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घर की सजावट में सुरुचि

घर में रोशनी की माकूल व्यवस्था होनी चाहिए। जिन घरों में ठीक से रोशनी और धूप नहीं आती, उनमें कीड़ों की पैदावार बढ़ती है।
Author July 2, 2017 01:57 am
घर में रोशनी की माकूल व्यवस्था होनी चाहिए। जिन घरों में ठीक से रोशनी और धूप नहीं आती, उनमें कीड़ों की पैदावार बढ़ती है।

अपने घर को सजाना हर किसी का शौक होता है। हर कोई चाहता है कि उसके घर की सजावट देख कर लोग सराहना किए बगैर न रहें। इसलिए लोग अपने घर की रंगाई-पुताई में रंगों के चयन से लेकर, कॉलीन, सोफे, दीवारों पर लटकाने वाले चित्र, रोशनी, खिड़कियों के परदे, खाने की मेज, गुलदान वगैरह के चुनाव में खासी सावधानी बरतते हैं। अपनी जान-पहचान के लोगों, दोस्तों-रिश्तेदारों वगैरह से सलाह-मशविरा करते हैं। बाजार में आंतरिक सज्जा के सामान उपलब्ध कराने वाली दुकानों पर जाकर घंटों अध्ययन करते हैं। फिर हर कोई अपनी सुविधा, क्षमता और रुचि के हिसाब से सजावट करता है। अक्सर देखा गया है कि थोड़े संपन्न लोग अपने घरों में मंहगे और भारी सजावटी सामान इस कदर इकट्ठा कर भर देते हैं कि वह उनकी हैसियत का भोंडा प्रदर्शन जैसा लगने लगता है। उसमें उठने-बैठने की जगह कम रह जाती है और वह एक तरह का अजायबघर लगने लगता है।

घर रहने की जगह है, इसलिए कहा जाता है कि उसकी बनावट और सजावट मनुष्य की प्रकृति के अनुकूल होनी चाहिए। प्रसिद्ध वास्तुकार चार्ल्स कोरिया मानते थे कि घरों में भारी सजावटी वस्तुओं का इस्तेमाल उन पर बेवजह बोझ बढ़ाता है। घर की बनावट ऐसी होनी चाहिए, जिससे प्रकृति के सभी लाभ मिल सकें। उसकी बनावट और सजावट में अधिक से अधिक प्रकृतिक और स्थानीय तौर पर उपलब्ध वस्तुओं का उपयोग किया जाए। उनमें हवा और रोशनी का भरपूर प्रबंध हो। घर की साज-सज्जा में सावधानी इसलिए जरूरी होती है कि उसमें उठने-बैठने, काम करने में सुविधा हो। घर की साफ-सफाई में मुश्किल न आए। सजावट के नाम पर ज्यादा सामान भर देने से धूल और गंदगी के भी उसी अनुपात में जमने की संभावना बनी रहती है। इससे घर की साफ-सफाई में मुश्किल आती है। साफ-सफाई ठीक से न हो पाने के चलते बीमारियों के जगह बनाने की आशंका बनी रहती है। ऐसे में घर की साज-सज्जा करते समय कुछ सावधानियां बरतने की जरूरत होती है।

रंगों का चुनाव

कई लोग मानते हैं कि गाढ़े रंगों में गंदगी छिप जाती है, इसलिए वे दीवारों पर गहरे रंगों का उपयोग करते हैं। मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि गहरे रंग से घर भरा-भरा लगने लगता है। इसलिए हल्के रंगों का इस्तेमाल अच्छा माना जाता है। आजकल तैलीय रंग आने लगे हैं, जिन पर लगे दाग वगैरह को गीले कपड़े से पोंछ कर हटाया जा सकता है। इसलिए दाग-धब्बे छिपाने के मकसद से गहरे रंगों का उपयोग करने के बजाय हल्के तैलीय रंगों का इस्तेमाल करें तो न सिर्फ घर खुला-खुला लगेगा, बल्कि उसमें रखी सजावटी वस्तुओं की उपस्थिति भी रेखांकित होती रहेगी।

परदों का आकार और रंंग

प्राय: खिड़कियों से आने वाली तेज धूप और रोशनी से बचने के लिए लोग गहरे रंग के परदों का उपयोग करना बेहतर समझते हैं। उन पर लगने वाले दाग-धब्बों को छिपाने के मकसद से भी गाढ़े रंग के परदों का उपयोग करते देखा जाता है। मगर इससे भी वही समस्या पैदा होती है, जो दीवारों के गाढ़े रंग से होती है। इसलिए हल्के रंग के परदों का चुनाव करें तो घर खुला-खिला नजर आएगा। आजकल परदे के पीछे ऐसे कपड़े की तह लगाई जाने लगी है, जिसका रंग धूप से फीका नहीं पड़ता। वह गरमी और तेज रोशनी को रोकने में भी मदद करता है। इसलिए परदे बने-बनाए लेने के बजाय सिलवा कर तैयार करें तो बेहतर होगा। परदे सिर्फ खिड़कियों के आकार का रखने के बजाय छत से लेकर फर्श को छूता हुआ रखें। इससे भी घर का आकार कुछ बड़ा लगने लगता है।

फर्नीचर और सजावट का सामान

फर्नीचर का रंग भी हल्का रखना उचित होता है। गहरे रंगों वाले या फिर ज्यादा चमक वाले फर्नीचर घर की सजावट को भोंडा बना देते हैं। सोफे और कुर्सियों की गद्दियों पर ऐसे कपड़े चढ़वाएं, जिन्हें आसानी से झाड़ कर या गीले कपड़े से रगड़ कर साफ किया जा सके। आजकल सोफे पर फूलदार और रोएंदार कपड़े के बजाय रैग्जीन का चलन अधिक है। उस पर लगे दाग-धब्बे कोलीन या गीले कपड़े से आसानी से हटाए जा सकते हैं।
दीवारों पर सजावट को लचीला रखें, ताकि उसे समय-समय पर बदला जा सके। स्थायी रूप से की गई सजावट एकरसता पैदा करती है। इसलिए जहां तक हो सके, सजावटी सामान रखने की खुली मेजों, अलमारियों आदि का इस्तेमाल करें, ताकि उन्हें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह खिसका कर साफ-सफाई की जा सके, दीवारों की रंगाई कराते समय भी आसानी हो। फर्नीचर इस तरह रखे होने चाहिए, जिससे आने-जाने, उठने-बैठने में कोई दिक्कत न हो। लोग बैठे हों तो दूसरों के लिए जगह बनाने को बार-बार कुर्सियां और टेबल खिसकाने न पड़ें। टीवी और म्यूजिक सिस्टम ऐसी जगह रखें, जिससे बैठक में उपस्थित सभी लोग उनका आनंद ले सकें।

रोशनी और हवा

घर में रोशनी की माकूल व्यवस्था होनी चाहिए। जिन घरों में ठीक से रोशनी और धूप नहीं आती, उनमें कीड़ों की पैदावार बढ़ती है। इसलिए खिड़कियों पर कांच और जालियां इस तरह लगी होनी चाहिए कि परदा खिसका कर आसानी से रोशनी और हवा का प्रवेश सुनिश्चित किया जा सके। कई लोग प्राकृतिक रोशनी के बजाय बैठक और सोने के कमरों में कृत्रिम रोशनी करना साज-सज्जा का हिस्सा मानते हैं। इसलिए सजावटी बल्ब और झूमर आदि का उपयोग करते हैं। मगर हकीकत यह है कि प्राकृतिक रोशनी से घर की शोभा अधिक बढ़ती है। जिन घरों में समुचित प्राकृतिक रोशनी नहीं पहुंचती, उनमें बल्बों का चुनाव ऐसा होना चाहिए, जो सब जगह प्राकृतिक रोशनी का स्थान ले सके। मद्धिम और रंगीन रोशनी न सिर्फ आंखों को प्रभावित करती है, बल्कि घर की सजावट को भी प्रश्नांकित करती है। अगर सजावटी रोशनी करनी भी हो तो कुछ कोनों और चित्रों वगैरह के ऊपर करें, बाकी कमरे के लिए दूधिया रोशनी ही उपयुक्त होती है। जहां तक हो सके, बाहर की हवा को घर के भीतर आती रहने दें।

रसोई में सजावट और सुविधा

रसोई की शान बर्तन और भोजन पकाने के उपकरण हैं, इसलिए उन्हें रखने की जगह आप कैसी रखते हैं, उसी से उसकी साज-सज्जा निखरती या बिगड़ती है। माड्यूलर किचेन का जमाना है और प्राय: हर रसोई की बनावट एक-सी देखी जाती है। पर यह आप पर निर्भर है कि उसे खास कैसे बनाते हैं।
रसोई में साज-सज्जा अधिक न करें। बर्तनों और उपकरणों को इस तरह सजाएं, ताकि भोजन पकाने, उठाने-रखने और चलने-फिरने में असुविधा न हो। बर्तनों को बिखरा कर रखने या उपकरणों को बेतरतीब तरीके से रखने से न सिर्फ भोजन पकाने में असुविधा होती है, बल्कि रसोई गंदी दिखती है। फ्रिज, ओवन, सब्जियों की टोकरी, पीने के पानी की व्यवस्था और कचरे का डिब्बा इस तरह रखा हो कि एक के इस्तेमाल में दूसरा बाधा न बने।

रसोई और साफ-सफाई

घर में सबसे अधिक गंदगी फैलने की संभावना रसोई में होती है, इसलिए यहां सबसे अधिक सफाई पर ध्यान देने की जरूरत होती है। भोजन पकाते समय बार-बार सफाई करती रहें। ऐसा नहीं कि रसोई का पूरा काम हो जाने के बाद ही सफाई करें। जिस चॉपिंग पैड यानी फट्टे पर सब्जियां काटती हैं, उसे इस्तेमाल के तुरंत बाद रगड़ कर साबुन से धो लिया करें, क्योंकि देर तर सब्जियों का रस जमे रहने से न सिर्फ वह काला पड़ता जाता है, बल्कि उसमें बैक्टीरिया पनपने शुरू हो जाते हैं। इसी तरह चूल्हे पर गिरे, तेल, मसाले वगैरह को तभी के तभी साफ कर लिया करें।  रसोई की दीवारों पर और चूल्हे के आसपास हल्के रंग की टाइल्स का उपयोग करें, ताकि उन पर गंदगी आसानी से नजर आए और उसे धो-पोंछ कर साफ किया जा सके। बर्तन धोने के सिंक को रोज उसी तरह धोना चाहिए, जैसे बर्तन धोते हैं। इससे बैक्टीरिया, काक्रोच वगैरह के पैदा होने की आशंका दूर हो जाती है।

बदबू दूर भगाएं

रसोई में अक्सर तेल, मसालों, अंडे, मांस या जली-तली चीजों वगैरह की बदबू देर तक बनी रहती है। इसे दूर बगाने का सबसे आसान तरीका है-
एक बर्तन में पानी गरम करें। उसमें नीबू के रस की चार-छह बूंदें टपकाएं। पानी को उबलने दें। फिर उसमें दालचीनी का एक टुकड़ा डाल दें। बदबू तत्काल दूर हो जाएगी। खुले में ब्रेड का स्लाइस रख देने से भी बदबू भाग जाती है। ०

चार्ल्स कोरिया

चार्ल्स कोरिया दुनिया के सबसे प्रयोगवादी वास्तुकारों में गिने जाते हैं। गोवा में जन्मे कोरिया ने न सिर्फ भारत में अनेक भवनों और शहरों की डिजाइन तैयार की, बल्कि विदेशों में भी उन्होंने कई उल्लेखनीय इमारतें तैयार कीं। नवी मुंबई उन्हीं का बसाया हुआ है। कोरिया कहते थे कि ‘ऊपर ईश्वर का आसमान है और नीचे उसकी धरती। जिसने इन दोनों के रहस्य को समझ लिया उसे सही काम करने की प्रेरणा मिल जाती है।’ कोरिया ने कभी भवनों की सजावट के लिए विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं किया। वे स्थान के हिसाब से भवनों का डिजाइन तैयार करते थे। स्थानीय स्तर पर जो वस्तुएं उपलब्ध होती थीं, उन्हीं का उपयोग करते थे। नवी मुंबई के साथ ही उन्होंने बेलापुर में निम्न आयवर्ग के लोगों के लिए आर्टिस्ट विलेज बनाया, जो मुंबई की सबसे खूबसूरत और सुव्यवस्थित बसाहटों में गिना जाता है। ऐसे अनेक भवन उन्होंने डिजाइन किए, जिनमें कच्ची र्इंट और गारे का इस्तेमाल किया गया, जिससे उसमें रहने वालों पर मौसम का प्रकोप कम से कम पड़ता है। उन्होंने कसम खाई थी कि कभी वे शीशे का महल नहीं बनाएंगे। वे प्रकृति से तादात्मय बिठाते खूबसूरत परिसर के हिमायती थे। वे सादे और सुविधाजनक भवन के पक्ष में थे।

चार्ल्स कोरिया

चार्ल्स कोरिया दुनिया के सबसे प्रयोगवादी वास्तुकारों में गिने जाते हैं। गोवा में जन्मे कोरिया ने न सिर्फ भारत में अनेक भवनों और शहरों की डिजाइन तैयार की, बल्कि विदेशों में भी उन्होंने कई उल्लेखनीय इमारतें तैयार कीं। नवी मुंबई उन्हीं का बसाया हुआ है। कोरिया कहते थे कि ‘ऊपर ईश्वर का आसमान है और नीचे उसकी धरती। जिसने इन दोनों के रहस्य को समझ लिया उसे सही काम करने की प्रेरणा मिल जाती है।’
कोरिया ने कभी भवनों की सजावट के लिए विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं किया। वे स्थान के हिसाब से भवनों का डिजाइन तैयार करते थे। स्थानीय स्तर पर जो वस्तुएं उपलब्ध होती थीं, उन्हीं का उपयोग करते थे। नवी मुंबई के साथ ही उन्होंने बेलापुर में निम्न आयवर्ग के लोगों के लिए आर्टिस्ट विलेज बनाया, जो मुंबई की सबसे खूबसूरत और सुव्यवस्थित बसाहटों में गिना जाता है। ऐसे अनेक भवन उन्होंने डिजाइन किए, जिनमें कच्ची र्इंट और गारे का इस्तेमाल किया गया, जिससे उसमें रहने वालों पर मौसम का प्रकोप कम से कम पड़ता है। उन्होंने कसम खाई थी कि कभी वे शीशे का महल नहीं बनाएंगे। वे प्रकृति से तादात्मय बिठाते खूबसूरत परिसर के हिमायती थे। वे सादे और सुविधाजनक भवन के पक्ष में थे।

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