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नाज खान का लेख : कॉमिक्स बनाम फिल्में

बच्चों के मनोरजंन का साधन आज भले ही तकनीकी खिलौनों, आई पॉड, वीडियो गेम आदि हों, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब कॉमिक्स और कई बाल पत्रिकाएं बच्चों को सीख देने के साथ उनके मनोरंजन का जरिया भी हुआ करती थीं।
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 06:34 am
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बच्चों के मनोरजंन का साधन आज भले ही तकनीकी खिलौनों, आई पॉड, वीडियो गेम आदि हों, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब कॉमिक्स और कई बाल पत्रिकाएं बच्चों को सीख देने के साथ उनके मनोरंजन का जरिया भी हुआ करती थीं। सप्ताह में आने वाली कॉमिक्स का बच्चे बड़ी बेसब्री से इंतजार किया करते थे और पढ़कर उसके पात्रों की बातें एक-दूसरे को सुनाया करते थे। भारत में कॉमिक्स प्रकाशन की शुरुआत विदेशी कॉमिक्स पात्रों के हिंदी में अनुवादित प्रकाशन से 1964 में हुई थी। तब ‘द फैंटम्स बेल्ट’ के नाम से ली फॉक के प्रसिद्ध पात्र फैंटम पर कॉमिक्स का प्रकाशन हुआ था।

1966 में प्रथम हिंदी कॉमिक्स ‘वेताल की मेखला’ प्रकाशित हुई। कॉमिक्स की दुनिया में 1971 में चाचा चौधरी का पदार्पण हुआ और इसके बाद पिंकी, बिल्लू, रमन जैसे कॉमिक्स किरदारों ने जन्म लिया।

यह ऐसे किरदार थे जिन्होंने न सिर्फ बच्चों को अपना दीवाना बनाया बल्कि बड़ी उम्र के लोग भी इन्हें पढ़ते थे। साथ ही चाचा चौधरी जैसे अक्लमंद किरदार बच्चों के आदर्श थे। डायमंड कॉमिक्स के लंबू-मोटू, चाचा-भतीजा, मामा-भांजा जैसे नायक अस्सी के दशक में भारतीय कॉमिक्स बाजार पर छाए हुए थे। यह कॉमिक्स का ऐसा काल समय था जब हिंदी और अंग्रेजी के अलावा प्रांतीय भाषाओं में भी कॉमिक्स प्रकाशित हुए। हालांकि 1990 के दशक में केबल टीवी के प्रसारण ने कॉमिक्स बाजार को बड़ा झटका दिया और कॉमिक्स के पाठकों की संख्या में काफी गिरावट आई।

हालात यह हुए कि सारे कॉमिक्स प्रकाशन बंद होने की कगार पर पहुंच गए। इसकी एक बड़ी वजह यह भी थी कि इस समय तक कागज और छपाई की कीमतें काफी बढ़ गई थीं और ऐसे में कॉमिक्स का प्रकाशन घाटे का सौदा साबित हो रहा था। हालांकि केबल टीवी से पहले दूरदर्शन पर भी कार्टून दिखाए जा रहे थे, लेकिन इस पर सिर्फ रविवार को बच्चों के कार्टून दिखाए जाते थे, जो हिंदी में डब हुआ करते थे। यह ऐसे कार्टून थे जो बच्चों को मनोरंजन के साथ सीख भी देते थे। इसलिए कॉमिक्स बाजार ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ था। केबल टीवी प्रसारण के बाद तो बच्चों का रुझान टीवी की ओर इतना ज्यादा हुआ कि कार्टून चैनल में इजाफा होता रहा। इन टीवी चैनलों पर ल्पर 24 घंटे कार्टून दिखाए जाते हैं।

आज बच्चे विदेशी कार्टून किरदारों, सुपर हीरो, स्पाइडर मैन, बैटमैन के दीवाने हैं। इन कार्टून किरदारों को दिखाने का मकसद महज बच्चों को हंसाना भर है। वहीं शिनचैन और डोरेमोन जैसे प्रसिद्ध कार्टून पात्रों को माता-पिता अधिक पसंद भी नहीं करते क्योंकि इन्हें देखकर बच्चे गुस्सैल और झगड़ालू बन रहे हैं। टीवी के अलावा अब बड़े पर्दे पर भी न सिर्फ कार्टून फिल्में बल्कि थ्री-डी एनिमेटेड फिल्मों का दौर चल पड़ा है। 2010 में भारत की पहली थ्री-डी एनिमेटेड फिल्म ‘टूनपुर का सुपर हीरो’ बड़े पर्दे पर नजर आई।

बुद्धू बॉक्स हो, वीडियो गेम, आइपॉड हो या मोबाइल- इनके जरिए बच्चों की दुनिया सीमित हो गई है। उनकी सूझबूझ और अपनी समझ से कॉमिक्स या अखबार की चित्रकथा को गढ़ने की सोच नदारद है।

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