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चंद्रकांता शर्मा का लेख : मौजूदा दौर में बाल साहित्य

कहानी, उपन्यास, लेख और आलोचना साहित्य लिखने वाले लोग ही बाल साहित्य भी लिखते हैं, लेकिन वे इस बात से बेपरवाह हो जाते हैं कि बच्चों का साहित्य दर्जा कुछ ज्यादा नरमी की मांग करता है।
प्रतीकात्मक तस्वीर।

देश में बाल साहित्य और बाल पत्रिकाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है। इसके नाम पर जो साहित्य परोसा जा रहा है, वह बच्चों में हताशा, निराशा और नासमझी का संचार कर रहा है। अधिकतर पत्रिकाएं क्षेत्र विशेष तक ही सीमित हैं। ये बाल पत्रिकाएं भले ही बहुत रंगीन चकाचौंध के साथ आ रही हैं, लेकिन इनमें सामग्री का स्तर बाल साहित्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। मनोरंजन और जानकारी के नाम पर ऐसी वैज्ञानिक सामग्री प्रस्तुत की जा रही है कि वह बड़े पाठकों के लिए भी दुर्बोध और जटिल है तो बच्चे क्या समझ पाएंगे।

अनोखे और विचित्र जीव-जंतुओं से लेकर रोचक ऐतिहासिक सत्यों से अवगत कराया जा रहा है। इससे बच्चों में सनसनीखेज समाचारों और कुतुहलपूर्ण सामग्री के प्रति चाव तो जगता है, लेकिन इससे बच्चों की रचनाशीलता का विकास नहीं हो पाता। इससे मौलिक बाल साहित्य को बड़ी ठेस लग रही है।

बाल साहित्य के सच्चे साहित्यकार इससे अलग-थलग पड़ गए हैं। उनकी एवज में नितांत पेशेवर और छिछले लेखकों ने अपना आधिपत्य जमा लिया है, जो एक से एक नवीन जानकारी के नाम पर ऐसी फीचर रचनाएं दे रहे हैं, जो बच्चों की समझ से परे ही कही जाएंगी। हमारे यहां निकलने वाली बाल पत्रिकाओं में नंदन, चंपक, सुमन सौरभ, बाल भारती, लोट-पोट, बाल हंस आदि प्रमुख हैं।

इनके अलावा भी कम प्रसार वाली भी कुछ पत्रिकाएं निकल रही हैं, जिनकी पहचान सीमित है। कुछ पत्रिकाएं केवल चित्रकथाओं तक सीमित हैं। वैसे बाल वाटिका, नन्हे सम्राट, मधु-मुस्कान, पमपम, चकमक और हंसती दुनिया भी प्रकाशित हो रही हैं, लेकिन इनकी प्रसार संख्या और प्रसार क्षेत्र में वृद्धि नहीं हो पा रही है।

समय की मार से पराग, मेला, बाल मेला, राजा भैया, मुन्ना और नन्हे तारे आदि पत्रिकाएं बंद हो गई। हालांकि, इनमें बाल साहित्य का स्तर बाल-मनोविज्ञान के ज्यादा निकट और मार्मिक था, लेकिन वे दौड़ में नहीं चल पार्इं और बंद हो गर्इं। यह स्थिति बाल पत्रिकाओं के लिए दुखद ही मानी जाएगी।

जो पत्रिकाएं निकल रही हैं, वे जैसे-तैसे चल भर रही हैं, बाकी की हालत बहुत कमजोर हैं। इसलिए इस परिपे्रक्ष्य में बाल पत्रिकाओं की रीति-नीति और विचार साहित्य पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। वर्ना किसी तरह चल रही पत्रिकाओं पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

बाल पत्रिकाएं अपना स्तर, बिक्री और प्रसार कैसे बनाए रखें, यह आज एक अहम मुद्दा है। बदले युग की जरूरतों के अनुसार साहित्य का स्वरूप तो बदलना चाहिए, लेकिन मौलिक साहित्य ही इसमें समाहित होकर नष्ट होने लगे तो यह स्थिति दुखदायी है। बाल साहित्य का मुख्य आधार, बाल कथाएं, बाल उपन्यास और बाल कविताओं का भविष्य तो जैसे गड्डमड्ड हो गया है।

कुछ पत्रिकाओं ने बालोपयोगी रचनाओं की जगह वन्य जीवन, विज्ञान समाचार विचित्र किंतु सत्य आदि उत्तेजक सामग्रियों से अपना पेट भरना शुरू कर दिया है। नंदन और चंपक ने कथा साहित्य को साधा हुआ है, लेकिन वे भी अपने बाजार की चिंता में रफ्ता-रफ्ता परिवर्तन कर रहे हैं। इस बदलाव का अर्थ अनुचित तो नहीं है, लेकिन मौलिक बाल साहित्य को इससे नुकसान पहुंचा है। शौर्य, देश प्रेम, निष्ठा, लगन, मेहनत, सांस्कृतिक महत्त्व की सामग्री को कम कर देने या न देने से बाल पत्रिकाएं दायित्वशील नागरिक निर्माण की पहल में भी भूमिका सही रूप में निभाने में विफल रही हैं। बाल साहित्य को एक खास परिभाषा में ढाल कर सृजन करने से ही साहित्य और पत्रिकाओं का भला हो सकता है। इस तरह ध्यान देना जरूरी है।

बाल साहित्य की भाषा भी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। आज के तमाम लेखक बाल साहित्य और बड़ों के साहित्य की भाषा को लेकर कहीं भी चिंतित नजर नहीं आते। वे वही भाषा लिखते हैं जो अन्य साहित्य लेखन में काम में लेते हैं। यही नहीं वे विषय भी वे ही उठा लेते हैं, जिनमें बच्चों की समझ जवाब दे जाती है। हुआ यह भी है कि बाल साहित्य को समर्पित लेखक दिनोंदिन कम हो रहे हैं।

कहानी, उपन्यास, लेख और आलोचना साहित्य लिखने वाले लोग ही बाल साहित्य भी लिखते हैं, लेकिन वे इस बात से बेपरवाह हो जाते हैं कि बच्चों का साहित्य दर्जा कुछ ज्यादा नरमी की मांग करता है। बच्चों के मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर उनका मनोविज्ञान जानकर ही भाषा सौंदर्य को काम में लेना चाहिए। अन्यथा बच्चे उस पत्रिका में से गिनी-चुनी चीजें पढ़कर उसे फेंक देते हैं। संपादक भी ऐसे होने चाहिए जो बाल साहित्य की गहराई समझते हों।

महापुरुषों के जीवन प्रसंग से लेकर युग प्रधान समस्याओं का समावेश बाल साहित्य की श्रेणी में आता तो है, लेकिन उसकी प्रस्तुति में सरल भाषा और सटीक विषयों का चयन जरूरी है। बाल पत्रिकाओं के सुरक्षित भविष्य के लिए उचित बाल साहित्य के साथ-साथ पत्रिकाओं के संचालकों को बाल मनोविज्ञान को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ०

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