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कविताएं: कोई और जगह, संभावना

दुर्गा प्रसाद गुप्त की कविताएं।
Author November 27, 2016 02:38 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

दुर्गा प्रसाद गुप्त
कोई और जगह

कूड़ाघरों से रोज-रोज
जब जिंदगी बीनते हैं बच्चे
तब मिट जाता है फर्क इंसान और जानवर का
असंख्य मच्छर-मक्खियों और पशुओं के मध्य
प्लास्टिक की बोतलें, फटे-पुराने कपड़े
इलेक्ट्रॉनिक के बेकार सामान
प्लास्टिक के खिलौने और
बियर-विस्की की बोतलें को
जब वे बीन रहे होते हैं
तब ऐसा लगता है,
जैसे सृष्टि में धन बटोर रहे हों वे
बेहिसाब गंदगी और बदबू के नरक में
कहीं गहरे धंसे
उन खजानों को ढूंढ़ लेना चाहते हैं वे

कूड़ों के जिन टीलों और पहाड़ों को
रोज-ब-रोज निर्मित करते हैं हम
उन्हीं के बीच जिंदगी को ढूंढ़ते और जीते हैं वे
शायद कोई और जगह
छोड़ी ही नहीं है हमने उनके लिए
सृष्टि में।
हिदायत

असली माल के पीछे
आ ही जाते हैं
नकली माल बाजार में
लाख हिदायतों के बावजूद
फंस ही जाते हैं लोग
उनके जाल में!
समय
दिन के साथ
उम्मीदें जो जगती हैं
वो सांझ बन उतरती हैं
उदासी के रूप में
कुछ डूब रहा होता है भीतर
कुछ ठहर-सा गया होता है बाहर
बावजूद भौतिकता के
विवश होता है व्यक्ति समय से
कभी रहता है वह
समय के भीतर
कभी उसके बाहर
जीवित रह कर जीवितों के साथ
निर्जीव होकर निर्जीवों के साथ।

और अंत में
दुनिया से नहीं
विदा लेता है वह समय से, और
विदा करता है उसे समय
कि मुक्त हो
वह विश्राम ले सके
समय रहित
समय में
देहरहित
देह में…!

बहुत कुछ को छोड़ता हुआ!
बहुत कुछ को देता हुआ वह!
इस सृष्टि में!

संभावना

जीवन और समाज में
बचाए रखना होता है ‘स्पेस’
अच्छी चीजों के लिए
तभी वह आपको भी नसीब होती है
नहीं तो अपने साथ खत्म कर देती है वह
बहुत सारी उम्मीदों और संभावनाओं को।

खत्म होने से बचाए रखना जरूरी होता है।
अच्छी चीजों को
न कि उसके खत्म होने में
सहयोग करना या
उससे तटस्थ रह कर
अच्छी संभावनाओं को
हमेशा के लिए नष्ट करना। ०

 

 

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