December 03, 2016

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कविताएं: मनुष्यता के समाज का नागरिक, हंसने का हौसला

जयप्रकाश कर्दम की कविताएं।

Author November 20, 2016 01:31 am
प्रतिकात्मक चित्र।

जयप्रकाश कर्दम

मनुष्यता के समाज का नागरिक

यदि ईश्वर को मानना
उसके प्रति आस्थावान होना
परिभाषा है आस्तिकता की
तो घोषणा करता हूं मैं डंके की चोट
आस्तिक नहीं हूं मैं
मैं नास्तिक हूं, नास्तिक हूं
नहीं है किसी ईश्वर, अल्लाह
या गॉड से मेरा कोई रिश्ता
अर्थहीन है मेरे लिए ईश्वर
अस्वीकार्य है ईश्वर की दृष्टि में
समानता का पाखंड
हजारों साल तक
ईश्वर के साम्राज्य में
दीनता, निषेध और वर्जनाओं का
दंश सहता आया मैं
घोषणा करता हूं आज
अपने पूरे वजूद के साथ
ईश्वर के साम्राज्य का नागरिक नहीं हूं मैं
त्याज्य है मेरे लिए ईश्वर
बहिष्कृत है ईश्वर का साम्राज्य
मेरी आस्था का केंद्र है मनुष्य
मनुष्यता है मेरे लिए
सबसे बड़ा मूल्य
नागरिक हूं मैं
मनुष्यता के साम्राज्य का।

हंसने का हौसला

परेशान हैं लोग
उसे हंसते देख कर
देखते हैं कनखियों से
करते हैं कानाफूंसी उसके बारे में
एक-दूसरे से
विस्मित करता है उन्हें
उसे हंसते हुए देखना
छीन ली गई थी जिसकी हंसी
बंधक बना ली गई थीं
हंसने की संभावनाएं भी
सदियों पहले
कैसे हंसता है आज
वह आदमी
अनुत्तरित लौट आता है
हवाओं से टकरा कर
यह सवाल
नहीं समझ पाते वे इतनी सी बात
बंधक बनाई गई थी उनकी हंसी
बंधक नहीं बना था उसका
हंसने का हौसला
वह हंसता है
क्योंकि वह हंसना चाहता है
सीख लिया है उसने
हंसने का हुनर
वह हंसता है क्योंकि
हौसला है उसमें हंसने का
सहमे हैं लोग
उसके हौसले से। ०

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First Published on November 20, 2016 1:31 am

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