December 09, 2016

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 कविताएं: अच्छा नहीं लगता है

मिथिलेश श्रीवास्तव की कविताएं ।

Author October 30, 2016 00:02 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

अच्छा नहीं लगता है

मैंने उनसे आज कहा आपके पास आना
और गिड़गिड़ाना अच्छा नहीं लगता है
आपको खुदा और अन्नदाता कहना अच्छा नहीं लगता है
आप मुझे छुएंगे और मैं पत्थर से इंसान बन जाऊंगा
ऐसा सोचना अच्छा नहीं लगता है
अच्छा नहीं लगता है कि आप हंसें और कहें
आपका स्वागत है
जिंदगी में मैंने स्वागत के लिए कभी लार नहीं टपकाई
कभी मैंने नहीं चाहा मेरी उदासी में आप अपनी
हंसी मिलाएं
मेरी गरीबी के बारे में सोचें और अपनी सहानुभूति दिखाएं
वैसे इस देश में कोई कहीं सहानुभूति नहीं दिखाता
आपके बिना जी सकता है तो जी लेता है
आपकी हंसी के बगैर हंस सकता है तो हंस लेता है
लेकिन मेरा यह सब कहना भी अच्छा नहीं लग रहा होगा
मैं नहीं कहता यदि मुझे नींद आ गई होती
तब तो मैं एक अच्छा सपना देख रहा होता।

एक राज की बात

वह अपनी कुल्फी की दुकान सहेजे
ठीक दोपहर के बाद आता है
और अपने खरीदारों को घंटी की ध्वनि से
अपने आने की खबर देता है
पत्ते उस समय शांत होते हैं
और मुझे एक और दिन बीत जाने का एहसास होता है
और मैं उदास हो जाता हूं
एक राज की बात बताऊं, यह जीवन
शांत पत्तों, उदास मन और इस मिन्नत के साथ गुजर रहा
कि कोई हवा का झोंका आएगा और पत्तों को हिलाएगा
इस उदास मन को कुल्फी हमेशा बेस्वाद लगी है।

 

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First Published on October 30, 2016 12:02 am

सबरंग