December 05, 2016

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व्यंग्य: संत चौक की एक शाम

संत चौक के नजदीक कहीं स्कूल नहीं पड़ता है, इस वजह से गांधीजी के गले में बरसों से फूलमाला भी नहीं पड़ी है।

Author November 27, 2016 02:32 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

जवाहर चौधरी

हाई-वे से लगे इस संत चौक पर दूसरे चौराहों की बनिस्बत कुछ ज्यादा आवाजाही लगी रहती है। एक तो आसपास इतनी कॉलोनियां बस पड़ी हैं कि लगता है लोग फसलों की तरह उग रहे हैं! आबादी को लेकर जबसे देश में चिंता का चलन खत्म हुआ है, लोगों में पैदा करने की झिझक कम हो गई लगती है। कहते हैं कि देने वाला जब देने पर आता है तो छप्पर फाड़ के देने लगता है। इसलिए जहां भी भगवान की देन होती है वहां छप्पर की समस्या भी होती है। समय बदल गया है, किसी जमाने में टीवी पर कितना कुछ अच्छा आता था, लेकिन अब प्राइम टाइम में लोग संत चौक पर दिखाई देते हैं। यहां कुछ होटल हैं, जिनमें शाम से ही वंदनवार की तरह बदनसीब चिकन लटका दिए जाते हैं। आसपास कुछ कुत्ते इन वंदनवारों पर निगाह जमाए बैठे हैं। जैसे कि आम लोग अक्सर त्योहारों पर छप रहे विज्ञापनों को दिल थाम कर टूंगते रहते हैं। चिकन की आस में ये कुत्ते भौंकते-गुर्राते बाजारवादी व्यवस्था में अपने लिए गुंजाइश तलाश रहे हैं।

संत चौक पर कुछेक शराबखाने भी हैं, जिन्हें ‘बार’ कहने से प्राय: भोले मन में आ रहा अपराधबोध स्थगित हो जाता है। बोध होना बड़ी बात है, और बोध न होना उससे भी बड़ी। लेकिन इन सबसे बड़ी बात है बोध न होने देना। संत श्रेणी के साधक सब करते हैं, लेकिन बोध नहीं होने देते हैं। बार में प्राय: इसी श्रेणी के लोग होते हैं। यहां होटलों में बाहर रोशनी होती है, जबकि बारों के बाहर अंधेरा रखा जाता है। यह इसलिए कि आने वालों को बाहर निकलने में असुविधा न हो। लेकिन दोनों जगह अंदर अंधेरा ही रखा जाता है, इससे सुधिजनों को यह पता नहीं चल पता कि वास्तव में उनकी प्लेट या गिलास में क्या है। सब यह मान कर चलते हैं कि वे अपना दिया गया आर्डर खा-पी रहे हैं। इसके पीछे यह पवित्र भावना प्रबल होती है कि आत्मिक आनंद ही सब कुछ है और बिल चुकाने के बाद संसार मिथ्या है।

हाइ-वे के कारण होटलों में बिस्तर और कमरों की व्यवस्था है, जिनका आसपास वाले पीड़ित पुरुष कभी-कभी कोपभवन की तरह भी इस्तेमाल कर लिया करते हैं। मेन रोड से लग के एक सिनेमा हॉल है। वैसे तो उसका नाम चंद्रिका है, लेकिन लोगों के बीच ‘ठाटिया टाकीज’ के नाम से मशहूर है। इस टाकीज की खासियत यह है कि इसके संचालकों और दर्शकों में एक तरह की ‘अंडरस्टेंडिंग’ है, जैसी कि अक्सर सत्ता दल और विरोधी दल के बीच होती है। इसमें प्राय: भक्त प्रह्लाद टाइप फिल्म चलती है, जिसके बीच में एक घंटा ‘नीला-सिनेमा’ पूरे अनुशासन और इस विश्वास के साथ दिखाया जाता है कि देखने वाले, जिनमें ज्यादातर कच्ची उम्र के होते हैं, शिक्षा प्राप्त कर देश को अमेरिका से आगे ले जाएंगे। सिनेमा में गजब की भीड़ देख कर मिडिया ने कई बार रिपोर्ट बनाई है कि लोगों में अपनी संस्कृति और आदर्शों के प्रति बड़ा आकर्षण है।

इस तरफ, बार्इं ओर जरा-सा आगे बढ़ें तो एक नीम का पेड़ दिखाई दे रहा है। इसके नीचे एक प्याऊ है। जैसा कि आप जानते ही होंगे कि नीम का पेड़ लगाने और प्याऊ बनाने की हमारे यहां परंपरा है, जिससे बड़े लोग प्राय: टैक्स बचाने के साथ अपना चेहरा भी धोने की कोशिश करते हैं। प्याऊ में सड़क की तरफ एक खिड़की है, जिसमें पीतल की एक छोटी कटोरी-सी रखी दिखाई देती है। इसमें शायद पानी भी है, क्योंकि इस पर आयल पेंट से ‘जल बचाएं’ लिखा हुआ है। खिड़की के ऊपर की तरफ पगड़ी बांधे, बड़ी मूंछों वाली, खुदाई में मिली टाइप एक मूर्ति जड़ी हुई है। मूर्ति पर कबूतरों ने अपना सुलभ शौचालय बना कर इसे उपयोगी बनाया है और जनस्वीकृति की मोहर भी लगवाई है। नीचे लगे सफेद पत्थर पर लिखा है कि समाजसेवी, राय बहादुर खूबसिंग की स्मृति में उनके चार बेटों ने इस प्याऊ का निर्माण करवाया है। हालात बता रहे हैं कि चारों बेटे प्याऊ बनवाने के बाद अकाउंट-पेयी पुण्य ही ले रहे हैं।

पास में ही एक गुमटी है, जिस पर पानी के पाउच बिक रहे हैं। आलावा इसके, जो दरो-दीवार को पहचानते हैं उन्हें यहीं पर कच्ची दारू के पाउच भी मिल जाते हैं। बरनियों में कुछ तीखा नमकीन भी है। लेकिन जिनकी साख है वही इस सुविधा का लाभ उठा रहे हैं। इसी से थोड़ा-सा हट के पुलिस चौकी है। चौकी में महज पांच सिपाही और एक साहब हैं। साहब के लिए प्लास्टिक की एक कुर्सी और सिपाहियों के लिए दो बेंच हर समय मौजूद रखी गई हैं। साहब ऊंची जात के नहीं हैं, इसलिए प्राय: बेंच ही शेयर करते हैं और कुर्सी पर तभी बैठते हैं, जब सिपाही गश्त पर होते है। अन्यथा न लें, इसे आस्था और संस्कार कहते हैं। आप जानते ही हैं कि आस्था हमेशा कानून से बड़ी होती है और संस्कार सभ्यता से।

चौकी से करीब चार सौ फुट आगे गांधीजी की मूर्ति लगी पड़ी है। संत चौक के नजदीक कहीं स्कूल नहीं पड़ता है, इस वजह से गांधीजी के गले में बरसों से फूलमाला भी नहीं पड़ी है। एक बार एक बारात इधर से गुजारी थी, दूल्हे की ही जिद थी शायद, एक माला तब बापू के गले में पड़ी और महीनों तक आभार सहित लटकी रही। किसी वादे, जुमले या योजना की तरह वह बिखर कर कहां चली गई, किसी को पता नहीं चला। बरातें तो उसके बाद भी आती रहीं, पर संत चौक पर वैसा उम्रदराज दूल्हा फिर कभी नहीं आया। मूर्ति के नीचे गोल घेरा-सा बना हुआ है, जिसमें कभी फूल क्यारियां रहीं होंगी, लेकिन अब प्राय: यहां तीन-चार बकरे-बकरियां बंधी रहती हैं। ये बकरियां गांधीजी की नहीं, बल्कि पीछे मटन शाप वाले की हैं। गांधीजी की गर्दन जरा झुकी हुई है, लगता है वे बकरियों को देख रहे हैं, बकरियां मटन शॉप वाले को देख रही हैं, मटन वाला होटलों को ताक रहा है, होटल मालिक ग्राहकों के इंतजार में है। खबर है कि ग्राहकों को एरियर और बोनस मिला है। इस खबर से बकरियों की जान सूख रही है।

यहीं, जरा-सा लग के रिक्शा स्टैंड है। आने वाले से ड्राइवर पूछता है- ‘कहां चलना है बाउजी?’ अगर बाउजी कुछ तय नहीं कर पाते तो ड्राइवर तय कर लेता है कि उन्हें कहां ले जाना है। संत चौक के रिक्शा वालों की ख्याति है कि वे ‘सही जगह’ पर ले जाते हैं। चलिए अब लौटते हैं। इधर कुछ ठेले हैं फल वाले। केले वाला यह नौजवान अपने मोबाइल से चैट कर रहा है। थोड़ी-थोड़ी देर में वह सेल्फी भी लेता है। सामने की लाइन में कपड़ों की दुकान है, जिसे मालिक अपना शो-रूम कहता है, उसके ऊपर की मंजिल में खिड़की पर बैठी उसकी लड़की भी चैट कर रही है। लड़का अपना सब कुछ (यानी केले का ठेला और बूढ़े मां-बाप) छोड़ कर उसके साथ जाने को तैयार है, अगर लड़की भी अपने साथ बहुत कुछ लाने की हिम्मत करे तो। इस प्रस्ताव में बहुत सारे पेंच हैं, जिन पर दिन में कई बार उच्च स्तरीय चैट-चर्चा होती रहती है। पूछने पर डिस्टर्ब होते हुए उसने बताया कि वह रोजाना पांच सौ केले बेच लेता है। खिन्नता के साथ बोला कि फलों में राजा आम है तो प्रजा केले हैं। यहां जो घूम रहे हैं, सब केले हैं। वह केलों को केले बेचता है। उसने मुझे दस रुपए के पांच केले दिए और बोला- ‘लीजिए, अब आप आधा दर्जन हो गए’। इस बात पर चल देने का मूड हो गया, सो मैं रिक्शे वाले के पास जाता हूं, वह पूछता है बाऊजी कहां जाना है? मैं जरा सोचने लगता हूं, और वह कहता है- बैठिए बाउजी। ०

 

 

 

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First Published on November 27, 2016 2:32 am

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