December 06, 2016

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कविता: मत्स्य न्याय

रमणिका गुप्ता की कविताएं।

Author October 23, 2016 00:18 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

मत्स्य न्याय

हमने सुना है
पढ़ा भी था बचपन में
कानून मनुष्य के लिए गढ़ा गया था
मनुष्य कानून के लिए नहीं
जंगल में लागू है लेकिन
शेर-बकरी का कानून

एक दिन शेर ने नदी किनारे
पानी पीते-पीते
तर्क देकर धमकाया था
बकरी को
‘पानी जूठा मत कर
देखती नहीं मैं जंगल का राजा हूं’

‘मैं तो निचले घाट पर हूं महाराज
आपका जूठा पानी
पी रही हूं’
बकरी मिमियाई

सिंह ने घुड़की दी
‘तुम्हारे बाप ने कल
इसी जगह पानी पिया
और जूठा कर दिया
जिसे मैं पी रहा हूं आज’

‘वह पानी तो कल ही बह गया महाराज’
बकरी रोनी-रोनी होकर बोली

सिंह गरजा
‘देख मैं जंगल का राजा हूं
बलवान हूं
मेरा तर्क चलता है यहां
तुम बकरी हो
मैं तुम्हें खाऊंगा…’

शेर बकरी को खा गया
जंगल का कानून लागू हो गया…
मत्स्य न्याय!
साझा मुद्दा

000

आओ किसी साझा
मुद्दे पर बात करें
तुम सही हो या मैं
यह सही या वह
छोड़ो इस बहस को

अपनी-अपनी नजर में
तुम भी सही थे
और मैं भी
वह भी सही था
और वह भी…!

000

हम दोनों जिसे मानें
वही सही
आओ आज लड़ें
उसे ही लेकर
उनके खिलाफ
जो हमें गलत सिद्ध करके
सदियों से दबाते आए हैं
छोड़ो इस ‘लड़ाई’ शब्द का
मोह
बंद करो ये लड़ाइयां
‘हम दोनों’-
नहीं नहीं ‘हम सभी’
संग-संग चलें
मिल कर कुछ करें! ०

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First Published on October 23, 2016 12:18 am

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