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जारी है एक कुप्रथा

बाल प्रथा पर प्रेरणा मालवीयजी का लेख।
Author September 10, 2016 23:47 pm
प्रतिकात्मक तस्वीर।

बाल विवाह भले ही गैरकानूनी हो लेकिन भारत में धड़ल्ले से जारी है। इस मामले में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश और हरियाणा जैसे राज्य काफी बदनाम हैं। इस कुप्रथा के बरकरार रहने की वजह क्या है और क्या हैं इसके परिणाम? जायजा ले रही हैं प्रेरणा मालवीय।

बाल विवाह शायद ऐसा पहला अपराध है जो होने से पहले तो अवैध है, लेकिन होते ही वैध बन जाता है! मतलब यह कि बाल विवाह निरोधक अधिनियम 1929 के तहत बाल विवाह करना एक दंडनीय अपराध जरूर है, लेकिन हो चुका विवाह अपने आप में अवैध या गैरकानूनी नहीं है। खेलने-कूदने की उम्र में परिवार की जिम्मेदारी इनके स्वास्थ्य के लिए बहुत घातक है। कम उम्र में मां बनने से जच्चा और बच्चा दोनों की जान को खतरा रहता है।

यह सचमुच चिंतित करनेवाली वाली बात है कि भारत में अब भी बड़ी संख्या में बाल विवाह होते हैं या हो चुके हैं। एक ताजा रपट में खुलासा हुआ है कि उत्तर भारत के कई राज्यों में अब भी एक करोड़ पुरुष और साढ़े तीन करोड़ महिलाएं बाल विवाह से ग्रस्त हैं। राजस्थान का हर तीसरा व्यक्ति जहां बाल विवाह का शिकार है, वहीं देश की सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश बाल विवाह में अव्वल है। उत्तर प्रदेश में 13.5 लाख, राजस्थान में 7.5 लाख, मध्य प्रदेश में पांच लाख लोगों बाल विवाह हो चुका है। उत्तर प्रदेश के अग्रणी माने जाने वाले जिले गाजियाबाद, इलाहाबाद, आगरा, राजस्थान में जयपुर, मध्यप्रदेश में भोपाल और इंदौर, हरियाणा में फरीदाबाद में बाल विवाह की दर की अपेक्षाकृत अधिक है। हाल में केंद्र सरकार ने भी दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल अपने एक हलफनामे में माना है कि देश के कई हिस्सों में बाल विवाह का चलन जारी है। बाल विवाह से एक बड़ा नुकसान उनकी शिक्षा पर पड़ रहा है। जिन बच्चों या बच्चियों का बाल विवाह होता है, वे अगर स्कूल भी जा रहे होते हैं तो सबसे पहले उनकी पढ़ाई छुड़ाई जाती है।

लाख कोशिशों के बाद भी हम इस कुप्रथा को समाप्त नहीं कर पाए हैं। सभ्य समाज के मुंह पर यह एक तमाचा है। बाल विवाह का नाम आते ही हमारे मन में कच्ची उम्र में ब्याही मासूम बच्चियों के चेहरे घूमने लगते हैं। चेहरे, कई सारे चेहरे। खेलने-कूदने की उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी इन मासूमों पर समाज के जिम्मेदार लोगों द्वारा ही थोपी जा रही है, दुर्भाग्य यह है कि इसमें सबसे ज्यादा उनके माता-पिता भी शामिल होते हैं। वह भी उस उम्र में जब उनको शादी के मायने ही पता नहीं होते। इसके लिए तमाम कानून बनने के बाद भी इस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। यह बात आज के संदर्भ में और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जब हम इक्कीसवीं सदी में कदम रख चुके हैं। हर क्षेत्र में आगे निकलने की होड़ सी मची हैं। भारत में डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और महिला सशक्तीकरण की बात चाय की गुमटियों से लेकर संसद तक गूंज रही है। बेटी पढ़ाओ- बेटी बचाओ का नारा ग्रामीण अंचलों से लेकर महानगरों तक सुनाई दे रहा है। सब कुछ तो हो रहा है इसके लिए। इसके बावजूद हमारी बेटियां क्यों इस कुरीति के चंगुल से नहीं निकल पा रही हैं। लड़के भी बाल विवाह से बचे नहीं हैं। मगर लड़कियां की तादाद ज्यादा है। चाइल्ड राइट एंड यू (क्राई) नामक गैरसरकारी संगठन की ओर से जारी 2016 के बाल विवाह के आंकड़े चौंकानेवाले हैं।
अगर हम सड़क पर खड़े होकर किसी से भी पूछें तो वह सामाजिक कुरीतियों के नाम पर जाति प्रथा, दहेज, बाल विवाह आदि का नाम एक सांस में ही गिना देगा। सच तो यह है कि इसके मूल में अशिक्षा, गरीबी और जागरूकता की कमी है। सबको पता है कि बाल विवाह एक कुप्रथा है, फिर भी इसका न रुकना कई तरह के सवाल खड़े करता है।  बाल विवाह शायद ऐसा पहला अपराध है जो होने से पहले तो अवैध है, लेकिन होते ही वैध बन जाता है! मतलब यह कि बाल विवाह निरोधक अधिनियम 1929 के तहत बाल विवाह करना एक दंडनीय अपराध जरूर है, लेकिन हो चुका विवाह अपने आप में अवैध या गैरकानूनी नहीं है। खेलने-कूदने की उम्र में परिवार की जिम्मेदारी इनके स्वास्थ्य के लिए बहुत घातक है। कम उम्र में मां बनने से जच्चा और बच्चा दोनों की जान को खतरा रहता है। 1928-29 में शारदा एक्ट बना, जिसमें नाबालिग बच्चों के विवाह को निषिद्ध किया गया। भारत सरकार ने इस कानून की पालना के लिए लड़के की आयु 21 वर्ष और लड़की की आयु 18 वर्ष निर्धारित की थी। इससे कम आयु के बच्चों का विवाह कानूनी रूप से निषिद्ध और दंडनीय अपराध माना गया है। बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 में बाल विवाह घोर को दंडात्मक अपराध माना गया है। इसके बावजूद एक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के 40 प्रतिशत बाल विवाह भारत में ही होते हैं। ‘बालिका वधू’ जैसा धारावाहिक भी बन चुका है, जिसमें इसके दुष्परिणाम को दिखाया गया है। अक्षय तृतीया का दिन तो ऐसे बच्चों के लिए काला दिवस ही है, क्योंकि इस दिन तो कई समाजों में सामूहिक बाल विवाह का चलन है। और सरकारी मशीनरी और प्रशासन देखते रहते हैं। इन समारोहों में तो कई बार नेता लोग भी खुलकर हिस्सा लेते हैं।

दरअसल, जो बहुत सारे कारण मिलकर बाल विवाह का अखंड साम्राज्य कायम किए हुए है, उनमें से गरीबी एक प्रमुख कारण है। गरीबी दो तरह से बाल विवाह का समर्थन करती है। एक तरफ बचपन में ही लड़की दूसरे घर चली जाती है, जिस कारण उसके खाने, कपड़े, चिकित्सा, स्वास्थ्य पर होने वाला मां-बाप का खर्चा बच जाता है। दूसरी तरफ दूल्हे की उम्र भी कम ही होने के कारण वह कोई नौकरी-पेशा नहीं करता इसलिए दूल्हा मंडी की ‘रेट लिस्ट’ में तब तक उसका नामांकन नहीं हुआ होता। इस कारण लड़की के मां-बाप ज्यादा मोटे दहेज की मांग से भी बच जाते हैं। बालिग या युवा लड़की की शादी करना मां-बाप के लिए दोनों तरह से ज्यादा खर्चीला पड़ता है। एक तरफ तो 18-20 साल तक लड़की के खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, हारी-बीमारी और अन्य साारी जरूरतों का खर्च घरवालों को उठाना पड़ता है। बालिग या युवा लड़की के लिए जिस उम्र का दूल्हा मिलेगा, काफी संभावना है कि वह कोई नौकरी-ध्ांधा करता होगा …और भारतीय समाज के किसी भी वर्ग या जाति के बाजार में दूल्हों की कीमत अभी तक गिरी नहीं है! बल्कि कहा जाए कि जिस दौर में पूरी दूनिया का सेंसेक्स औंधे मुंह गिरा हुआ था, अर्थव्यवस्थाएं चरमराई हुई थीं उस समय भी भारतीय दूल्हों की कीमत का ग्राफ इस सबसे अछूता हमेशा की तरह ‘हाई’ ही रहा था । एक तो पली-पलाई लड़की दान करें…ऊपर से लड़की पैदा करने का लाखों का हजार्ना भरें..! इसीलिए लोग सोचते हैं कि बाल विवाह ही बेहतर विकल्प है।

छोटी उम्र में विवाह से लड़कियों को लड़कों की अपेक्षा अधिक हानि उठानी पड़ती है। असुरक्षित यौन संबंधों से उनके स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। फलस्वरूप, अनेक भीषण बीमारियों से ग्रस्त होना आम बात है। बाल विवाह के कारण बार-बार गर्भधारण और असमय गर्भपात का सामना करना पड़ता है। नवजात शिशु के भी अकाल मौत का शिकार होने का अंदेशा बना रहता है। कुपोषण और खून की कमी से मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
कानून बना देना एक बात है और उस पर अमल करना दूसरी बात। हमारे देश में जहां लोगों को हेलमेट पहनने के लिए भी मुहिम चलानी पड़ती है, चालान काटने पड़ते हैं, फिर भी कुछ दिनों में स्थिति ज्यों की त्यों हो जाती है। हमारे समाज के लोगों की मानसिकता ही ऐसी हो चुकी है। सिर्फ शासन और प्रशासन के चाहने से भी यह बीमारी हल नहीं होगी, इसके लिए निजी स्तर पर भी इच्छा शक्ति चाहिए। सिर्फ कानून बना देने से ही सब कुछ हो जाएगा, यह भी संभव नहीं लगता।  बाल विवाह तो सदियों से चला आ रहा है। शायद इसी वजह से इसकी जड़ें कुछ ज्यादा गहरी हो गई हैं। इसको दूर करने के लिए सबसे जरूरी है लोगों की मानसिकता को बदलना। और यह भी एक लंबी प्रक्रिया है, क्योंकि व्यक्ति की मानसिकता तय करने में भी तो हमारे समाज की अहम भूमिका होती है। दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं।

हमारे समाज में बेटी का जन्म होना ही जैसे अपराध हो। कई बार तो जन्म से पहले भी बहुत कुछ हो जाता है जैसे कन्या भ्रूण हत्या। बेटी के होने पर कितने मंगल गीत हैं, अगर इसकी खोज करें तो मुश्किल से ही कोई गीत मिलेगा, लेकिन बेटों के जन्म पर तो तमाम गीत हैं। क्या आशय है इन सबका ? क्या इसका मतलब सिर्फ यही नहीं है कि बेटियां बोझ की तरह हैं ?  जन्म के बाद बेटी की शादी पिता की चिंता का एक बड़ा कारण होती है। इस कारण कई माता-पिता सोचते है कि जल्दी से इसका विवाह कर दिया जाए। कम उम्र में विवाह करने के पीछे एक यह धारणा भी सुनने में आती है कि जितनी कम उम्र में विवाह हो जाएगा, उतना ही दहेज कम देना होगा। वैसे भी बेटी तो पराया धन होता है। आज नहीं तो कल उसे किसी दूसरे के घर जाना है। इस तरह के जुमले अक्सर सुनने को मिलते हैं । जब बेटी पराया धन ही है तो इस कारण उनको पढ़ाया भी नहीं जाता है। उसके पीछे भी साजिश है कि अगर पढ़ लिख गई तो कहीं अपने अधिकारों की मांग न करने लगे। और इसके लिए समाज का एक बड़ी हिस्सा आज भी तैयार नहीं है। पितृसत्ता को बहुत बड़ा खतरा है इससे क्योंकि समाज को तो महिलाओं को परदे में डरी सहमी रहनेवाली, पिता, भाई और पति की आज्ञा का निर्वहन करने वाली भूमिकाएं ही पसंद हंै। इससे अधिक होने पर पुरुषों के अहं को चोट पहुंचती है।
जल्दी शादी करने के पीछे का एक सोच यह भी काम करती है कि बेटी के साथ अगर कुछ ऊंच-नीच हो गया तो मुसीबत और बढ़ जाएगी। और इस ऊंच-नीच का जिम्मेदार भी हमारा समाज ही है। सहज ही सवाल उठता है कि हम कैसे समाज में जी रहे हैं, जहां पर लड़कियां खुली हवा में सांस भी नहीं ले सकतीं। रिवाज और प्रथाओं के नाम पर तो जाने क्या-क्या हो सकता है और हो रहा है हमारे देश में। अक्सर लोगों को यह बोलते हुए सुना जाता है कि उनके समाज में तो लड़कियों को ज्यादा पढ़ने का रिवाज ही नहीं है। सामाजिक कुरीतियों को परंपरा और रिवाज के नाम से ढंक दिया जाता है।
आजादी के सात दशक बाद भी हम इस बुराई से पूरी तरह नहीं निकल पा रहे हैं । सरकार बालिकाओं के लिए तमाम सारी योजनाएं संचालित कर रही हैं। देश भर में कई सारे स्वयं सेवी संगठन इसमें अपना सहयोग भी दे रहे हैं।

हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अंधेरे और अशिक्षा में जी रहा है। तमाम माता-पिता अपनी मुश्किल कम करने के लिए अपनी बेटी को मुसीबतों के कुएं में जानबूझकर धकेल देते हैं। सच तो यह है कि इस तरह की एक भी घटना होती है तो यह पूरे समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
कम उम्र में विवाह से एक बड़ा नुकसान यह होता है कि तमाम प्रतिभाएं अविकसित ही रह जाती हैं। कितनी ही प्रतिभाशाली लड़कियों की उन्नति के रास्ते बंद हो जाते हैं। समाज में लड़कियों को लेकर दोहरा नजरिया हमेशा से ही रहा है और वह अलग- अलग स्तरों पर साफ दिखाई भी देता है।
बाल विवाह को खत्म करने और इसकी जागरूकता के लिए सरकार द्वारा कई सारे योजनाएं और अभियान चलाए जा रहे हैं, जिसकी सुचना होर्डिंगों, चैनलों अदि के जरिए आम जनता तक पहुंचाई जाती है, मगर यह कितना कारगार है? क्योंकि स्थिति में कुछ खास सुधार होता नहीं दिखता। बाल विवाह अपने समकालीन सभी कुरीतियों में सबसे शातिर और सबसे शक्तिशाली निकला।

जहां बालिका अशिक्षा, सती प्रथा, बेमेल विवाह, परदा प्रथा, विधवाओं का घोर उत्पीड़न आदि कुरीतियों में से कुछ खत्म हुई हैं तो कुछ काफी हद तक कम हुई हैं, वहीं बाल विवाह ने सभी कानूनों, समाज सुधार आंदोलनों और जागरुकता, आधुनिकता और आर्थिक प्रगति को धता बताते हुए न सिर्फ अपना वर्चस्व कायम रखा है, बल्कि समाज को जैसे खुली चुनौती दी हो । अन्य कुरीतियों की तरह बाल विवाह को कम करने के लिए जन चेतना रूपी हथियार ही सबसे ज्यादा कारगर होगा। कॉलेज की छात्र-छात्राएं, एनजीओ, जागरूक व्यक्ति व्यक्तिगत या सामूहिक प्रयास द्वारा इस चेतना को फैलाने में अपनी सार्थक भूमिका निभा सकते हैं कि बेटियां पराया धन बाद में हैं पहले अपना खून हैं। क्या कभी वह दिन आएगा जब मां-बाप बेटी को अपना बच्चा समझकर बड़ा करेंगे? आखिर कब तक समझदार मां-बाप विवाह जैसे अहम फैसले को गुड्डा-गुड्डी के खेल की तरह निपटाते रहेंगे? और कब तक हम बच्चों के बचपन को बाल विवाह के मंडप में फूंकते रहेंगे?

 

 

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