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कविता- कविजी! आप क्या कर रहे हैं?

सदानंद शाही की कविताएं।
Author October 22, 2017 04:47 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

कविजी! आप क्या कर रहे हैं?

मोर्चे पर तैनात सिपाही
देश की सेवा कर रहा है
किसान जो खेत में अन्न उगा रहा है
मजदूर जो सड़क पर पसीना बहा रहा है
मल्लाह जो बाढ़ में नाव चला रहा है
बढ़ई जो आपके लिए कुर्सियां गढ़ रहा है
वह भी देश की सेवा कर रहा है।

बगीचे में गुल्ली-डंडा खेलने वाले
अधनंगे बच्चे
गाय चराने वाला ग्वाला
भेड़ चराने वाला गड़ेरिया
सब देश की सेवा कर रहे हैं
जो समय की नब्ज पर हाथ धरे
कागज काला कर रहा है
अध्यापक जो छात्रों को शिक्षित कर रहा है
डॉक्टर जो रोगी का इलाज कर रहा है
नर्स जो मरीज की देखभाल कर रही है
त्योहार के मौसम में भी जो बैंक में बैठा
रुपए गिन रहा है
जो सिपाही चौराहे पर खड़ा
ट्रैफिक कंट्रोल कर रहा है
वह भी देश की सेवा कर रहा है।

जो गुब्बारे फुला रहा है
जो पतंग बना रहा है
जो पान लगा रहा है
जो कपड़े धो रहा है
जो एक एक र्इंट चुन रहा है
जो उतरता है सीवर में
जहरीली गैस का शिकार बनने
जो रात को
जागते रहो का हांका लगा रहा है
वह भी देश की सेवा कर रहा है
अंधेरी गलियों में जो पापड़ और बड़ियां बना रही हैं
असंख्य झुर्रियों में चेहरा छुपाए जो गोबर पाथ रही हैं
औरतें जो मुंह अंधेरे घर से निकल रही हैं
इस उस घर में झाडू पोंछा करने
वे सब भी देश की सेवा कर रही हैं

कवि जी! आप क्या कर रहे हैं?
काश

काश कि एक दिन
दुनिया भर के टैंक
सीमाओं से हटा दिए जाते
पंहुचा दिए जाते संग्रहालयों में
जहां बच्चे देखते
और देख कर चिहाते
कि लो यह भी कभी डरने-डराने की चीज था
चहकते और खुश होते
खिलौने की सूची में
शामिल नए मेहमान पर।

सीमाओं पर होने लगती
फूल की खेती
सुगंध फैलती
इस पार भी
उस पार भी
लड़कियां फूल चुनने आतीं
इधर से भी
उधर से भी
लड़के रंगबिरंगी तितलियों के पीछे भागते हुए
आ जाते इस पार
और बिल्कुल नहीं डरते
कि आ गए गैर मुल्क में
सीमा रेखा बन जाती
कबड्डी की रेखा
पढ़ाते हुए जा सकते
इस पार से उस पार
उस पार से इस पार
लोगों के आने और जाने से मिट जाते
टैंक के निशान। ०

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