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मीशा की दावत

नन्ही मीशा सारे दिन खेलती है। पढ़ती है। कहानियां सुनती है। खुद बना-बना कर कहानियां सुनाती भी है। पर मम्मी जानती हैं कि उसके हर काम में एक खेल है।
Author July 16, 2017 05:12 am
प्रतीकात्मक चित्र।

प्रकाश मनु  

नन्ही मीशा सारे दिन खेलती है। पढ़ती है। कहानियां सुनती है। खुद बना-बना कर कहानियां सुनाती भी है। पर मम्मी जानती हैं कि उसके हर काम में एक खेल है। उसका पढ़ना एक खेल है, कहानियां बनाना भी, सुनाना भी। खेल और बातें, मीशा के पास इनका खजाना कभी खत्म ही नहीं होता।  अभी थोड़ी देर पहले की तो बात है। मीशा गली में साइकिल चला कर आई थी। आते ही बोली, ‘मम्मी-मम्मी, मेरी न साइकिल बहुत अच्छी है। ऐसी तेज चलती है कि पूछो मत। एकदम हवा में उड़ती है, मम्मी।… बस, मैं थोड़ी बड़ी हो जाऊं, फिर देखना, इसी साइकिल पर मैं पूरी धरती का चक्कर लगा कर आऊंगी।’ ‘हां, पर धरती बहुत बड़ी है बेटी। साइकिल चलाते-चलाते थक नहीं जाओगी?’ मम्मी ने मुस्कराते हुए कहा।
मीशा का जवाब था, ‘वाह मम्मी, इसमें क्या मुश्किल है? मेरी साइकिल पर पीछे कैरियर पर आप भी तो बैठोगी। मैं थकंूगी तो आप चला लेना मम्मी।… बस, धरती का पूरा राउंड लगा कर झटपट वापस आ जाएंगे।’ सुन कर मम्मी पेट पकड़ कर हंसने लगीं। पर तब तक मीशा की बातों का सिलसिला आगे चल पड़ा था। बोली, ‘मम्मी, जानती हो, रात मुझे क्या सपना आया? मैं स्कूल जा रही थी, तो मैंने देखा, जंगल वाला शेरू भी कंधे पर बस्ता टांगे मेरे साथ-साथ स्कूल जा रहा था।… शेरू भी हमारे साथ-साथ पढ़े तो कितना मजा आएगा न, मम्मी!’
‘बिल्कुल…!’ मम्मी ने मीशा की कहानी में रस लेते हुए कहा।मीशा बोली, ‘पर मम्मी, मैंने देखा कि शेरू थोड़ा डरा हुआ था। डर-डर के स्कूल जा रहा था। शेरू डरा हुआ क्यों था मम्मी?’

मम्मी ने कुछ सोच कर कहा, ‘हो सकता है, शेरू इसलिए डरा हुआ हो कि मैडम कहीं उसे डांट न लगा दें। शायद उसे होमवर्क करना याद न रहा हो।’ ‘हां मम्मी, बिल्कुल यही बात होगी।’ मीशा गंभीरता से सिर हिला कर बोली, ‘पर मैडम को शेरू को डांटना नहीं चाहिए न, मम्मी। आखिर वह जंगल का राजा जो है।… बेचारा धीरे-धीरे ही तो पढ़ना सीखेगा।’मम्मी ने बात टालने के लिए कहा, ‘हां, बात तो तेरी ठीक है मीशा।’पर मीशा इतनी जल्दी कैसे टल जाती? अब तक उसकी कल्पना पर पंख लग चुके थे। कुछ सोचते हुए बोली, ‘अच्छा मम्मी, अब के मुझे शेरू दिखाई दिया तो मैं उसे न, घर पर आऊंगी। आप मेरे साथ-साथ उसे भी मटर-पनीर की सब्जी खिलाना। खाकर उसका जी खुश हो जाएगा।’ ‘बात तो तेरी ठीक है मीशा, पर शेर की डाइट मालूम है, कितनी होती है? कोई मन भर मटर-पनीर तो उसे चाहिए कम से कम। और रोटियां? सौ-दो सौ। या हो सकता है, चार-पांच सौ। बनाते-बनाते मेरी तो आफत आ जाएगी।’ कहते-कहते मम्मी हंसीं तो साथ-साथ मीशा भी खिल-खिल-खिल करती हंस पड़ी। पर अगले ही पल उसे फिर से याद आ गया मटर-पनीर। यों भी उसे खाने में सबसे ज्यादा पसंद है मटर-पनीर की सब्जी। बोली, ‘मम्मी, आपने पिछली बार मटर-पनीर की सब्जी बहुत अच्छी बनाई थी। पर, अब कितने दिनों से तो बनाई ही नहीं है। आज फिर से बनाओ न, मम्मी!’ नन्ही मीशा की इस फरमाइश पर मम्मी निहाल हो गर्इं। हंसते-हंसते बोलीं, ‘तूने जब शेरू को मटर-पनीर की सब्जी खिलवाई न, बस तभी मैं समझ गई कि तेरे मन में क्या चल रहा है? ठीक है, तू चल मेरे साथ। अभी शर्मा अंकल की डेयरी से पनीर लेकर आते हैं।’

मीशा ने झटपट पैरों में चप्पल डाली। नन्ही-सी कंघी से बाल संवारे और झटपट तैयार होकर बोली, ‘चलो मम्मी, चलो। जल्दी चलो न शर्मा अंकल की डेयरी पर!’और जब मम्मी ने अपने मन का सारा प्यार उड़ेल कर नन्ही मीशा के लिए मटर-पनीर की सब्जी बनाई तो वह इतनी खुश थी, जैसे हवा में उड़ रही हो। कई बार मम्मी के पास आकर कटोरी भरवा कर ले गई। जरा-सा चखने के चक्कर में खाना खाने से पहले ही पूरी दो कटोरी सब्जी हप्प कर चुकी थी। और इतना ही नहीं, मीशा को मटर-पनीर की सब्जी इतनी अच्छी लगी कि यह बताने के लिए वह देर से घर के सब कमरों में उछलती फिर रही थी। और गा रही थी-

‘मेरी मम्मी अच्छी हैं, अच्छी हैं, अच्छी,
मेरे लिए बनाती हैं, मटर-पनीर की सब्जी,
खाकर शेरू का भी खुश हो जाता है जी,
सचमुच मम्मी अच्छी हैं, अच्छी हैं, अच्छी!’
थोड़ी देर बाद मीशा को याद आया, ‘अरे, मेरा तो पार्क में खेलने का टाइम हो गया! सब बच्चों ने कहा था, ‘मीशा, अपनी नीली वाली गेंद लाना। जमीन पर टप्पे मार कर गेंद लपकने वाला खेल खेलेंगे। जिसके ज्यादा नंबर आएंगे, वह जीतेगा।’
बस, याद आते ही उसने अपनी नीली गेंद उठाई और मम्मी को बता कर झट से झूला पार्क की ओर दौड़ पड़ी।
झूला पार्क की ओर दौड़ती हुई भी वह अभी तक गाना गा रही थी, ‘मेरी मम्मी अच्छी हैं, अच्छी हैं, अच्छी।…!’
मीशा के नन्हे मित्रों ने जब उसे यह अजीब-सा गाना गाते हुए देखा, तो बोले, ‘मीशा, तू तो गेंद का गाना गाती थी कि गेंद मेरी अच्छी है, पर आज यह कौन-सा अजीब गाना गाने लगी?’
मीशा खिल-खिल हंसती हुई बोली, ‘तुम नहीं समझोगे? यह मटर-पनीर का गाना है!’
मीशा की सहेलियों को बड़ा अजीब लगा। गुलाबी फ्रॉक वाली पिंकी चिढ़ कर बोली, ‘बनाती तो मेरी मम्मी भी बहुत सब्जियां कमाल की हैं, पर मैंने तो कभी ऐसा गाना नहीं गाया।’
मीनू ने भी अजीब-सा मुंह बना कर कहा, ‘हां भई, है तो बात सच्ची… सच्ची है सच्ची…!’
सुन कर सब जोर से हंस पड़े। मीशा समझ गई, मीनू समेत सभी उसका मजाक उड़ाने के मूड में हैं। पर उसने बुरा नहीं माना। बोली, ‘अगर तुम लोग कोई और गाना गाना चाहते हो, तो गाओ न! तुम्हें गाने से कौन रोकता है? वैसे एक बात बता दंू, तुम्हारी मम्मी और सब्जियां चाहे जैसी बनाती हों, पर मटर-पनीर की सब्जी मेरी मम्मी से अच्छी नहीं बना सकतीं। मेरी मम्मी की सब्जी तो बस कमाल है, कमाल!’
‘कमाल कि धमाल!’ मुटकी दिप्पी ने हंसते हुए पूछा।

मीनू गाल पर हाथ रख कर बोली, ‘ओ मीशा, ऐसे ही कमाल और धमाल करती रहोगी या खिलाओगी भी। हम भी जानें, तुम्हारी मम्मी कितनी अच्छी सब्जी बनाती है?’
‘तो चलो न! चलो मेरे घर, कोई तुम्हें रोक रहा है?’ मीशा ने कहा।
‘अरे, रहने दो। कहीं तुम्हारी मम्मी की बनाई सब्जी कम पड़ गई, तो बड़ी किरकिरी होगी तुम्हारी।’ अनु ने आखें नचा कर कहा।
इस पर मीशा का मुंह गुस्से से लाल हो गया। बोली, ‘नहीं जी नहीं, नहीं कम पड़ेगी। मेरी मम्मी ने बड़े वाले कुकर में सब्जी बनाई है। पूरा कुकर भरा पड़ा है। आओ, देख लो चल कर। आओ… आओ-आओ!’
मीशा ने दावत का निमंत्रण दिया तो उसके दोस्त और सहेलियां भी भला कैसे पीछे रहतीं? सब बोले, ‘चलो चलो, आज तो हम सब मीशा के घर चल कर दावत खाते हैं।’
थोड़ी ही देर में मीशा के साथ उसके सारे दोस्त घर में धड़धड़ाते हुए आ गए। देख कर मीशा की मम्मी बड़ी हैरान हुर्इं। और खुश भी हुर्इं। उन्होंने झट सबको फ्रिज का ठंडा-ठंडा पानी पिलाया। बिस्कुट-टॉफिया लाकर दीं और हंस-हंस कर बातें करने लगीं।
इतने में मीशा ने कहा, ‘मम्मी, जल्दी करो न, मेरे दोस्त दावत खाने आए हैं। ठंडा पानी तो आप बाद में भी पिला सकती हो और टॉफियां भी ये बाद में खा लेंगे। अभी जल्दी से इन्हें मटर-पनीर की सब्जी खिलाओ। मैंने बोला है कि मेरी मम्मी बहुत अच्छी मटर-पनीर की सब्जी बनाती हैं, तो ये सारे के सारे आ गए दावत पर।’
सुन कर मम्मी एक पल के लिए भौचक्की रह गर्इं। सोचने लगीं, ‘इस पूरी की पूरी बच्चा पार्टी को दावत खिलाऊंगी, तो भला घर के लिए क्या बचेगा? और फिर अकेली मटर-पनीर की सब्जी क्या खिलाई जाएगी! साथ में बच्चों के लिए छोटे-छोटे परांठे भी सेंक लूं।’
बस, इतनी देर में उन्होंने सब कुछ सोच लिया। हंस कर बोलीं, ‘तुम लोग बैठ कर बातें करो, मैं अभी दावत का इंतजाम करती हू।’
और उन्होंने झटपट रसोई में जाकर बच्चों के लिए खूब सारे नन्हे-नन्हे पराठे सेंक लिए। थोड़ा-सा आम और मिर्च का अचार भी निकाला। प्लेटों में मटर-पनीर की सब्जी डाली, फिर मीशा को बुला कर कहा, ‘अपने दो-तीन दोस्तों को बुला लो, जो यहां से थालियां लेकर जाएं।’
मीशा और उसकी तीन सहेलियां झटपट रसोई में पहुंची। उन्होंने सब बच्चों के आगे थालियां लाकर रखीं। और सचमुच ऐसी शानदार दावत हुई कि क्या कहने! बच्चों ने मटर-पनीर के साथ खस्ता पराठे इतने स्वाद से खाए कि देख-देख कर मीशा की मम्मी भी निहाल हो गर्इं।

फिर सारे बच्चे हाथों में टॉफियां लेकर उछलते-कूदते हुए पार्क में चले गए।
रात को मीशा के पापा दफ्तर से आए तो मम्मी ने मीशा के दोस्तों की दावत का पूरा किस्सा सुनाया। मम्मी के साथ-साथ पापा का भी हंसते-हंसते बुरा हाल था।
कुछ देर बाद मीशा झूला पार्क से खेल कर आई तो पापा ने उसे खूब प्यार किया। बोले, ‘क्यों बेटी, तुम्हारे दोस्तों को दावत कैसी लगी? क्या उन्हें तुम्हारी मम्मी के हाथ का खाना पसंद आया?’‘खूब…!’ मीशा शरमा कर बोली, ‘पापा, वे सब कह रहे थे कि मीशा-मीशा, तेरी मम्मी खाना सचमुच बड़ा टेस्टी बनाती है।’ ंंं ०

 

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