December 03, 2016

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जीवन शैली: जीवनशैली बना रही बीमार

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में 10 से 24 आयु वर्ग की करीब 23 लाख युवा आबादी हर साल असामायिक मौत की शिकार हो जाती है।

Author October 30, 2016 01:07 am
जीवनशैली बना रही बीमार।

विनय जायसवाल

आज की शहरी कार्यशैली में पीठदर्द, मोटापा, अधकपारी, तनाव, अवसाद आदि बीमारियां तेजी से घर करती जा रही हैं। लगातार ऐसे युवाओं की तादाद बढ़ रही है जो इस तरह की बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं। इसके पीछे अगर कुछ है तो वह है युवाओं के काम करने, रहने और खाने-पीने का तरीका। यानी जिस तरह से आधुनिकता ने हमारी जीवन शैली को बदलकर रख दिया है, उसका सीधा असर स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कार्य के आधुनिकीकरण ने दिन और रात के भेद को खत्म कर दिया है। कार्यशैली में बदलाव आया है तो भागदौड बढ़ी है और इसके साथ ही बढ़ी है आगे निकलने की होड़ भी। अब सभी को और सब कुछ बहुत जल्द चाहिए और उसके लिए युवा सब कुछ करने को तैयार हैं।

काल सेंटर और इंटरनेट के बाद सोशल मीडिया ने भी जीवन शैली को बदलकर रख दिया है। अब देर रात जागना, सुबह देर से उठना और इसके बाद काम पर चले जाना ही जीवन हो गया। ऐसे युवा जो काम पर नहीं जाते, उनका जीवन भी कमोबेश ऐसा ही है, क्योंकि वे भी जहां पढ़ाई कर रहे हैं या फिर जिस तरह के करिअ‍ॅर की तलाश में हैं, वहां भी इसी तरह की मारामारी है। ऐसे में खान-पान का प्रभावित होना लाजिमी है, आज का युवा ज्यादातर फास्टफूड, डिब्बाबंद या फिर होटल के खानों पर आश्रित हो गया है। आजकल हर चौराहे पर चाइनीज, तले फूड स्टालों के आगे युवाओं की भीड़ लगी रहती है। इस तरह का खाना न केवल पोषणविहीन होता है बल्कि गंदगी के कारण कई तरह की बीमारियों का घर भी होता है। इससे न केवल वजन बढ़ता है बल्कि मोटापा आता है, जो अपने आप में कई तरह की बीमारियों का कारण है। यह रोग के मायने में कुपोषण से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है क्योंकि मोटापे की वजह से हृदयाघात, मधुमेह, घुटने और कमर के दर्द, उच्च रक्तचाप की संभावना बढ़ जाती है।

आज जिस तरह के समाज का विकास हुआ है, उसमें संयुक्त परिवार की जगह एकाकी परिवार ने ली है, ऐसे में युवाओं को घर में उस तरह का माहौल नहीं मिलता है कि वह शाम का समय घर वालों के साथ खानपान में बिताएं और एक स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं। ऐसा इसलिए है कि एकाकी परिवार का हर सदस्य एक ही समय पर बहुत ही मुश्किल से एक दूसरे के लिए समय निकाल पाता है। ऐसे में युवा अकेलेपन को पार्टियों में कम करते हैं, जहां धीरे-धीरे एल्कोहल और दूसरी तरह के नशों की गिरफ्त में आते हैं। दूसरे शहरों से रोजगार या पढ़ाई करने आए युवाओं का परिवार न होने की वजह से उनमें इस तरह के व्यवहार का विकास होना और आसान होता है। सिगरेट और तंबाकू, सांस की तकलीफ और कैंसर जैसी बीमारियों को बढ़ाता है तो एल्कोहल किडनी और पेट की समस्याओं के साथ मोटापा बढ़ने का कारण बन जाता है, जिससे खुद ब खुद कई तरह की बीमारियां पैदा हो जाती हैं। युवाओं में जीवनशैली और
खानपान के कारण होने वाली बीमारियां केवल महानगरों तक सीमित नहीं रही हैं बल्कि इसका विस्तार छोटे शहरों और गांवों तक बहुत तेजी से हुआ है। निश्चित रूप से टेलीविजन और इंटरनेट ने गांव और शहर के अंतर को बहुत हद तक कम कर दिया है। यही कारण है कि काम करने की महानगरीय शैली का विस्तार छोटे शहरों में पैर पसारने के बाद गांवों में भी पैठ बना रहा है और इसके साथ ही खानपान तो पहले से ही तेज गति से अपनी जगह बना चुका है। यही कारण है कि बीमारी से ग्रसित होने वाले युवाओं की तादाद और अधिक बढ़ रही है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में 10 से 24 आयु वर्ग की करीब 23 लाख युवा आबादी हर साल असामायिक मौत की शिकार हो जाती है। इसके साथ ही ऐसी युवा आबादी की संख्या इससे कई गुना ज्यादा है, जो इस तरह की बीमारियों से ग्रसित हैं, जिन्हें कभी प्रौढ़ावस्था की समस्या समझा जाता था। युवास्था न केवल खुद के विकास के लिए अहम होता है, बल्कि यही वह समय होता है जब कोई भी युवा खुद को परिवार, समाज और देश के लिए तैयार करता है, ऐसे में देश की एक बड़ी ऊर्जावान आबादी के स्वास्थ्य में इस तरह की प्रवृत्ति का आना निश्चितरूप से चिंताजनक है। यह और भी चिंताजनक तब हो जाता है, जब देश युवा आबादी की गणना का कोई स्पष्ट पैमाना नहीं है। राष्ट्रीय युवा नीति देश के युवाओं की उम्र सीमा को 15-29 वर्ष निर्धारित करता है, लेकिन भारत में जिस तरह की बेरोजगारी है, उससे युवा वर्ग के लिए यह आयु वर्ग निर्धारित करना तर्कसंगत नहीं लगता है क्योंकि इस देश की एक बड़ी आबादी 30 साल के बाद भी बुनियादी सवालों से जूझती रहती है।

भारत की करीब 50 फीसद आबादी 25 साल से कम की और करीब 65 फीसद आबादी 35 साल से नीचे की है। इस तरह से भारत की करीब तो तिहाई आबादी युवा है, युवाओं की इतनी भारी तादाद के बावजूद अगर सरकार की कोई युवा स्वास्थ्य नीति नहीं है तो यह सोचनीय है। जिस तरह के आंकडेÞ आ रहे हैं और जिस तरह प्रवृत्तियां देखी जा रही हैं, उस पर जल्द ही विचार नहीं किया गया तो आने वाले समय का भारत, युवा भारत नहीं बल्कि बीमार भारत की पहचान हासिल कर लेगा।

भारत में हम उन रोगों को संजीदगी से लेते हैं जो साफ तौर दिखाई पड़ते हैं और जिनके होने पर हमारा जीवन और गतिविधियां दोनों ठप पड़ जाते हैं और सरकार भी ऐसे ही रोगों को लेकर संजीदा रहती है। यहां तक की अब अदालतें भी रोगों और उसके निदान के प्रति सरकारों के सरोकार को लेकर उन्हें कटघरे में खड़ा करने लगी हैं। यह दुर्भाग्य है कि सरकारें युवाओं के विकास को बाधित करने वाले और उनकी कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाले इन रोगों के प्रति मुहिम के स्तर पर ध्यान नहीं दे रही हैं। इन रोगों से देश की एक बड़ी आबादी बीमार समाज के निर्माण की ओर बढ़ रही है। आगे चलकर इन रोगों के आनुवांशिक प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए जीवनशैली और खानपान की आदतों तथा परिवार से दूर रहने की वजह से पैदा हो रही बीमारियों पर परिवार, समाज और सरकार के साथ खुद भी ध्यान देने की जरूरत है।

हाल के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में 2005-06 की तुलना में मोटे या ज्यादा वजन के लोगों की तादाद बढ़कर दोगुनी हो गयी है। मधुमेह की तरह तनाव और अवसाद भी युवाओं को कुंठित कर रहा है। इसका परिणाम यह है कि आत्महत्या की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। दरअसल गांव छूटते ही परिवार का बना-बनाया ढांचा टूट जाता है। यहां तक कि गांवों में भी पारिवारिक बिखराव बढ़ा है। इसलिए शहरों के साथ-साथ गांवों में भी पारिवारिक संबल और सहयोग का सहारा छीन रहा है। यहां तक कि एक ही परिवार के सदस्यों के बीच और अब तो पति और पत्नी तक के बीच बड़े होने की अंतहीन होड़ मची हुई है। सफलता और कामयाबी जैसे संज्ञा ने असफल लोगों के लिए दुनिया कठिन बना दी है और जीना मुश्किल कर दिया है। युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा है तो शादी नहीं हो रही है या रोजगार मिल रहा है तो वे उसे अपने योग्य नहीं समझते, जिससे कुंठा आती है।

इसके साथ ही जिस अनुपात में हर युवा डिग्री ले रहे हैं, उस अनुपात में ऊंचे पद पर नौकरी नहीं तो भी इससे मानसिक तनाव पनप रहा है। युवतियों के बीच अब केवल अच्छे शादी का ही तनाव नहीं रहा, टेलीविजन ने उनकी अपेक्षाएं बढ़ा दी हैं, जिससे उनके वैवाहिक जीवन में शुरुआत से ही तनाव भर जा रहा है। नौकरी करने वाली महिलाओं के अलग तनाव और मसलें हैं। आज नौकरी चाहे बहुराष्ट्रीय कंपनी की हो, निजी या सरकारी हो या फिर सार्वजनिक उपक्रमों की, हर जगह कमोबेश एक सा तनाव और माहौल है। सबके ऊपर काम का बोझ है और हर कोई बस भगा जा रहा है, ऐसे भागा जा रहा है जैसे हर कोई उससे कुछ छिनने वाला हो। ऐसे माहौल में न लोगों के पास खुद के लिए समय है, न परिवार के लिए और न सामाजिक गतिविधियों और मेलजोल के लिए। इसलिए कोई न तो किसी से कुछ कहना चाहता है और न ही कोई किसी से कुछ पूछना चाहता है। ऐसे में एक ऐसा समाज पनप रहा है, जो मानसिक रूप से बीमार है। सबसे बड़ी बात यह है कि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को खुद ही नहीं मालूम होता कि वह बीमार है। १

 

 

 

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First Published on October 30, 2016 1:07 am

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