December 11, 2016

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कविताएं: सर्जकावतार

जनसत्ता कविताएं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

सर्जकावतार

ऐसे ही नहीं बना है एक दिन में
धरती के घूमते हुए चाक पर
किसी घड़े की तरह गढ़ा गया है इसे
प्रयत्नों और गलतियों की एक लंबी शृंखला के बाद
प्रकृति की संपूर्ण संभावनाओं को अपने भीतर समेटे
उपस्थित हुआ है यह सर्जकावतार!

ऐसे तो नहीं ही बनी है
इसकी सूक्ष्म-सर्जक हथेलियां
दुनिया के हर रहस्य को
अपने द्वारा गढ़े गए अक्षरों में
सुरक्षित कर लेने में सक्षम…

कितनी वनस्पतियों और कितने जानवरों के बाद
कितने अनुभवों और कितनी सूझों के बाद
विकसित, परिष्कृत और उपस्थित हुआ
यह रहस्यमय जीवनावतार
कितने तो बंदर बनाए प्रकृति ने
और उन्हें भटकने के लिए छोड़ दिया जंगलों में

प्रसन्नता में हिलती हुई दुम को गायब कर
रचे उसके मुस्कराते हुए अधर और कपोल
उसके चेहरे की हंसती और रोती हुई वे तमाम पेशियां
जो दुनिया में और किसी भी जानवर के पास नहीं हैं…

इसे प्रकृति ने ऐसे ही नहीं दिया है
जो नहीं है उसे भी संभव कर देने का रचनाधिकार…
यहां तक कि मिथ्या संभाषण या
झूठ बोलने की वह अपूर्व सामर्थ्य भी
जो उसे कुछ नया अनोखा और पूर्व-अनुपस्थित भी
रचने के लिए दी गई थी…

जिस क्षमता का ही उपयोग कर
किसी भी नृशंस अपराधी को
सत्यवाची हरिश्चंद्र का उत्तराधिकारी सत्यापित कर
अधिवक्तागण चलाते हैं अपनी आजीविका!

सृष्टि-संवाद

एक नन्हे से पौधे के सामने
मौन सिर झुकाए खड़ी है वह महिला
किसी विदेशी की आंखों से देखें तो
एक छोटी-सी झाड़ी के सामने सिर झुकाए
भाव-विह्वल रो रही है

कर रही है
अस्तित्व से अस्तित्व का
अत्यंत आत्मीय मूक-सृष्टि संवाद!

उसका बहुत दूर का रिश्तेदार है वह पौधा
विकास-क्रम में लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व से
बिछुड़ा हुआ उसका स्वजन और हितू
जाने-अनजाने अब भी पूछते हुए कुशल-क्षेम
भेजते हुए अब भी
अपने सही-सलामत होने की चिट्ठियां…

इसी सृष्टि में समानता का
वैध उत्तराधिकारी
अज्ञात आत्मीय और सुदूर का
स्ववंशी पट््टीदार है वह!

फूट रहा है प्रेम
प्रार्थना की एक आदिम मुद्रा में
सारे बदलावों के बावजूद
एक ही होने की वृहत्तर आत्मानुभूति के साथ…

ऐसे ही नहीं उसे देख कर
हंस रहे हैं गेंदा और गुलाब
अपनी-अपनी खूबसूरती पर इतरा रहे हैं
एक मनुष्य की आंखों और हाथों में…

जीवन की एक ही आदिम कोशिका के वंशज
और दूर के रिश्तेदार… ०

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First Published on November 6, 2016 12:19 am

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