December 10, 2016

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कविताएं: रुकना, बीता समय

कविताएं रुकना और बीता समय

Author November 13, 2016 00:47 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

जीतेंद्र श्रीवास्तव
रुकना

समय रुकता तो पोखर का पानी हो जाता
तुम रुकतीं तो जीवन आकाश हो जाता
हम दोनों साथ होते तो जीवन का छोर नहीं
सिर्फ ओर दिखता
लोग थक जाते ताकते-ताकते
सिर्फ खुशियों का जलधि विशाल दिखता
हंसी का उजास दिखता
पर न समय रुका
न तुम!
बस मैं ही रुका रहा स्मृतियों के घाट पर
अंजुरी में जल संभाले।

बीता समय

कल वर्षों बाद मिला वह कचहरी चौराहे पर
हम गले लगे
एक दूसरे का हालचाल पूछा
थोड़ी देर बैठे
चाय वाली गुमटी के सामने रखी बेंच पर
वह बहुत बदला-बदला सा था
थोड़ा थका-हारा भी
मैंने सोचा पूछूं-
‘तुम ऐसे तो न थे
नीम का-सा तीखापन था तुममें
सूख कबसे गर्इं
क्रोध में छलछला जाती आंखें?
तुम ऐसे तो न थे दोस्त!
तुम बोलते थे
जैसे तूफान आया हो कोई
तुम हंसते थे
और जान आ जाती थी लोगों में
तुम देखते थे
और लहरें उठ जाती थीं प्यार की
आखिर क्या हुआ कहां खो गया सब कुछ?’
मैंने अपने भीतर बहुत बल पैदा किया
कि पूछ लूं यह सब कुछ
पर कुछ भी नहीं पूछ पाया
बस निहारता रहा उसका उदास चेहरा
उसने गौर से देखा मुझे
चाय खत्म हो चुकी थी तब तक
उसने कहा- चलता हूं साथी फिर मिलेंगे!
और चला गया वह मेरे उन प्रश्नों को साथ लिए
जिन्हें पूछने का साहस नहीं कर पाया था मैं।

जीवन­राग

आज कबाड़ी ले गया वह आलमारी
जिसे खरीदा था मैंने बभनान के बाजार में
वह तपती मई की एक तिजहरी थी
जब ठेले पर लद कर वह पहुंची थी घर
और देर शाम भर गई थी किताबों से

उसमें लगे आदमकद शीशे के सामने खड़े होकर
अक्सर बेटियां इठलाती थीं अपनी मां के दुपट््टे लपेट कर
और मुस्कुराते थे हम दीया­बाती
कुछ तस्वीरें भी हैं उन दिनों की
जब हम साध रहे थे जीवन­राग
यह भी अजब संयोग है
कि मई की एक दोपहर फिर बिक गई वह
बदल गया किताबों का आशियाना
हमारा मूल्यवान संभालते­संभालते
आज बेमोल बिकी वह
कबाड़ी के लिए एक जर्जर टिन की चादर है
उसके लिए शायद उसे होना भी चाहिए इतना ही
वह नहीं हो सकता भाव विह्वल
और हम भी जब खरीद कर लाए थे उसे
तब कहां थी वह स्मृतियों का ऐसा एलबम
जिसमें शामिल हो बेटियों का बचपन
और हम दीया-बाती की भरपूर जवानी
अजीब शै हैं कबाड़ी भी
बारी­बारी चली जाती हैं वे सारी चीजें उनके साथ
जिनको बड़ी मुश्किल से
हमने शामिल किया होता है कभी जीवन में
जिनके शामिल होने से
रत्ती भर ही सही
जरूर आई होती है मुस्कान दीया-बाती के होठों पर।

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First Published on November 13, 2016 12:47 am

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