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व्यंग्य: महाकवि मौजानंद

मौजानंद का जानलेवा हमला बर्दाश्त करने के अलावा उस समय और कोई चारा भी न था।
Author नई दिल्ली | November 6, 2016 00:04 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

महाकवि मौजानंदजी को आज कौन नहीं जानता! साहित्य की गोष्ठी हो या कविता पाठ का कार्यक्रम, मौजानंदजी अपनी मौज में गुल-गुल गाते मिल जाएंगे। कम समय में ही उन्होंने जो ख्याति पाई है, वह बिरलों के भाग्य में होती है। साठ साल की आयु से शुरू हुआ लेखन अल्पसमय में ही परिपक्व हो गया है। लोग उन्हें अब तो महाकवि की उपाधि भी मानद रूप में प्रदान कर चुके हैं। घुटनों तक लंबे मोजे पहन कर जब वे साहित्य की चर्चा करते हैं, तो लोगों के हाथों के तोते उड़ जाते हैं। उनकी धीर-गंभीर मुद्रा में साहित्य खिलता भी खूब है। कविता उनकी रग-रग में रच-बस गई है।

सब कुछ ठीक है, लेकिन एक रंज मुझे उनका पड़ोसी होने का जीवन भर सालता रहेगा। काश! मैं उनके ठीक सामने वाले मकान में न रहा होता! मगर करता भी क्या, मकान मेरा पुश्तैनी है और उसे छोड़ भी नहीं सकता। अगर मैं थोड़ा भी सक्षम होता तो सबसे पहले अपना नया मकान उनके निवास से बीस किलोमीटर की दूरी पर बनवाता, लेकिन होनी बलवान होती है और उसे टालना आदमी के वश की बात भी नहीं है।

महाकवि मौजानंद कोई बुरे आदमी नहीं हैं, बस वे कवि हैं- यही त्रासद है। इधर लिखते हैं और उधर प्रबुद्ध श्रोता के रूप में वे मुझे पाते हैं और एक अनवरत सिलसिला चलता है- लेकिन इससे निजात पाने का कोई मार्ग नहीं सूझता। आखिर एक दिन मैंने उनसे कहा- ‘मौजानंदजी आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं!…’
वे मेरी पूरी बात सुनते इससे पहले ही बोले- ‘तो सुनो मेरी एक ताजा कविता।’ मैंने सिर पकड़ कर कविता सुनी और कविता की समाप्ति पर कहा- ‘अब मेरी सुनिए! मैं यह कह रहा था कि आप अच्छा लिख रहे हैं, तो किसी पुरस्कार के लिए ट्राई क्यों नहीं करते?’ वे मेरी मूर्खता पर हंसे और बोले- ‘क्या होता है पुरस्कार से! जनता की मान्यता ही रचनाकार की उपलब्धि होती है। आपको मेरी कविताएं भाती हैं, यह मेरे लिए पुरस्कार से कम नहीं है।’

उनकी बात सुन कर मैं रुआंसा हो गया और बोला- ‘देखिए मौजानंदजी, अब आप किसी और को तलाशिए। कविता के बारे में मैं इतना जानता भी नहीं।’ वे बोले- ‘नहीं जानते तो जानो शर्मा। कविता एक अनुष्ठान है। तुम्हें कविता को मजाक में नहीं लेना चाहिए।’ मैंने अपने गुस्से को अंदर आत्मसात किया और बोला- ‘वैसे कविता से लाभ क्या-क्या हैं?’ वे बोले- ‘बहुत अच्छा प्रश्न है तुम्हारा। कविता के क्या-क्या लाभ बताऊं तुम्हें। कविता के लाभ अनेक हैं। सबसे पहला लाभ तो यह है कि इसकी वजह से मेरे और तुम्हारे मध्य एक आपसी समझ और सद्भाव का वातावरण बना हुआ है।’

मैंने कहा- ‘लेकिन यह कब तक बना रह सकता है! दरअसल, मैं घुट गया हूं महाकवि। मेरी मजबूरी को समझो और मुझ पर दया करो। मैं कविता से परेशान हो गया हूं।’ ‘तुम्हारे परेशान होने से कविता का नुकसान होता है। तुम्हें अपनी सदाशयता और सहजता को नहीं त्यागना चाहिए।’ उन्होंने अपने घुटनों से नीचे सरके मोजों को ऊपर खींचा और बोले- ‘शर्मा भाई, तुम्हारी बेचैनी मैं अच्छी तरह समझता हूं, लेकिन मैं भी क्या करूं? इधर कविता जन्म लेती है और उधर तुम्हारे अलावा मुझे कोई सीधा-सादा आदमी दिखाई नहीं देता। तुम्हारे कारण मेरी कविता को जो ऊंचाई मिली है, उसका जिक्र हिंदी साहित्य में अवश्य होगा। मेरी कविताएं भले मर जाएं, लेकिन तुम मर कर भी जिंदा रहोगे। तुम अपना प्रेम भाव यथावत बनाए रखो। यह कहते हुए मौजानंद की आंखों में गहन याचना उभर आई थी।

मौजानंद का जानलेवा हमला बर्दाश्त करने के अलावा उस समय और कोई चारा भी न था। समय बीतता गया। मौजानंद महाकवि बीमार रहने लगे। बिस्तर में पड़े हुए भी वे मेरी रट लगाए रहते। मैं प्रसन्न था कि उनके बुलाने पर जाऊं तो जाऊं, वरना न भी जाऊं। धीरे-धीरे मौजानंद को कफ-खांसी ने ऐसा जकड़ा कि वे खांसते-खांसते भी कविता की उल्टी कर देते। बीमारी से बुरी तरह परेशान एक दिन लाठी टेकते हुए मेरे घर आ धमके और बोले- ‘शर्मा तुम तो आए नहीं, मैं ही आ गया।’ मैंने उन्हें गौर से देखा तो लगा जैसे यमराज का कोई दूत सामने खड़ा हो और कह रहा है- चलो, मेरे साथ चलो। मुझे एक क्षण बेहोशी-सी आई, लेकिन मैंने अपने आप को संभाला और कहा- ‘अच्छा किया आपने कविता लिखना बंद कर दिया।’

उनके चेहरे पर हल्की-सी हंसी की रेखा उभरी, जेब में हाथ गया, मुड़ा-तुड़ा कागज बाहर आया और वे बोले- ‘शर्मा कविता लिखना मेरे लिए जरूरी है। जिस दिन मैं इसे छोड़ दूंगा, उस दिन यह नश्वर काया भी नहीं रहेगी।’ एक बार तो इच्छा हुई कि उनसे कह दूं कि आप जरूर छोड़ दें कविता, लेकिन उम्र का लिहाज कर मैंने कविता को भुगतना स्वीकार किया। उनकी वह कविता क्या थी, यह तो मैं नहीं जानता, क्योंकि मैं लगातार उनसे मुक्ति का मार्ग निकालने की उक्ति सोचता रहा था।

मौजानंद महाकवि को मजा नहीं आया। उन्होंने अपने पांवों को खींचा और कहा- ‘देखो, इन मोजों को देखो। इन्होंने आज तक मेरा साथ नहीं छोड़ा है।’ मैंने कहा- ‘मैंने समंदर की मौजें देखी हैं, लेकिन आपके मोजों को अच्छी तरह से नहीं देखा है। आप कब से नहीं धो पाए हैं इन्हें?’ मौजानंदजी की आंखों से चिनगारियां निकलने लगीं। बोले- ‘शर्मा, तुम एकदम अज्ञानी हो, साहित्य में प्रतीकों को नहीं समझते। ये साहित्य के मोजे हैं, जिन्हें मैंने दोनों पांवों में पहन रखा है। मैंने साहित्य को ओढ़ा, बिछाया और गहराई से जीया है। ये मोजे मेरे जीवन की गति और कविता के प्राण हैं। इन्हें धोने का मतलब खुद को धो लेने के समान होगा।’

मैंने मौजानंदजी को उठाया और घर की ओर ले जाकर कहा- ‘जाइए, आराम फरमाए। कविता स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। हो सके तो गरम चाय पीकर पसीना ले मारिए।’ महाकवि को बुरा तो लगा, लेकिन वे अनमने भाव से गृह-प्रवेश कर गए।वे सर्दी के दिन थे। भीषण ठंडी रातें और निरंतर ठंड के कारण महाकवि कविता से नाता नहीं रख पाए और एक दिन वे मुझे अकेला छोड़ कर परमधाम को चले गए। आज सोचता हूं तो लगता है कि गलती पर मैं ही था। उन्होंने क्या बिगाड़ा था मेरा। कविता सुना कर अपनी संतुष्टि पा लते थे। अब कौन सुनाएगा कविता? अब भी उनके लंबे मोजे अलगनी पर लटके सूख रहे हैं। शायद उन्हें धो दिया गया है। मेरी इच्छा हुई कि उन मोजों को क्यों न मैं ही पहन लूं? वे धुल चुके हैं और ठंड की मार बहुत तेज है। तभी मौजानंद की आत्मा ने मुझे ललकारा- ‘खबरदार जो मेरे मोजों को हाथ लगाया तो।’ मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई और मैं कमरे में गया, रजाई ओढ़ कर सो गया।

 

 

 

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