December 07, 2016

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व्यंग्य: रौनक बेरौनक

पांडेयजी अक्सर इस प्रकार के आकस्मिक हमलों से खासे परेशान दीखते थे, पर अपना गुस्सा दिखा नहीं पाते थे। लालित्य ललित का लेख।

Author October 23, 2016 00:13 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

लालित्य ललित

दिवाली आने को थी, पर लक्ष्मीजी की कृपा किसी किसान के जीवन में सूखे-सी पसरी पड़ी थी। पांडेयजी पैर और चादर में संतुलन बिठाने के लिए जोड़-घटा कर रहे थे। जितना जोड़ जमाते उतना ही घाटा हो जाता। जोड़-घटा के सवालों को हल करने में पांडेयजी बचपन में मास्टरजी के सामने मुर्गा बनते रहे और आजकल परिवार के सामने बनते हैं।… यादें भी जवानी में किसी प्रेमिका के लहराते बालों की तरह और बुढ़ापे में चुनाव हारे नेता की तरह आ ही जाती हैं। पांडेयजी वैसे भी पुराने विचारों के आदमी हैं, इसलिए परिवार की खुशी के लिए हर जुगाड़ जमाने और त्याग के लिए तत्पर रहते हैं।  इसी बीच दफ्तर के चपरासी मांगेराम ने ब्रेकिंग न्यूज दी- ‘साहब पे कमीशन की घोषणा हो गई है।’ चादर पैर से बड़ी हो गई। पांडेयजी के जीवन में वसंत छा गया। अपने जीवन में वसंत छाए, तो थोड़ा दूसरे के जीवन में छवाने का सुख दिल को दरिया कर देता है। पांडेयजी ने बीस रुपए की बख्शिश मांगेराम को दी और बोले- ‘यह ले चाय समोसे की ऐश कर।’ मांगेराम ने जो सैल्यूट पांडेयजी को मारा वैसा वह बड़े साहब को भी नहीं मारता है।

पांडेयजी ने तत्काल पत्नी को ब्रेकिंग न्यूज दी, पत्नी ने बेटी को दी, बेटी ने छोटे भाई को दी और कमअक्ल छोटे भाई ने दादा-दादी को भी दे दी। सबको अपनी चादर बड़ी होने का सुख मिला। चादर पांडेयजी की बड़ी हुई थी और सुख… एरियर और कुछ नगद नारायण की ब्रेकिंग न्यूज ने पांडेयजी को उधार माता की शरण में भेज दिया। आज ऐश कर लेंगे और कल उधार चुका देंगे। त्योहारों पर क्या धांसू सेल लगती है। सेल पर ऐसी भीड़ जमती है कि लगता है जैसे मुफ्त बंट रहा है। इस बार पांडेयजी भी धांसू सेल लूटेंगे। त्योहार का मजा त्योहार आने से पहले है। बाजार अपने यौवन पर था। इसके साथ वह फ्री, उसके साथ वह फ्री।
पांडेयजी के परिवार में लिस्ट अभियान चालू हो गया। पत्नी की फरमाइश है कि इस बार दीवाली पर हीरे की अंगूठी लूंगी। उसने तो अखबार से वह पन्ना भी काट कर संभाल रखा है। अक्सर सरकारी कर्मचारियों की पत्नियां सपने ऐसे देखती हैं जैसे वे किसी धन्नासेठ के घर से संबंध रखते हों, यहां हफ्ते में खिचड़ी मिल जाए तो गनीमत है। वैसे भी महीना ऐसे निकलता है जैसे बरसात का पनाला।

उधर बच्चे फरमाइशें सुनाने लगे- पापा, देखो न शिल्पा ने भी अबकी दिवाली से पहले आइ-फोन ले लिया, आपने कहा था, इस बार पक्का दिलाऊंगा… पापा याद रखना दीवाली आने वाली है, बीस दिन बचे हैं। कल मोंटी भी बता रहा था, पैंतालीस परसेंट डिस्काउंट का आॅफर चल रहा है। पापा प्लान करो न। उधर पापाजी बनाम विलायती राम पांडेय कुछ सोच पाते कि गांव से आई फरमाइशी चिट्ठी घूम गई। बुजुर्ग बाबूजी की थी। लिखा था- बेटा, खुश रहो, हमारी दुआ है अपने परिवार को खुशी देने में कामयाब रहो, चीनू ने फोन पर बताया कि सरकार से इस बार बहुत बढ़ोतरी होने जा रही है।… हमें कुछ नहीं चाहिए, हमारा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। हम तो धोती-कुर्ते वाले हैं। बस इस बार वक्त मिले, तो अपनी मां को शहर के अस्पताल में दिखा देना… इन दिनों आंखों में तकलीफ रहती है। शेष कुशल। बच्चों को प्यार। तुम्हारा पिता- बटेशर नाथ पांडेय।

पांडेयजी अक्सर इस प्रकार के आकस्मिक हमलों से खासे परेशान दीखते थे, पर अपना गुस्सा दिखा नहीं पाते थे। जबसे वोट देने लायक हुए हैं, आश्वासन लेने-देने की भाषा आ गई है। किसी का दिल नहीं तोड़ते… रामप्यारी से कहते, रामप्यारीजी, आपकी पसंद तो बड़ी चोखी है, बिलकुल लाएंगे न! पांडेयजी की आंखों से नींद ऐसे गायब थी जैसे किसी गरीब लेखक की रॉयल्टी पिछले पांच बरस से न मिली हो। कमाल की बात यह कि आजकल प्रकाशक उसी की किताब की बदौलत महंगी गाड़ी में इश्क फरमाता दिख रहा है। कागजों में उस गरीब लेखक की किताब गरीब ही रहती है। इधर अंगूठी के इंतजार में रामप्यारी की अंगुली चिकनगुनिया के मरीज-सी दर्द करने लगी थी। वह रोज बयान करती और पांडेयजी बापू के बंदर-से बंद कान से सुन लेते। पर जब रामप्यारी का दर्द बंद कान के पर्दे फाड़ने लगा, तो पांडेयजी भड़क गए- तुझे सोलिटियर हीरे की अंगूठी चाहिए, मेरे ससुर की ज्वेलरी शॉप है न!

रामप्यारी ने झट फरमान सुना दिया- सुन लो, कह दिया तो कह दिया। इस बार लेनी है हीरे की अंगूठी, वरना। यह वरना बड़े-बड़ों की वाट लगा देता है। अंगूठी चाहे कम वजन की हो, बात में वजन था। और पांडेयजी थे पुराने मूल्य के आदमी। इधर मोहल्ले वाले बड़े खुश थे- देखते हैं पांडेयजी की दीवाली इस बार क्या गुल खिलाती है। वैसे भी पड़ोसियों को किसी के फटे में टांग अड़ाना अच्छा लगता है। बाजार में रौनक जरूरत से ज्यादा थी।  इधर पांडेयजी सोच रहे थे कि वेतन आयोग पर सबकी निगाह है, मंत्रालय वाले खा के हजम भी कर गए, और एक वे हैं जो स्वायत्त संस्थान में हैं। उनका फरमान अभी आया नहीं। कैसे होगी दीवाली। क्या फीकी रहेगी। क्या अंगूठी आएगी या नहीं! बाजार में माल पहले की अपेक्षा ज्यादा है। त्योहार है, सो दुकानदारों को उम्मीद है, सामान निकलेगा ही। पर बाजार में मंदी है।

इधर घर में माहौल गरम है। इस बार अंगूठी आएगी, बच्चों की मांगें कैसे पूरी होंगी, मां बाबूजी को कैसे टरकाएंगे। अपनी तो पैंट क्या, पाजामा भी नहीं आएगा।
स्वायत्त संस्थानों को वेतन आयोग की चिट्ठी नहीं आई है। उनकी दिवाली बिल्कुल वैसी मनेगी, जैसे अनार है, तो उसमें मसाला गायब है, फुलझड़ी है तो वह सीली है, गीली है, सूना सूना है मोहल्ला। कहीं से कोई आवाज नहीं, न पटाखे की, न मिठाइयों की। कोई नहीं कह रहा कि हैप्पी दिवाली। जैसे सबको सांप सूंघ गया हो। यह दीवाली का सांप था। सांप तो सांप है। डरना तो पड़ेगा। बहरहाल, यह महंगाई का सांप है।

विलायती राम पांडेय पिछले कुछ दिनों से चुपचाप थे। कम बोलते, सुनते ज्यादा थे। उस दिन शाम होते ही अपने घर लौट आए थे। आज उनके हाथ में एक झोला था, उसमें बढ़िया वाले पटाखे थे। मिठाई का महंगा डिब्बा। पत्नी की पसंद के रसगुल्ले, बिटिया की पसंद की बालूशाही और छुटकू के गुलाब जामुन। सुनार का एक पैकेट, बच्चों के ढेरों उपहार। अपने लिए पाजामे का पैकेट भी। सबके चेहरे पर खुशियां ऐसे दौड़ने लगीं, जैसे हॉट सीट पर सीधे बिग बी ने मुलाकात का समय तय कर दिया हो।किसी ने यह नहीं पूछा कि एरियर मिल गया क्या? रामप्यारी ने तपाक से झोला उनके हाथ से ले लिया और अंगूठी देखते ही अप्रत्याशित प्रेम बिखेर दिया। बच्चों को बाप का मूल्य समझ आया। ०

 

 

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First Published on October 23, 2016 12:13 am

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