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बाल कहानी- बड़ी सोच

शाम को घना अंधेरा हो चुका था। जय और उसके पापा-मम्मी शानदार-सा गिफ्ट लेकर अपनी कार में जा रहे थे। कार सड़क पर दौड़ रही थी कि अचानक जय की नजरें सड़क पर बने फुटपाथ पर गर्इं।
Author October 8, 2017 06:01 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

गोविंद भारद्वाज 

सर्दी के दिन थे। चारों तरफ कोहरा छाया हुआ था। शीतलहर का प्रकोप बढ़ा हुआ था। ठंड के कारण लोग घर से निकलने में कतरा रहे थे। जय अपने घर की खिड़कियों से बाहर का अद्भुत नजारा देख रहा था। उसके पापा ने कहा, ‘अरे जय बेटा, बाहर क्या देख रहे हो?’ ‘पापा आज पहले से सर्दी ज्यादा है और मुझे…।’ जय कहता-कहता रुक गया। ‘और मुझे… क्या कहना चाहते थे तुम अभी?’ पापा ने पूछा। जय जमीन की ओर नजरें गड़ा कर बोला, ‘पापा आज शाम को मुझे अपने दोस्त विजय की बर्थ डे पार्टी में जाना है… और आप और मम्मी को भी चलना है… उसने आप दोनों के लिए भी कहा है।’  ‘अरे बेटा इतनी ठंड… और फिर बच्चों की पार्टी में हमारा क्या काम।’ पापा ने समझाने की मुद्रा में कहा। ‘पापा… वहां सभी दोस्तों के मम्मी-पापा भी आएंगे… वे सब आपके बारे में पूछेंगे तो मैं क्या कहूंगा…।’ जय ने मुंह बनाते हुए कहा। उसके पापा मुस्कराते हुए बोले, ‘ठीक है बेटा… हम भी तुम्हारे दोस्त के जन्मदिन पर चलेंगे।’ जय के चहरे पर खुशी छा गई।

शाम को घना अंधेरा हो चुका था। जय और उसके पापा-मम्मी शानदार-सा गिफ्ट लेकर अपनी कार में जा रहे थे। कार सड़क पर दौड़ रही थी कि अचानक जय की नजरें सड़क पर बने फुटपाथ पर गर्इं। वहां एक दस-पंद्रह साल का बच्चा सर्दी के कारण कांप रहा था। उसके बदन पर सिर्फ फटी-पुरानी एक शर्ट थी। जय को उस लड़के पर रहम आ गया। उसने पापा से कहा, ‘पापा… पापा, प्लीज गाड़ी रोकिए।’ उसके पापा ने तुरंत ब्रेक लगा दिया और बोले, ‘क्या बात है जय, तुमने कार क्यों रुकवाई?’ ‘पापा, प्लीज थोड़ा पीछे ले लीजिए न…।’ जय ने पापा से कहा। ‘पापा यहीं… यहीं पर।’ वह गरीब बच्चा अब भी अपनी दोनों टांगों में सिर दिए कांप रहा था। जय तुरंत कार से उतरा और मम्मी से कहा, ‘देखो मम्मी यह मेरी उम्र का बच्चा इतनी ठंड में कैसे कांप रहा है।’ ‘हां… हां… यह तो सचमुच सर्दी में मर रहा है… देखो जय के पापा… आज जल्दी कार से उतर कर आओ।’ जय की मम्मी ने कहा। जय के पापा भी तुरंत कार से उतरे और उस बच्चे को देख कर उन्हें बड़ा अफसोस हुआ। ‘बेटा हम क्या करें इसके लिए?’ मम्मी बोलीं, ‘देखो इसे देने के लिए कोई गरम कपड़े भी नहीं हैं हमारे पास, ताकि इसकी मदद की जा सके।’

जय ने थोड़ा सोच कर कहा, ‘पापा अगर आप डांटें नहीं तो मैं इसे कुछ दे सकता हंू?’ ‘बोलो बेटा, इसे तुम क्या दे सकते हो?’ मम्मी ने तुरंत पूछा। ‘देखो पापा और मम्मी, मैं अपने दोस्त के बर्थ डे पर उसे गिफ्ट देने के लिए एक स्वेटर लाया हंू, जो इस पैकेट में है। आप कहें तो इसे दे दूं।’ जय ने कहा। इस पर उसके मम्मी-पापा उसकी तरफ एकटक देखते रहे। फिर थोड़ी देर बाद कहा, ‘फिर बर्थ डे पार्टी में क्या लेकर जाओगे तुम… लोग मजाक नहीं उड़ायेंगे क्या हम लोगो का।’ उसके पापा ने कहा। जय ने जवाब दिया, ‘पापा मुझे इस बात की परवाह नहीं है कि मेरे दोस्त क्या कहेंगे या लोग क्या सोचेंगे। मुझे इसकी मदद करनी है तो बस करनी है।’ सेवा और सहयोग का यह जज्बा देख कर उसकी मम्मी से रहा नहीं गया। वे बोलीं, ‘ठीक ही तो कह रहा है जय! बड़ी सोच है मेरे बेटे की।’ पापा की मौन सहमति मिलते ही उसने गिफ्ट पैकेट खोला और उसमें से नया स्वेटर निकाला, जिस पर ‘वी’ लिखा हुआ था। उसने गरीब बच्चे को स्वेटर देते हुए पूछा, ‘तुम्हारा नाम क्या है मेरे दोस्त?’ ‘जी विनोद।’ बच्चे ने धीरे से जवाब दिया। वाह विनोद… विनोद का ‘वी’ वाह! शायद यह स्वेटर तुम्हारे लिए ही लाया था मैं।’ यह सुन कर सब हंस पड़े।

विनोद स्वेटर पहन कर बड़ा खुश था। बर्थ डे पार्टी शुरू हो चुकी थी। वे थोड़ा देरी से पहुंचे, तो विजय के पापा-मम्मी ने पूछा, ‘अरे जय तुम लेट कैसे हो गए? तुम तो सबसे पहले पहुंचने वालों में हो।’ जय कुछ बोलता उससे पहले उसके मम्मी-पापा बोल पड़े, ‘रास्ते में गाड़ी खराब हो गई थी।’ बर्थ डे बड़ी धूमधाम से मनाया।  जब जय जा रहा था तभी उसके एक दोस्त ने कहा, ‘आज विजय का जन्मदिन तो है ही, लेकिन इसके साथ-साथ जय को भी हम बधाई देते हैं।’ यह सुन कर जय और उसके पापा-मम्मी को बड़ा आश्चर्य हुआ। जय ने पास जाकर धीरे से पूछा, ‘अरे मुझे किस बात की बधाई… कई मुझे अपमानित तो नहीं कर रहा… क्योंकि मैं कुछ गिफ्ट नहीं लाया विजय के लिए।’ दोस्त ने माइक पर कहा, ‘आज जय ने वह काम किया है विजय के जन्मदिन पर, जो कोई दूसरा दोस्त नहीं कर सकता।’

‘क्या काम किया है भई हमें भी बताओ।’ सारे लोग चिल्ला उठे। वह बोला, ‘आज जय ने विजय के लिए खरीदा गिफ्ट एक ऐसे बच्चे को दिया जो भरी सर्दी में फुटपाथ पर कंपकंपा रहा था। मैं उसे भी साथ लाया हंू।’ इतना कहते ही विनोद परदे से बाहर निकला। विनोद को वहां देख कर जय को बड़ी हैरानी हुई। जय के दोस्त ने बताया कि, जब जय और उसके मम्मी-पापा इस विनोद को सर्दी से बचाने के लिए गिफ्ट खोल कर स्वेटर दे रहे थे, तो मैं दूसरी तरफ खड़ा देख रहा था। सचमुच इसकी सोच हम सबसे कितनी बड़ी है। विनोद ने मुझे जय की सारी बातें बता दी हैं।’  यह सुन कर सारे हॉल में तालियां बज उठीं।

 

 

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