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उषा महाजन की कहानी : एक्टिविस्ट

बिशन दास पिछले दो महीनों से बीमार हैं। लगभग खाट ही पकड़ ली है उन्होंने। दवाएं लेने पर भी उनका रक्तचाप कम नहीं होता। डॉक्टर कहते हैं कि उन्हें हृदयघात का खतरा है।
Author नई दिल्ली | July 17, 2016 00:55 am
एक जैसी बनाई गई इन इमारतों को तो अब पहचानना भी मुश्किल, कि यह वही ‘स्टेट हाउसिंग अथॉरिटी’ की बनाई हुई कॉलोनी है, जिसमें सभी फ्लैट एक जैसे बने थे, कुछ दो बेडरूम वाले और कुछ तीन बेडरूम वाले!

‘ठाक्क-ठाक्क, ठाक्क-ठाक्क…’ वे हकबका कर नींद से जाग पड़े।

‘कुसुम, ये ठाक्क-ठाक्क की आवाजें ऊपर वाले फ्लैट से आ रही हैं क्या?’ उन्होंने पैरों में चप्पल डालते हुए पत्नी से पूछा।
‘ऊपर वाले से तो नहीं, शायद उनके ऊपर वालों के यहां से हों। कर रहे होंगे कोई तोड़-फोड़। कोई रेनोवेशन अपने फ्लैट में। सुना, दो करोड़ में खरीदा है उन्होंने टॉप फ्लोर। अब आठ-दस लाख ऊपर लगा कर उसे अपने मन मुताबिक तो बनाएंगे ही। पैसे वाले हैं, कहीं न कहीं तो लगाएंगे ही न अपना पैसा। सभी पैसे ही वाले हैं यहां, सिर्फ हमें छोड़।…’
बिशन दास ने पत्नी से पूछ तो लिया था, लेकिन उन्होंने उसकी एक भी बात ध्यान से नहीं सुनी थी। वे अचानक अन्यमनस्क से हो बैठे थे। हर बार जब भी वे मोहल्ले में कहीं से भी ‘ठाक्क-ठाक्क’ की ऐसी आवाजें सुनते हैं, तो बेचैन हो उठते हैं। और अब, यह अपने ही घर के ऊपर से…?

‘उठ गए हो तो, पानी-वानी पी लो, चाय बनाती हूं।’ पर, तब तक तो वे चप्पलें पहन, दरवाजा खोल, ऊपर की सीढ़ियां चढ़ने लगे थे।
पहले तल्ले से नहीं, दूसरे से भी नहीं, ‘ठाक्क-ठाक्क’ की आवाजें तो बिल्डिंग की छत से आ रही थीं। छत पर सभी फ्लैटों की पानी की टंकियां हैं। साल में एकाध बार, जब टंकी की सफाई वगैरह करानी हो, छत पर वे तभी जाते थे। छत के दरवाजे पर ताला लगा रहता है और छत पर जाने के लिए चाबी दूसरे तल्ले यानी टॉप फ्लोर वालों से मांगनी पड़ती है। वैसे छत की एक-एक चाबी हर फ्लैट वाले के पास होनी चाहिए, क्योंकि हरेक की पानी की टंकी है वहां। कब किसे देखने जाना पड़ जाय! लेकिन ‘स्टेट हाउसिंग अथॉरिटी’ की इस कॉलोनी के अलिखित नियम के मुताबिक यहां की बिल्डिंगों की छतें दूसरे तल्ले वालों की ही होकर रह गई थीं। हर किसी ने छत पर अपनी-अपनी बरसातियां, कमरे बना रखे थे। भूतल के फ्लैट वालों की हामी से तो घरों को जितना मर्जी आगे बढ़ा लो, जितनी मर्जी सरकारी जमीन हड़प लो, बालकनियां, छज्जे बना लो, कोई पूछने वाला नहीं। नगरपालिका के लोग आते हैं, दो-चार दिन काम बंद रहता है, फिर जोर-शोर से शुरू।

एक जैसी बनाई गई इन इमारतों को तो अब पहचानना भी मुश्किल, कि यह वही ‘स्टेट हाउसिंग अथॉरिटी’ की बनाई हुई कॉलोनी है, जिसमें सभी फ्लैट एक जैसे बने थे, कुछ दो बेडरूम वाले और कुछ तीन बेडरूम वाले! अब तो सभी फ्लैटों की अलग-अलग रंगत, सभी के अलग-अलग आकार। दो बेडरूम वाले फ्लैटों में तीन बेडरूम हो गए थे, तीन वालों में चार। सिर्फ बिशन दास वाली बिल्डिंग में अभी तक कोई फ्लैट मालिक कोई गैरकानूनी एक्सटेंशन नहीं कर पाया था। उनका नीचे वाला फ्लैट था, भूतल का और उन्होंने न खुद कोई गैरकानूनी विस्तार किया था अपने फ्लैट में और न ऊपर वालों को करने दिया था। हां, इसकी खासी कीमत जरूर चुकानी पड़ी थी उन्हें। पूरे मोहल्ले में वे शिकायती बाबू के नाम से मशहूर थे। कोई उनसे सीधे मुंह बात करने को राजी नहीं था। जब भी किसी बिल्डिंग में कोई गैरकानूनी विस्तार होता, वे झट पुलिस को फोन कर देते। पुलिस आती, फिर नगरपालिका के लोग आते, दो-चार दिन काम बंद रहता, फिर पहले से भी जोर-शोर से शुरू हो जाता। और वे खून का घूंट पीकर रह जाते। पत्नी उन्हें तसल्ली देती, ‘चलो, पैसे तो दबा कर खिलाने ही पड़े होंगे इन लोगों को। अब छोड़ो, तुम फिक्र न करो। जब हमारे घर के ऊपर वाले पड़ोसी करेंगे, कोई गैरकानूनी एक्सटेंशन, तब देखी जाएगी।’

फिक्र क्यों न करें! बचपन से ही कोई गलत बात चुपचाप न सहने की सीख पाई थी उन्होंने। चाहे घर हो या बाहर, अन्याय और अनाचार के खिलाफ हमेशा आवाज उठाते रहे। सिर्फ भाई भाई थे वे, बहन कोई नहीं। मां दिन भर बाइयों की-सी खटतीं। एक वही थे, जो स्कूल से लौट कर उसके कामों में हाथ बंटाते। पिता को मां के ऊपर हमेशा अन्याय करते ही पाया। बात-बात में उसे नीचा दिखाना, अपमानित करना, बच्चों के सामने ही मारपीट करना। अभी मसें भी न भीगी थीं उनकी कि ऐसे ही एक क्षण, उन्होंने दौड़ कर सहसा मां पर उठा अपने पिता का हाथ बीच में ही पकड़ लिया था और अंगारों-सी दहकती दृष्टि से उन्हें देखा था। उसके बाद पिता की हिम्मत नहीं हुई थी, मां पर कटाक्ष भी करने की।

पिता पर निर्भर रहना भी बहुत जल्दी छोड़ दिया था उन्होंने। मेधावी थे। अपने से छोटी कक्षाओं के छात्रों की ट्यूशन लेते हुए, उन्होंने अपनी कॉलेज, यूनिवर्सिटी की पढ़ाई की। कई नौकरियां बदलीं, क्योंकि अपने काम से काम रखने के बजाय, व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने के पीछे लग पड़ते और नतीजतन वहां से उनका ही पत्ता काट दिया जाता। आखिरकार, इंडियन स्टील प्रोडक्ट्स की अपनी आखिरी नौकरी में वे रिटायरमेंट तक टिके रहे, कारण कि इसके मालिक का रवैया भी उनके विचारों से मिलता-जुलता था और इसीलिए वहां उन्हें अपने ढंग से काम करने की पूरी छूट मिली हुई थी। इसी नौकरी में रहते, उन्होंने कंपनी के कर्ज से किश्तों पर यह घर लिया था। बेटों को पढ़ाया था। वे दोनों उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना चाहते थे। वे नहीं माने, ‘पहले अपने देश को तो जांच-परख लो।

क्या-क्या अवसर नहीं हैं यहां?’ बेटे काबिल थे दोनों। अपने ही बलबूते पहुंच गए विदेश, अमेरिका। आगे पढ़ने के लिए। एक तो वहीं नौकरी पकड़, हमेशा के लिए वहीं टिक गया। दूसरा लौट आया, पर उनके शहर में नहीं, मुंबई में नौकरी पर लगा और वहीं का होकर रह गया। माता-पिता को पैसे भेजने की पेशकश दोनों लड़के करते, पर उनका तो यही जवाब, ‘अपने भविष्य के लिए बचाओ बच्चो! हमारा गुजारा तो चल ही रहा है। ‘पत्नी को उन्होंने कड़ी हिदायत दे रखी थी कि लड़कों के आगे कभी हाथ नहीं फैलाने और जितनी चादर है उतने ही अपने पैर पसारने हैं। यह उनके आत्मसम्मान का सवाल था। आदमी का हाथ हमेशा देने के लिए उठना चाहिए, लेने के लिए नहीं। तो अपने ही बच्चों के आगे हाथ क्या फैलाना!

बहरहाल, बिशन दास सीढ़ियां चढ़ते अपनी बिल्डिंग की छत तक पहुंचे, तो वहां का नजारा देख सन्न रह गए। पानी की टंकियों की जगह छोड़, बाकी की सारी छत सीमेंट के बोरों, ईटों, रेत और रोड़ी आदि से पटी पड़ी थी। दो मजदूर छेनी-हथौड़े से छत की फर्श छील रहे थे और राजमिस्त्री लोहे के सरियों को काटने की जुगत में हथौड़े चला रहा था- ‘ठाक्क-ठाक्क ठाक्क-ठाक्क’। उन्हें देख, थोड़ी देर के लिए उन्होंने काम रोक दिया और फिर यथावत अपने-अपने काम में लग गए।

वे चिल्लाए: ‘ऐ, यह क्या हो रहा है? बंद करो ये सब!’ मजदूर कुछ डर से गए और किंकर्तव्यविमूढ़ से उन्हें ताकने लगे। ‘कहां है तुम्हारा मालिक? कौन करा रहा है यह सब?’
राजमिस्त्री ने अपना मोबाइल निकाला और बोला: ‘जी, नीचे वाले साहब, टॉप फ्लोर वाले सुरिंदर साहब…’
‘बुलाओ उनको।’ वे गरजे।

शीघ्र ही सुरिंदर साहब छत पर नमूदार हुए। झक सफेद कुर्ता पायजामा पहने। उंगलियों में नगीने जड़ी कई अंगूठियां, गले में सोने की मोटी चेन। शांत भाव से मुस्कराते हुए बोले: ‘कहिए हुजूर? अरे अरे, आप तो ग्राउंड फ्लोर वाले बिशन दासजी हैं न? सुना है, आपके बारे में। नीचे घर से कुछ चाय-वाय मंगाऊं सर, आपके लिए?’
उनका ब्लड प्रेशर तेजी से बढ़ने लगा था। गुस्से से भरी आवाज में वे बोले: ‘मिस्टर सुरिंदर! आप छत पर ये क्या करने जा रहे हैं?’

‘कुछ नहीं सर, बस दो कमरे बनाएंगे और दो अटैच्ड बाथरूम, जैसे कि बाकी सबने बना रखे हैं यहां।’ टॉप फ्लोर के मालिक ने वैसे ही शांत भाव से जवाब दिया।
उनका दुबला-पतला शरीर गुस्से में लगभग थरथराने लगा था, ‘नहीं, आप यह नहीं कर सकते। हरगिज नहीं करेंगे आप ऐसा। हम यहां पिछले बीस सालों से रह रहे हैं और हमने किसी को यहां एक र्इंट नहीं डालने दी। आप भी नहीं कर सकते यह सब!’

‘क्यों नहीं कर सकते हम ऐसा, मिस्टर बिशन दासजी? जब बाकी के सभी टॉप फ्लोर वालों ने आलरेडी कर रखा है?’
‘करा होगा। पर मैं ऐसा हरगिज नहीं होने दूंगा, अपनी बिल्डिंग में। बिल्डिंग की छत सिर्फ आपकी नहीं है, यह हम सबकी कॉमन जगह है, हमारी टंकियां हैं यहां। आपके इस कंस्ट्रक्शन से, भूकम्प आने पर, बिल्डिंग के गिर जाने का खतरा है। इसकी नींव एक और एक्स्ट्रा फ्लोर बनाने के लिए, उतनी मजबूत नहीं बनाई गई थी।’
‘अरे हजूर, आप नाहक परेशान हो रहे हैं। अगर भूकम्प आएगा ही, तो सभी बिल्डिंगें गिरेंगी। आप-हम ही बच कर क्या करेंगे…।’

अब बात उनकी बर्दाश्त से बाहर हो गई थी। वे गरजे: ‘मिस्टर सुरिंदर, मैं आपको समझा रहा हूं कि आप यह कंस्ट्रक्शन तुरंत रोक दें, वरना…।’ वे गुस्से में भड़भड़ाते सीढ़ियां उतर नीचे अपने घर चले आए।

छत से ठाक्क-ठाक्क की आवाजें और भी जोरों से आने लगी थीं।
पत्नी ने बहुत समझाया कि अब उनकी उम्र हो गई है, अब उनके लिए ऐसे परेशानियां मोल लेना ठीक नहीं।
वे पत्नी पर भी बरस पड़े, ‘बस, यही तो दिक्कत है। घर में भी सपोर्ट नहीं मिलता। देख लेना, यह बिल्डिंग अब रहने लायक नहीं रहेगी। दिन भर की ठाक्क-ठाक्क, सीढ़ियां सीमेंट-गारे से गंदी रहेंगी, रेत उड़ती रहेगी।… नहीं नहीं, मैं नहीं होने दूंगा यह इल्लीगल कंस्ट्रक्शन।… मैं कल ही मिलने जाऊंगा हाउसिंग कमिश्नर से।…’
पत्नी उनके स्वाभाव से परिचित थी। जानती थी कि वे अपनी बिल्डिंग की छत पर हो रहे गैरकानूनी निर्माण को रुकवाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। तो, इनको समझाना व्यर्थ था।

वे गई रात तक, कमिश्नर को सौंपने के लिए अपना ‘कंप्लेंट लेटर’ लिखते रहे थे।
दूसरे दिन वे सुबह-सुबह तैयार होकर हाउसिंग कमिश्नर के दफ्तर के लिए निकल पड़े।
सुबह का समय कमिश्नर साहब का अपने स्टाफ के साथ मीटिंग का रहता है, दिन भर के एजेंडे पर विचार करने का। उन्होंने सोचा नहीं था। खैर, इंतजार बेकार नहीं गया। उनकी शिकायत का मजमून जान कर और उनकी बुजुर्गियत का लिहाज कर, उन्हें जल्दी बुला लिया गया था।

ऐसी शिकायतें अमूमन कमिश्नर साहब का प्राइवेट सेके्रटरी देखता था, लेकिन वे नहीं माने, मुद्दा गंभीर था और उन्हें कमिश्नर साहब से ही बात करनी थी। तो, उनसे उन्हें मिलवा दिया गया।

कमिश्नर साहब ने बात काफी ध्यान से सुनी और गैरकानूनी निर्माण करने वाले टॉप फ्लोर वालों का पूरा नाम-पता अपने सामने रखे स्क्रिबलिंग पैड में नोट किया। बिशन दास ने अपनी लिखित शिकायत उनके आगे बढ़ानी चाही, तो हाथ के इशारे से कमिश्नर साहब ने उन्हें उसे अपने ही पास रहने देने को कहा, ‘प्लीज डोंट वरी, आप फिक्र न करें। हम देख लेंगे।’
वे फूले नहीं समा रहे थे। लौटते हुए, उनके प्राइवेट सेके्रटरी से उनका डायरेक्ट फोन नंबर भी लेते आए थे। घर लौटे तो देखा, ऊपर से ठाक्क-ठाक्क और शोरगुल की कोई आवाज नहीं आ रही थी। तो, इतनी जल्दी हो गई थी कार्रवाई! तसल्ली उनके हाव-भाव से साफ झलक रही थी।

विजयोल्लास में भर पत्नी से बोले, ‘तुमने देखा! हिम्मत हारने से काम नहीं चलता। बंद करा दिया न उनका काम!’
पत्नी हैरान थी और मन ही मन खुश भी कि चलो उनके पति का मान रह गया और दिन भर की ठाक्क-ठाक्क, शोर-शराबे से भी निजात मिली। शांति थी घर के आसपास!
यह क्या? पांच दिनों की शांति के बाद, फिर से वही ठाक्क-ठाक्क!

वे असमंजस में थे। यह आखिर कैसे हो रहा है? कमिश्नर साहब ने तो उन्हें पूरा आश्वासन दिया था। तो क्या…? उनका सिर भन्नाने लगा। तो क्या ये लोग इतने ताकतवर हैं कि…?
उन्होंने कमिश्नर साहब के डायरेक्ट नंबर पर फोन घुमाया। फोन उनके पीएस ने उठाया। सारी बात सुन कर वह बोला कि कमिश्नर साहब को उनका मैसेज दे देगा।
बहरहाल, जब ऊपर काम नहीं रुका, तो उन्होंने समझा कि शायद कमिश्नर साहब को इस बाबत बताया नहीं गया होगा, उनका संदेश उन्हें दिया नहीं गया होगा। तब उन्होंने तय किया कि वे फिर से जाकर उनसे मिलेंगे और सब बताएंगे उन्हें। इन लोगों ने शायद उनके नीचे वाले लोगों से मिलीभगत करके फिर से काम शुरू करवाया होगा।

दूसरे दिन वे फिर कमिश्नर साहब से मिलने पहुंचे। इस बार वे जल्दी नहीं गए थे, सही समय पर गए थे। पहुंचे, तो उन्हें बताया गया कि कमिश्नर साहब तो छुट्टी पर हैं। उन्हें बड़ी हैरानी हुई। छुट्टी पर होते, तो रिसेप्शन वाले उनसे मिलने का पास क्यों बनाते? उनका माथा ठनका, हो न हो दाल में कुछ काला है।

पर, उन्होंने कोशिश नहीं छोड़ी। रोज कई बार उनके डायरेक्ट फोन पर बात करने की कोशिश करते। फोन न लगने पर कई बार मिलने भी पहुंचे, लेकिन न तो दुबारा उनकी हाउसिंग कमिश्नर से बात हो सकी और न मुलाकात। और ऊपर छत पर टॉप फ्लोर वालों का काम तेजी से जारी रहा। काम पूरे दो महीने चला। वहां उनके दो कमरे मय अटैच्ड बाथरूम तैयार हो गए थे। उन लोगों ने अपने टॉप फ्लोर के घर की बालकनी से ऊपर छत वाले कमरों में जाने-आने के लिए सीढ़ी भी बना ली।

बिशन दास पिछले दो महीनों से बीमार हैं। लगभग खाट ही पकड़ ली है उन्होंने। दवाएं लेने पर भी उनका रक्तचाप कम नहीं होता। डॉक्टर कहते हैं कि उन्हें हृदयघात का खतरा है।
उनकी पत्नी कुसुम ने उनकी तमाम हिदायतों के बावजूद, अपने दोनों बेटों से बात कर ली है। छोटा बेटा सुनते ही चला आया। बड़े ने भी मुंबई से आने के लिए टिकट बुक कर ली है।
वे दोनों पति-पत्नी अब अपने मुंबई वाले बेटे के पास रहने चले जाएंगे।
उनका यह ग्राउंड फ्लोर का फ्लैट अब बिकाऊ है।

(उषा महाजन)

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