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कविताएं- जीभ ले रही चटखारे

जनसत्ता कविताएं
Author July 16, 2017 05:21 am
प्रतीकात्मक चित्र।

रावेंद्र कुमार रवि

जीभ ले रही चटखारे

चाय बनाई पापाजी ने
गरमागरम, मजा आया!

दीदीजी ने मिर्ची काटी
और बुआजी ने धनिया!
दादाजी ने बीन-बान कर
थोड़ा जीरा भून दिया!
चटनी पीसी चाचाजी ने
नरमानरम, मजा आया!

भइयाजी ने आलू काटे
और प्याज दादीजी ने!
नमक डाल कर घोला बेसन,
फेंटा फिर चाचीजी ने!
तले पकौड़े मम्मीजी ने
गरमागरम, मजा आया!

ऐसा हुआ देख कर मेरी
जीभ ले रही चटखारे!
जब मैंने आवाज लगाई,
बैठ गए मिल कर सारे!
चाय संग खा रहे पकौड़े
गरमागरम, मजा आया!
कहां छुपा कर रहा ग

 

कानों में
रस घोल रहा है!
कौन चिरौटा बोल रहा है?

लगता कभी
नहीं चुप होगा,
इसको भाती नहीं मौनई!
बहा रहा है
सुर का झरना!
कहां छुपा कर रहा गौनई?
क्या डालों पर डोल रहा है,
कौन चिरौटा बोल रहा है?

खिड़की के
पीछे है शायद,
या मुंडेर के है पिछवाड़े!
कैसे मैं
पहचानंू इसको
पड़े हुए हैं बंद किवाड़े!
क्या अपने पर तोल रहा है?
कौन चिरौटा बोल रहा है?

 

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First Published on July 16, 2017 5:20 am

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