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शब्दभेदी- मुहल्ला और जी का जंजाल

जब मुगल वंश ही उजड़ने के कगार पर हो तब बहादुर शाह जफर का ‘जी’ उजड़े दयार में क्या लगता। ईमानदारी से कबूल कर दिया, लेकिन कुछ का तो लहलहाते चमन या भरी-पूरी बस्ती में भी नहीं लगता। कुछ हैं कि हर गली-मोहल्ले में अपना दिल ही बांटते फिरते हैं। कहीं टूटा तो कहीं और जोड़ लेते हैं
Author July 16, 2017 00:41 am
प्रतीकात्मक चित्र।

सुरेश पंत

बात मुहल्ले की
मोहल्ला/ मुहल्ला/ महल्ला के बारे में मेरे मित्रों की राय अलग-अलग है। शर्माजी कहते हैं, जहां मोहग्रस्त लोग हल्ला मचाएं वह मोहल्ला! जावेद मियां बोले, जहां मारे हल्ले के दो घड़ी शांति मिलना मुहाल हो वह मुहल्ला। इनकी पीड़ा मैं समझ सकता हूं, आखिर हूं तो उसी मुहल्ले का। लेकिन शब्द है तो उसका कोई स्रोत, कोई अर्थ होना चाहिए। इतना सतही अर्थ तो नहीं होगा।
मुझे याद आया, प्रो. चतुर्वेदी बड़ी शान से बताते हैं कि वे मथुरा के बड़े महाल के चौबे हैं! मुझे लगा महाल और महल में आपस में भाईचारा तो नहीं। महल यानी भव्यता और शानो-शौकत वाला विशाल भवन। पर इस महल शब्द के र्इंट-गारे का स्रोत क्या है?
संस्कृत में एक शब्द है महालय, जो दो शब्दों से बना है महा आलय (विशाल भवन)। तो यह व्युत्पत्ति आसान है महा+आलय > महालय > महाल > महल और महलों वाली बस्ती महल्ला। लेकिन संस्कृत कोष खोला तो लगा फिर बड़े इमामबाड़े की भूलभुलैया में फंस गए। आप्टे ने ‘महल्ल’ को संस्कृत महत् +ल से सिद्ध तो किया है, लेकिन इसे अरबी मूल का बताया। ‘महल्ल:’ का अर्थ दिया है महल, रनिवास और ‘महल्लक:’ कहा रनिवास में रहने वाले निरापद प्राणी खोजा को! लगा, यह भी ठीक है। इस्लामी युग में ऐसे बहुत से शब्द हिंदी के शब्दभंडार में जुड़े थे। बेगम हजरत महल या ऐसे और नाम भी याद आए जो महल वाले थे।
हम तो महल्ला खोज रहे थे। महल्ला क्या है? क्या महल्लकों (खोजाओं) की बस्ती? लेकिन अब रनिवास ही नहीं, तो उनकी बस्ती कहां! फिर हम भी तो रहते हैं किसी मुहल्ले में। हम मुहल्लेदार होते हैं, शादी ब्याह में मुहल्लेदारी निभाते हैं। यह व्युत्पत्ति कैसे स्वीकार करें।
मुझे हिंदी का एक मुहावरा याद आ रहा है, अमुक राजा ने इतने सैनिक लेकर ‘हल्ला बोल दिया।’ हल्ला बोलना अर्थात हमला करना। यह हल्ला तो अरबी ही है। अरबी में ‘मह्ल’ का अर्थ समूह है। समूह में हमले को निकलना था हल्ला बोलना। इसी ‘मह्ल’ से बना महल्ला > मुहल्ला > मोहल्ला। किसी समूह, जाति-बिरादरी की बस्ती। कालांतर मे यह कबीलों, खेमों के लिए भी प्रयुक्त हुआ।
इधर का हल्ला यूरोप, खासकर इंग्लैंड पहुंचा, तो अंग्रेजी का भारी भरकम-सा पद बन गया ‘हल्लाबलू’। इसके उत्तरार्ध को वे स्कॉट मानते हैं, पर मुझे तो ये समूचा ही हल्ला बोलना जैसा लगता है!
तो यह माना जाए कि ‘महल्ला’ अरबी मूल का है, महल रनिवास से जुड़ा हो तो भी अरबी। मगर एकदम देसी बनावट का हो, तो संस्कृत महालय/ महाल से मान सकते हैं। जो हो, रहना इसी मुहल्ले में है। शर्माजी को समझाऊंगा कि इसका शोरगुल वाले हल्ला से प्रत्यक्ष संबंध तो नहीं है, उन्हें लगता हो तो शांति बनाए रखने में ही सबकी भलाई है।

जी की बात है जी!
जब मुगल वंश ही उजड़ने के कगार पर हो तब बहादुर शाह जफर का ‘जी’ उजड़े दयार में क्या लगता। ईमानदारी से कबूल कर दिया, लेकिन कुछ का तो लहलहाते चमन या भरी-पूरी बस्ती में भी नहीं लगता। कुछ हैं कि हर गली-मोहल्ले में अपना दिल ही बांटते फिरते हैं। कहीं टूटा तो कहीं और जोड़ लेते हैं।
आज यही ‘जी’ मेरे जी का भी जंजाल बना हुआ है।
सुना तो यह था कि यह ‘जी’ बड़ों और सम्माननीयों के साथ लगाया जाता है, पर उस दिन भ्रमित हो गए जब देखा कोई मां अपने बेटे को बुलाती हुई कह रही थी, ‘बेटा जी, मास्टर आ गया है। खेलना छोड़ो, घर आओ।’ बेटा जी अच्छा कह कर लौट तो आया, पर उसका जी खेल में ही रहा और मास्टर जी कहते रहे, ‘जी लगा कर पढ़ा करो।’
बहरहाल, परंपरा है कि कुछ बड़े नामों, रिश्तों या पदवियों के साथ जी लगाना शिष्टता की मांग है। जैसे राम जी, दादी जी, मंत्री जी। इसी क्रम में गांधी, नेहरू के साथ लगाने में चूक भी जाएं, पर किसी नेता के साथ लगाना आपकी विवशता है। लगाएंगे कैसे नहीं जी! जरूरी नहीं कि हर बड़े के साथ जी लगाया जाए, जी लगाने लायक होगा तभी तो। एक बार एक बड़े नेता जी ने दाऊद को दाऊद जी कह दिया था (शायद उसकी उम्र का खयाल किया हो) तो लोग भड़क गए थे। कभी-कभी यों भी होता है कि ‘जी’ किसी के नाम का अभिन्न हिस्सा ही होता है। तब आदर वाला जी लगाएं या नहीं। श्री जी के साथ एक जी और जोड़ दें तो उन्हें लोग श्री जीजी न समझने लगें। जीजी के साथ एक जी और लग सकता है जीजी जी! इसे कोई जी का अपव्यय नहीं कहेगा। हां, जीजी जी का जी जिन महाशय पर टिका होता है उसके लिए जीजी जी के खाते से एक जी कम कर दिया जाता है… जीजा जी।
लगे हाथ देख लिया जाए कि ‘जी’ के लिए भाषा/ व्याकरण व्यवस्था क्या कहती है।
जी का प्रयोग प्राय: अव्यय के रूप में होता है। अव्यय यानी ऐसा पद, जिसमें लिंग-वचन से कोई अंतर नहीं पड़ता। अव्यय के रूप में इसकी विविध भूमिका पर एक नजर डालें।
* नाम या पद के साथ आदर सूचक- गोपाल जी, भाभी जी, लाला जी, चौधरी जी, राष्टÑपति जी
* प्रश्न सूचक- जी? मैं समझा नहीं!
* आश्वस्ति सूचक- काम हो जाएगा जी!
* सहमति सूचक- आ सकता हूं? जी, आइए!
* पूरक (संबोध्य व्यक्ति का स्थानापन्न)- जी आप आएंगे क्या?
* आपूरक (प्राय: कोई बात प्रारंभ करने से पहले सोचने की सुविधा)- जी असल में बात क्या है कि…
* दूसरे की बात में केवल हुंकारा भरने के लिए कि आप उसे सुन रहे हैं- जी … जी .. जी…
* स्वीकार या अस्वीकार भाव को अधिक दृढ़ करने के लिए हां या नहीं के जोड़े के साथ- जी हां, जी नहीं।
* ‘गुरु’ के साथ शिक्षक के अर्थ में आवश्यक गुरु जी! पर दादागिरी वाले गुरु के लिए वर्जित।
* महोदय जी, माननीय जी भी ठीक प्रयोग नहीं हैं।
संज्ञा के रूप में भी जी के पांच प्रकार के प्रयोग मिलते हैं:
* जीवन, जीव
* मन, चित्त, विशेष मनस्थिति (माइंड)
* हृदय, दिल (हार्ट)
* प्राण, जीवनी शक्ति
* तबीयत, स्वभाव, मिजाज, प्रकृति (डिस्पोजिशन)
कविताओं, फिल्मी गीतों में जी को जिया, जियरा बना दिया जाता है और शिकायत भी रहती है, ‘जियरा धक धक करे!’ अरे भाई, जिंदा है तो धक धक तो करेगा ही।
एक क्रिया रूप भी मिलता है, अनादर वाले आदेश में केवल तू के साथ, तू जी (जीवित रह)
भला कौन नहीं जानता कि जी-हजूरी करने का अपना महत्त्व है। जो जी-जी नहीं कर पाते, वे अपने काम में जी जान लगा देने पर भी जी चाहा फल नहीं पाते और अपना जी छोटा कर बैठते हैं। उनके लिए मेरा परामर्श यही है कि जी न जलाएं, जी कड़ा करके फिर से जी जी करने में जुट जाएं। जी खोल कर अगले का जी खुश करें। आपको जी भर मिलेगा। किसी का जी जले तो जले, आपका जी न टले। जी भटके, भरमाए तो भी आप जी थाम कर बैठिए। तभी अपने जी के प्यारे के जी में जगह बना पाएंगे। हिसाब-किताब वाली दुनिया में जी कहीं लगाना ही पड़ता है! यों ही जी ललचाने से नहीं चलता। जी करे तो ये बातें जी में बिठाएं, वरना जो जी में आए सो करें। पड़ोस में पुराना गाना बज रहा है- जियरा मचल-मचल जाए। मचले चाहे घबराए, अपना जी संभालिए। ०

 

 

 

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First Published on July 16, 2017 12:41 am

  1. r
    rajnikant. pant
    Jul 16, 2017 at 3:33 pm
    अत्यंत गंभीर विषय को पंतजी ने बहुत आसान शब्दों द्वारा हलके- फुलके अंदाज़ में लिख डाला . प्राचीन काल से ही पश्चिमी और पूर्वी जगत की जीवन पद्धति में अंतर है. उनके मकान खेत के बीच में होते हैं जबकि हमारे मकानों के बाद खेत रहते हैं इसीलिए वहां फार्महाउस का प्रचलन है तो हमारे यहां मोहल्ले का .वहां अकेलापन और व्यक्तिवाद आसानी से आया हँमारे यहाँ जाती के कारण बाटना और बंट जाना आम बात हो गई यही पंतजी के जी का जंजाल बन गई . तभी तो मोहल्ला मोहब्बत का जैसे नाम का टीवी सीरियल मजाकिया था .हाँ, पंतजी UP में अरबी घुईयान को भी कहते हैं तो मोहल्ला गया घुई यान के खेत में मोहल्ले में हल्ला होना स्वाभाविक है वैसे तिल का ताड़ सिर्फ पूरब में ही होता और पंतजी आप ने ये धर्म बखूबी निभाया. साधुवाद ..
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