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कविता- तुक्का मारो

शादाब आलम की कविता।
Author November 12, 2017 05:15 am
प्रतीकात्मक चित्र।

शादाब आलम

तुक्का मारो

मेरी मुट्ठी के अंदर क्या टिंकू भइया
तुक्का मारो?
माचिस की छोटी-सी डिब्बी
में होंगी कितनी तीली?
मेरे मुंह में टॉफी है जो
लाल, हरी या है पीली?
देगी कितना दूध आज,
अब्दुल की गइया
तुक्का मारो?
हरे मटर की इन दो फलियों
में कुल कितने दाने हैं?
मेरे दादा के ये जूते
कितने साल पुराने हैं?
कहां गिरेगी अभी कटी,
वह जो कनकइया
तुक्का मारो?
मीठे में क्या खाया मैंने
आज सुबह करके मंजन
खन-खन खनके गुल्लक मेरी
इसके अंदर कितना धन?
मेरे बस्ते में कितनी, कागज की नैया
तुक्का मारो?

शब्द-भेद

कुछ शब्द बोलने में एक जैसे जान पड़ते हैं, इसलिए उन्हें लिखने में अक्सर गड़बड़ी हो जाती है। इससे बचने के लिए आइए उनके अर्थ जानते हुए उनका अंतर समझते हैं।

आसमान / असमान

पृथ्वी के ऊपर का वह सारा हिस्सा, जहां बादलों का डेरा लगता है- आसमान कहलाता है, जबकि असमान का अर्थ है कि जो समान न हो, बराबर न हो।

 

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