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कविताएं- मेरी संतान

उद्भ्रांत की कविताएं।
Author August 6, 2017 04:37 am
प्रतीकात्मक चित्र।

 उद्भ्रांत  
मेरी संतान

अक्सर टीवी पर
फिल्म का कोई भावुक दृश्य,
या कभी-कभार कोई नाटक देखते,
या पढ़ते कोई मर्मस्पर्शी संस्मरण,
उपन्यास या कहानी,
कोई ललित निबंध,
यहां तक कि
कबीर निराला मुक्तिबोध
के काव्य की आलोचना;
आंखें हो जातीं नम
मीरां के पद तो
आधिकारिक आमंत्रण ही होते
आंखों में अनायास-
तिर आए जल का।
आखिर यह क्या है?
और कैसे है?
लगता कि मैं
अनंतकालीन समय से रही आई
बालू का एकमात्र ढूह
जिसकी छाया में रह
मेरी ही संतान-
मुझको,
कि मेरे समय को
पहचानने
उसके वास्तविक स्वरूप में-
कर रही संघर्ष
जन्म लेने के वास्ते।

सेंध

सुबह उठना है तड़के,
बत्ती को बंद कर
बिस्तर पर गया साढ़े ग्यारह बजे।
अंधेरा तो था ही,
आंखों के मुख्य द्वार को भी किया बंद।
निद्रा देवी का
किया आह्वान;
जैसे समय के प्लैंचेट पर
मृतात्मा-प्रकाश का करे कोई!
कोई सुगबुग नहीं।
दार्इं,
फिर बार्इं,
फिर दार्इं,
फिर बार्इं ओर;
करवटें बदलता रहा बार-बार।
लेटा शवासन में चित्त,
फिर पट्ट हुआ-
तकिए को पेट से सटाए।
नहीं कोई झंकृति!
सेंध लग चुकी थी
नींद के कच्चे बालू के भवन में।
कोई चोर कर रहा था।
आहिस्ते से-
अपना काम
तब मैंने
अंधेरे में आंखें खोल कर देखा
सेंध लगी थी
आजादी में।
सपना जो
देखने चला था मैं
उसमें सेंध।
परंपरा में भी,
विद्रोह में।
हैरत की बात थी-
सेंध लगाने वाला
चोर भाव से नहीं,
निधड़क हो
स्वामिभाव से-
लगा रहा था सेंध!
शायद उसे ज्ञात था कि
पीछे के चोर-द्वार का निकास
सीधे जुड़ जाता था-
सभी अमूल्य चीजें
औने-पौने दाम में बेचने वाले
शहर के अकेले
लेकिन बड़े प्रसिद्ध
चोर बाजार से!
कविता में सेंध लगाती हुई
शातिर चोर कल्पना-
हठपूर्वक-वस्तुत:-
जीवन के सुदृढ़ किले में
लगा चुकी थी सेंध! ०

 

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