December 02, 2016

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जन्मशती: एक थीं कानन देवी

बेपनाह शोहरत और दौलत कमाने वाली कानन देवी कभी अपने अतीत को नहीं भूल पार्इं। समाज के वंचित तबके के लिए उनका मन बेचैन रहता था।

Author November 20, 2016 02:32 am
प्रतीकात्मक तस्वीर ।

इकबाल रिजवी

गरीबी, बेबसी-अभाव और जिंदा रहने के लिए मां की कड़ी मेहनत के बीच वह बच्ची बड़ी हो रही थी। अभी वह बड़ी भी नहीं हो पाई थी कि जीवन का बोझ खींचने के लिए उसे मां के साथ जुटना पड़ा। यह किसे पता था कि इसी नन्हीं बच्ची की उपलब्धियां इतनी व्यापक हो जाएगी कि भारतीय सिनेमा का इतिहास उसके नाम के बिना अधूरा रहेगा। इस बच्ची का नाम था कानन बाला जो कानन देवी के नाम से पहचानी गई। कानन देवी का जन्म 1916 में कोलकाता के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। कानन के जन्म के कुछ साल बाद उनके माता पिता में अलगाव हो गया। मां बेटी का कोई सहारा नहीं था इसलिए मां को दूसरों घरों में काम करना पड़ा। फिर भी जिंदगी की गाड़ी मुश्किल से खिंच पा रही थी।

एक परिचित के सुझाव पर कानन की मां ने उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया। 1926 में बांग्ला फिल्म जयदेव से जब उन्होंने फिल्मी दुनिया में कदम रखा तब उनकी उम्र महज दस साल थी। कानन को नायिका के रूप में चार साल बाद फिल्म ऋषिर प्रेम में पहली बार मौका मिला। 1931 में जब फिल्म रिलीज हुई तब तक फिल्मों ने बोलना सीख लिया था। ऐसे में आवाज का महत्व बहुत बढ़ गया। कानन देवी को कहीं संगीत की शिक्षा तो नहीं मिली थी लेकिन उनकी आवाज में खास तरह का आकर्षण था। फिल्म से जुड़े कुछ लोगों ने उनकी आवाज की विशेषता के बारे में उनका ध्यान खींचा और उन्हें संगीत की शिक्षा के लिए प्रेरित किया।

उत्साहित कानन देवी ने कुछ समय के लिए लखनऊ के उस्ताद अल्लारक्खा खां से संगीत की तालीम ली। बाद में उन्होंने मेगाफोन कंपनी के प्रशिक्षक भीष्म देव चटर्जी से विशिष्ट शैली के बांग्ला गीतों की शिक्षा ली। इस बीच परदे पर कानन देवी की पहचान मजबूत होती जा रही थी। उनके सौंदर्य में विशेष प्रकार की मासूमियत थी इसी से प्रभावित हो कर उनके प्रशंसक उन्हें कानन बाला के स्थान पर कानन देवी बुलाने लगे और कानन बाला कम उम्र में ही देवी बन गर्इं। फिल्म मुक्ति (1937) में कानन देवी ने पहली बार पंकज मलिक के निर्देशन में रवींद्र संगीत गाया। यह फिल्म बांग्ला और हिंदी दोनो भाषाओं में बनी। फिल्म के गीत बहुत लोकप्रिय हुए। इस जोड़ी ने कई फिल्मों साथ साथ कीं। फिल्मों में रवींद्र संगीत को लोकप्रिय बनाने का श्रेय पंकज मलिक और कानन देवी को जाता है।

बांग्ला के अलावा कानन देवी ने हिंदी फिल्मों में भी गीत गाए और वे अपने समय की सर्वश्रेष्ठ फिल्म गायिका साबित हुर्इं। खुर्शीद, नूरजहां और सुरैया फिल्म गायकी के क्षेत्र में उनके बाद स्थापित हुर्इं। उनके कई गीत जैसे ये दुनिया ये दुनिया तूफान मेल (जवाब) या फिर मोरे अंगना आए अली (विद्यापति) अपने समय के सुपरहिट गीत रहे। बांग्ला में गाए उनके गीत तो बांग्ला समाज के मन में गहरे पैठ गए थे। बंगाल में कानन देवी की लेकप्रियता का आलम यह था कि देवी देवताओं के अलावा घरों में उनके चित्र भी लगाए जाते थे। हिंदी फिल्मों में कानन देवी की शोहरत को भुनाने के लिए उन्हें फिल्मों के लगातार प्रस्ताव मिल रहे थे लेकिन उन्होंने इस प्रस्तावों को यह कह कर खारिज कर दिया कि वे कोलकाता में संतुष्ट हैं और मुंबई में काम करने की इच्छा नहीं हैं लेकिन बहुत दबाव बढ़ने पर उन्होंने एक निर्माता लक्ष्मी दास आनंद से कहा कि अगर वे कोलकाता में आकर हिंदी फिल्म बनाएं तो वह काम कर लेंगी। वे राजी हो गए और उन्होंने कोलकाता आकर फिल्म श्री कृष्ण लीला (1946) बनाई। इस फिल्म के लिए कानन देवी को दो लाख रुपए पारिश्रमिक के रूप में मिले। उस समय भारतीय फिल्मों के इतिहास में किसी अभिनेत्री को पारिश्रमिक के तौर पर इतनी बड़ी रकम नहीं मिली थी।

कई फिल्मों में नारी के विभिन्न चरित्रों को कानन देवी ने जिस तरह से अभिनीत किया, उससे वे बांग्ला समाज में आदर्श नारी के रूप में देखी जाती थीं। फिल्म शेष उत्तर, मनमोई गर्ल्स स्कूल, मुक्ति, परिचय, अभिनेत्री, हार-जीत जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को भुला पाना मुश्किल है। एक समारोह में कानन देवी की आंखें एक आकर्षक युवक हरिदास भट्टाचार्य से मिलीं। हरिदास राज्यपाल के सुरक्षा स्टाफ में शामिल थे। यह पहली नजर का प्यार था और जल्द ही दोनों ने शादी कर ली। इसके बाद कानन देवी ने अपनी फिल्म कंपनी श्रीमती पिक्चर्स बनाई और फिल्मों के निर्देशन की कमान अपने पति को सौंपीं। उनकी निर्माणाधीन पहली फिल्म थी ‘अनन्या’ जो फ्लाप रही। इसके बाद कानन देवी नवविधान, देवज, आशा इंद्रवन और श्रीकांत जैसी फिल्मों के जरिए अपने प्रशंसकों के दिलों पर राज करती रहीं।

हिंदी में भी कानन देवी की मांग कम नहीं हुई। जवानी की रीत (1939), हार-जीत (1940), हॉस्पिटल (1943), बनफूल (1945), राजलक्ष्मी (1945), अरेबियन नाइट), (1946), फैसला (1947), तुम और मैं (1947) जैसी फिल्मों के जरिए कानन देवी ने किसी अभिनेत्री को अपने आस पास भी नहीं पहुंचने दिया। चंद्रशेखर (1948) उनकी रोमांटिक छवि वाली अंतिम हिंदी फिल्म थी। इसमें छवि विश्वास और अशोक कुमार उनके हीरो थे। बेपनाह शोहरत और दौलत कमाने वाली कानन देवी कभी अपने अतीत को नहीं भूल पार्इं। समाज के वंचित तबके के लिए उनका मन बेचैन रहता था। वे लोगों के लिए कुछ करना चाह रही थीं। एक दिन उन्होंने एक पुरानी अभिनेत्री को भीख मांगते देखा तो हिल कर रह गर्इं। 1962 में उन्होंने फिल्मों से पूरी तरह संन्यास ले लिया। उस फैसले से सिनेमा जगत स्तब्ध रह गया। जिस बुलंदी पर कानन देवी उस समय थीं वहां पहुंचने का केवल सपना देखा जा सकता था ऐसे में संन्यास लेने का कदम मामूली काम नहीं था।

फिल्मों से नाता तोड़ने के बाद कानन देवी ने फिल्म जगत से जुड़े लोगों के कल्याण के लिए महिला शिल्पी महल नाम का केंद्र स्थापित किया। एक इमारत खरीद कर शुरू किए गए इस केंद्र में बेसहारा अभिनेत्रियों और संगीत से जुड़े लोगों को सहारा देने का काम होता रहा। 1968 में उन्हें पद्मश्री और 1977 में दादा साहब फालके पुरस्कार से नवाजा गया। फिल्मों से अलग होने के बाद भी सालों तक उन्हें फिल्मो के अच्छे प्रस्ताव और प्रलोभन मिलते रहे लेकिन कानन देवी अपने गृहस्थ जीवन और समाज सेवा में अंतिम समय तक व्यस्त रहीं। 1992 में उनका निधन हो गया।

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First Published on November 20, 2016 2:31 am

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