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प्रतिबंध का दायरा

इसी दोहरी अवधारणा के बीच आजादी मिलने के बाद सिनेमेटोग्राफी एक्ट के तहत 1952 में ‘फिल्म सेंसर बोर्ड’ बना और 1983 में एक्ट में कुछ बदलाव के बाद इस संस्था का नाम ‘सेंट्रल बोर्ड आॅफ फिल्म सर्टीफिकेशन’ कर दिया गया।
Author July 16, 2017 03:28 am
प्रतीकात्मक चित्र

सत्यदेव त्रिपाठी

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की संहिताएं दूरदृष्टि के साथ बनी हैं, पर ‘शिष्टता-नैतिकता की सीमा’, ‘किसी समूह की मर्यादा का भंग होना’, और ‘समिति के अपने विवेक के इस्तेमाल की छूट’ आदि ऐसे वाक्य हैं, जिनकी अवधारणाएं गणितीय या तकनीकी ढंग से निर्धारित नहीं की जा सकतीं।

सबसे अच्छा समाज वह होता है, जहां कोई सेंसर न हो- कला पर तो कतई नहीं। क्योंकि कला माध्यमों को सेंसर के भरोसे न परखा जा सकता है, न समझा। मगर यह भी सच है कि ऐसी समझ और परख के लिए एक हद तक सेंसर की दरकार भी वांछित हो सकती है, जिससे एक अच्छे समाज की संभावना बनती है।  इसी दोहरी अवधारणा के बीच आजादी मिलने के बाद सिनेमेटोग्राफी एक्ट के तहत 1952 में ‘फिल्म सेंसर बोर्ड’ बना और 1983 में एक्ट में कुछ बदलाव के बाद इस संस्था का नाम ‘सेंट्रल बोर्ड आॅफ फिल्म सर्टीफिकेशन’ कर दिया गया। हर संहिता की तरह इसका भी अंतर्निहित उद्देश्य रहा है कि सेंसर होते-होते यह समझ बन जाए कि एक सभ्य समाज के विकास के लिए कैसी चीजें फिल्मों में आनी चाहिए और कैसे। पर इतने दिनों में सेंसर-मुक्त समाज निर्माण की ऐसी समझ की तरफ एक भी कदम आगे बढ़ने के सिवा सेंसर बोर्ड प्रतिबंधन बनाम फिल्म में प्रयुक्त होते एक से एक तत्त्वों के बीच टकराहट होती ही आ रही है। ज्यादा असंतुष्ट होने पर निर्माता के पास अदालत में जाने की भी व्यवस्था है। तब समिति के साथ एक जज भी फिल्म देखने बैठता है। इसका मतलब यह कि समिति के कार्य और अधिकार चुनौतियों से परे नहीं हैं। यह बेहद जनतांत्रिक है, पर इससे यह भी स्पष्ट होता है कि बोर्ड की विश्वसनीयता संदेहों से परे नहीं है। इस सूरतेहाल में अब सेंसरमुक्त समाज की अवधारणा की उम्मीद तो क्या, उसका सपना भी नहीं आ पाया। यानी अपने अंतरिम अर्थ में सेंसर बोर्ड की कोई प्रासंगिकता बनी ही नहीं, तो होने का सवाल ही कहां पैदा होता है?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि बोर्ड के सदस्यों की अर्हताएं साफ नहीं हैं। उठे हुए विवादों के बीच खुल कर सामने आया कि दर्जा आठ और दस पास लोग और कुछ व्यापारी भी बोर्ड के सदस्य हैं। फिर सरकार द्वारा मनोनयन की प्रक्रिया भी नितांत साफ-सुथरी कैसे कही जा सकती है! यह मामला फिल्म और नाटक आदि कला-माध्यमों की प्रस्तुति का है, जो पूर्व तैयारी के बाद एक साथ एक बड़े जनसमूह तक पहुंचते हैं। इसलिए फिल्मों के रिलीज या नाटकों के ओपेन होने के पहले उसकी जांच करके सुनिश्चित कर लिए जाने का विधान सराहनीय है, ताकि समाज में बदअमनी फैलाने जैसा कुछ आपत्तिजनक उसमें हो, तो रोका जा सके। उनकी हरी झंडी (सर्टीफिकेट) के बाद ही उसका प्रदर्शन हो पाता है। इसमें आम आदमी के बीच पहुंचने वाली और बहुत असरदार सिने विधा ही ज्यादा निशाने पर होती है।  ‘फिल्म सेंसर बोर्ड’ जांच करता है कि ‘‘संविधान के अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जो सामान्य से प्रतिबंध हैं, उनका उल्लंघन तो नहीं किया गया है। इसके अलावा उसमें समाज से जुड़े किसी समूह की मर्यादा को भंग तो नहीं किया गया है। फिल्म में शिष्टता-नैतिकता की सीमा को तोड़ा तो नहीं गया है। आजकल ऐसे दोहरे अर्थ वाले शब्दों पर भी प्रतिबंध है, जो मूल प्रवृत्तियों को हताहत करते हैं। सांप्रदायिक शब्दों के प्रयोग और दृश्यों के प्रदर्शन पर भी रोक है। साथ ही अश्लीलता और भ्रष्टाचार का प्रदर्शन उस सीमा तक ही करने की छूट है, जहां तक वह मानवीय संवेदनशीलता पर प्रहार न करे।’’ इन बातों के साथ ही ‘‘बोर्ड को अपने विवेक का प्रयोग करने की भी आजादी’’ है।

सब कुछ के बावजूद यह सुधारवादी ढांचा अपनी संवैधानिक प्रकृति के चलते कहीं न कहीं कागजी ढर्रे से ग्रस्त है। फिल्म और नाटक अपनी प्रकृति में व्याख्यापरक माध्यम हैं और नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा से समाज को बदलने और उसे नई दिशा देने के हामी भी। उनके सर्जक कई बार समिति के सदस्यों से कहीं बड़ी प्रतिभा और ख्याति के मालिक होते हैं। सो, क्या और कैसा होना चाहिए, जो समाज के लिए मुफीद या आपत्तिजनक न हो, को लेकर बहस-विवाद के अवसर आए दिन आते रहते हैं।सेंसर बोर्ड की संहिताएं दूरदृष्टि के साथ बनी हैं, पर ‘शिष्टता-नैतिकता की सीमा’, ‘किसी समूह की मर्यादा का भंग होना’, और ‘समिति के अपने विवेक के इस्तेमाल की छूट’ आदि ऐसे वाक्य हैं, जिनकी अवधारणाएं गणितीय या वैज्ञानिक ढंग से निर्धारित नहीं की जा सकतीं। मसलन, ज्वलंत यथार्थ नाम का तत्त्व जीवन के समांतर किसी भी कला का आधारभूत नियामक होता है और वह कला-माध्यमों में अपनी तरह से आता है। अपराधियों को छुड़ाने के लिए मंत्रियों का पुलिस पर दबाव जगजाहिर है। फिल्मों में खुल कर आता है। सबको भाता है। कभी किसी नेता या सेंसर बोर्ड ने इस यथार्थ पर एतराज नहीं किया। ‘शहंशाह’ में जेके को छुड़ाने के लिए मंत्री आता है पुलिस चौकी में और छोड़ने से इनकार करने पर इंस्पेक्टर बने अमिताभ बच्चन का कॉलर पकड़ लेता है, लेकिन वर्दी पर हाथ डालने के जुर्म में गिरफ्तार करने की धमकी पर छोड़ भी देता है। पर ‘सिंहम’ में भ्रष्ट मंत्री के चूतड़ पर अजय देवगन समेत सब पुलिस वाले मिल कर सैकडों लात मारते हैं और न सेंसर कुछ कहता, न राजनेता!

अश्लीलता का मामला भी ऐसा ही है। ‘चक्र’ में चाल के अपने झोपड़े के दरवाजे पर नहाती स्मिता पाटिल के खुल-से गए अंग पर उत्तेजना नहीं, रहम आता है और उस तरफ निहारने वालों पर गुस्सा। यही हाल ‘बैंडिट क्वीन’ के नग्न दृश्य का भी है कि कोई कपड़ा फेंक कर ढंक देने का मन होता है। लेकिन ‘जिस्म’ और ‘ख्वाहिश’ जैसी ढेरों फिल्में हैं, जिसमें ‘डर्टी पिक्चर’ जैसी अच्छी फिल्म भी शामिल है, के दृश्यों को ‘कट’ करने को कहा गया। इसी तरह ‘गंगाजल’ और ‘मृत्युदंड’ में इस्तेमाल गालियां नागवार नहीं गुजरतीं, पर ‘मस्ती-2’ और ‘उड़ता पंजाब’ पर सेंसर की रोक विवाद पैदा करती है।  अमर्त्य सेन पर सुमन घोष के निर्देशन में बनी फिल्म ताजा मामला है, जिसमें अमर्त्य सेन के वक्तव्य में आए चार शब्दों- हिंदू, हिंदुत्व, गाय और गुजरात- को मूक करने के निर्देश आए हैं, जिस पर इतिहासकार रोमिला थापर, इरफान हबीब और फिल्मकार श्याम बेनेगल जैसे दिग्गजों द्वारा बोर्ड के निर्देशों पर आलोचनात्मक प्रतिक्रिया से मामला गरमा गया है। आज सुमन घोष के साथ इतने बड़े नाम हैं, जिनके अभाव में नवाजुद्दीन सिद्दीकी अभिनीत फिल्म ‘लवली’ के लिए बोर्ड द्वारा सुझाए एक सौ सत्तावन कट मानने पड़े। ऐसे तमाम उदाहरण हैं।

विजय तेंडुलकर लिखित नाटक ‘गिधाड़े’ को सत्यदेव दुबे के निर्देशन में डॉ श्रीराम लागू ने बनाया था, जिसमें सेंसर बोर्ड ने पचास-बावन कट बताए थे। लेकिन बहस के दौरान सबके सब कट निरस्त हो गए, पर एक कट पर बोर्ड अड़ गया, जिसमें बहन का नाजायज गर्भ घर में गिराया जाना और खून से भीगी साड़ी पहन कर उसका मंच-प्रवेश है। बोर्ड के अड़ियल रुख के मद्देनजर दुबे-लागू ने लड़की की साड़ी पर पीले दाग के साथ मंच पर आने और नेपथ्य से ‘कृपया, पीले को लाल समझें’ की घोषणा का प्रस्ताव रखा, जिसे बोर्ड ने तुरंत मान लिया। ऐसी हास्यास्पद हरकत वाले बोर्ड की प्रासंगिकता की चर्चा बेमानी है। यह मामला वैसा ही है, जैसे सुधार के लिए जुर्म और अपराध का और उसके खिलाफ कानून और सजा का प्रावधान, जिसमें हम देख रहे हैं कि सारी कड़ाइयों और सजाओं के बावजूद अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं!  सब कुछ के बावजूद कला माध्यमों में सेंसर-मुक्त समय की प्रतीक्षा अकल्पनीय क्यों हो!

 

 

 

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First Published on July 16, 2017 3:28 am

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