरीर पर कई जगह बैंडिज बंधी हुई थी। उसकी पत्नी रो-रो कर कह रही थी, ‘देखिए न सर, कोई किसी को इस कदर डराता है क्या? इस कोयल ने तो इनका दिमाग ही खराब कर दिया है! आधी रात को शराब के नशे में स्कूल के बगीचे के पेड़ पर चढ़ कर उसे मारने की कोशिश कर रहे थे- सुरक्षा गार्ड जोर से चिल्लाया तो हड़बड़ा कर गिर गए और अब देखो…’ वह फफक-फफक कर रोने लगी। इतना सुनते ही वहां मौजूद स्टाफ के लोग सुधा चौधरी को गरियाने लगे। कुछ कर्मचारी अपनी आपबीती आक्रोश में बताने लगे, जिसे सुनते ही नैनसुख बार-बार कराह उठता।

तभी चमचमाती म्यान में से थकी हुई तलवार-सी निकली सुधा चौधरी ने प्रवेश किया और धीरे से बोली- ‘कैसे हो नैनसुख?’ इसके बाद वह हाथ में पकड़े थैले से सेब निकाल कर नैनसुख को दे ही रही थीं कि अचानक बाहर से कुह… कुह… की आवाज आने लगी। खिड़की के बाहर इधर भी आम के पेड़ थे और कोयल भी। नैनसुख हड़बड़ा कर उठ कर बैठ गया। उसके शरीर पर बंधी पट्टियों पर झटके से उठने के कारण तीन-चार जगह खून छलक आया। उसके मुंह से मुस्तैदी से निकला- ‘जी मैडम आपने बुलाया?’ सुधा चौधरी को हाई वोल्टेज का करंट लगा। उनके हाथ से सेब छिटक कर गिर गए। फटी-फटी आखों से वे नैनसुख को देखने लगीं, जबकि किसी की हिम्मत नहीं थी कि उन गिरे हुए सेबों को उठा कर तिपाई पर रख दे, मानो सेब सेब नहीं, तोप के गोले हों।

500, 1000 के नोट बदलवाने हैं? लोगों के पास आ रहीं ऐसी फ्रॉड काल्‍स

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on November 13, 2016 12:28 am

सबरंग