ताज़ा खबर
 

भूरी का कुनबा

विक्की के बंगले के पीछे वाली सीढ़ियों के नीचे एक भूरी कुतिया ने चार पिल्लों को जन्म दिया था। बस, विक्की और उसके दोस्त दीवाने हो गए थे उन पिल्लों के पीछे।
Author October 22, 2017 05:34 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

 वंदना सहाय 

सोसाइटी के बच्चों को एक नया टाइमपास मिल गया था। विक्की के बंगले के पीछे वाली सीढ़ियों के नीचे एक भूरी कुतिया ने चार पिल्लों को जन्म दिया था। बस, विक्की और उसके दोस्त दीवाने हो गए थे उन पिल्लों के पीछे।  स्कूल से लौटने के बाद उन सबका पहला काम होता, यूनीफॉर्म बदल कर खाना खा लेना और फिर विक्की के बंगले के पीछे जमा होकर पिल्लों से खेलना। जाड़े के दिन शुरू हो गए थे और उन्हें भूरी और उसके पिल्लों पर बड़ा तरस आता। वे सोचते- उनके पास तो मोटे-मोटे कंबल और स्वेटर हैं, पर इन बेचारों के पास तो कुछ भी नहीं है। बस, एक छोटी-सी सीढ़ी की छत इन्हें ठंड से कैसे बचा पाएगी? खाने के लिए भी तो इनके पास कुछ नहीं है। पता नहीं, सिर्फ मां के दूध से इन चारों का पेट कैसे भरता होगा? जब वे कूं-कूं करते, तो उन्हें लगता कि वे भूख और ठंड से बेचैन होकर आवाज निकाल रहे हैं। लेकिन क्या किया जाय! अगर उनके मम्मी-डैडी को इस बात की जरा भी भनक लगी, तो वे उन्हें उनके साथ खेलने की इजाजत नहीं देंगे और साथ ही पिल्लों को भी बंगले से बाहर निकलवा देंगे। उन्होंने उन्हें पहले ही समझा रखा था कि लावारिस कुत्तों का काटना खतरनाक होता है, क्योंकि उनकी लार और उनके शरीर में कई प्रकार के कीटाणु होते हैं।

पिल्ले धीरे-धीरे बड़े हो रहे थे और अब उनकी मां भी उन्हें ज्यादा समय तक दूध नहीं पिलाती थी। वह उन्हें बंगले में छोड़ बाहर निकल जाया करती। बंगले के पीछे काफी जगह होने की वजह से वे बाहर नहीं निकल पाते थे। बच्चे समझ गए कि उन्हें दूध के अलावा और भी चीजें खाने के लिए देनी चाहिए। बस, एक निर्णय किया गया- सभी अपने-अपने घर से उनके खाने के लिए कुछ न कुछ लाया करेंगे। फिर क्या था, शाम होते-होते बच्चे अपने घरवालों की नजरें बचा कर तरह-तरह की चीजें उनके लिए लाते। कोई बिस्किट लाता, तो कोई ब्रेड। विक्की तो अक्सर अपने दूध का गिलास ही अपनी मम्मी की नजरों से छिपा कर उन्हें पिला देता। अच्छा खा-पीकर पिल्लों के साथ भूरी भी तंदरुस्त हो गई थी।

सब कुछ समझते हुए भी बच्चे उन पिल्लों का मोह नहीं त्याग पा रहे थे। उन्हें भूरी और उसके पिल्ले बड़े प्यारे लगते। भूरी भी न कभी बच्चों पर भौंकती थी और न ही कभी उन्हें काटने का प्रयास करती थी। उन्हें देखते ही दुम हिलाना शुरू कर देती थी जैसे पालतू हो। पिल्ले भी ऐसे दिखते, जैसे सॉफ्ट-टॉयज हों- गोल-मटोल और रोएंदार। भूरा वाला बिल्कुल अपनी मां पर गया था। दूसरे और तीसरे काले और भूरे रंगों के मिल जाने से चितकबरे हो गए थे। चौथे वाला सबसे अलग था- बिलकुल काला और मासूम आंखों वाला। यह कुछ ज्यादा ही गोल-मटोल था। बच्चों की तो जैसे इनमें जान बसती थी। उन्होंने अब इनका नामकरण भी कर दिया था- भूरे वाले को ‘ब्राऊनी’, चितकबरों को ‘स्पॉटी नं. वन’ और ‘स्पॉटी नं. टू’ तथा काले वाले को ‘ब्लैकी’ पुकारा करते थे। अब तक विक्की के मम्मी-डैडी को पता नहीं चल पाया था कि बंगले के पीछे बच्चे पिल्लों के साथ खेलते हैं। पर, इस बात का डर बच्चों को हमेशा बना रहता था कि अगर वे पकड़े गए तो क्या होगा?

और, एक दिन वही हुआ, जिसका उन्हें डर था- विक्की और उसके दोस्त उन्हें गेंद ढूंढ़ना और ‘शेकहैंड’ करना सिखाने में इतने मशगूल हो गए कि विक्की की मम्मी कब उसे आवाज देती हुई वहां तक पहुंच गर्इं, उन्हें पता ही नहीं चला। विक्की की गोद में पिल्ले को देख कर उनका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उन्होंने कड़क आवाज में कहा- ‘विक्की, क्या हो रहा है? क्या मैंने तुम्हें समझाया नहीं था कि कुत्तों के साथ खेलना कितना खतरनाक हो सकता है? इनके काटने से ‘हाइड्रोफोबिया’ जैसी जानलेवा बिमारी भी हो सकती है। इनके शरीर और लार में भी कई तरह के जीवाणु और कीटाणु होते हैं। बहुत हो गया, अब आज से तुम लोगों का इन पिल्लों के साथ खेलना बंद। तुम लोग अभी जाकर डेटॉल से हाथ धोओ, वर्ना इनके शरीर की गंदगी तुम्हारे हाथों से खाने में मिल कर तुम्हारे पेट के अंदर पहुंच जाएगी। तुम बीमार हो सकते हो। छि:, कितने गंदे हैं ये! मैं अभी सिक्योरिटी वाले को बुला कर इन्हें सोसाइटी से बाहर निकलवाती हूं।’

विक्की ने अपनी मम्मी को लाख समझाने की कोशिश की, पर उसकी एक न चली। बस, बच्चे अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए उन्हें सोसाइटी से बाहर निकलते हुए देखते रहे। शुरू-शुरू में तो बच्चों को ब्राऊनी, स्पॉटी वन और टू तथा ब्लैकी की काफी यादें आती थी, पर धीरे-धीरे वे उन्हें भूल-से गए।
सहसा, एक दिन विक्की और उसके मम्मी-डैडी की नींद कुत्तों के तेज भौंकने की आवाज से टूटी। ऐसा लग रहा था जैसे कई कुत्ते एक साथ भौंक रहे हों। बंगले के पीछे की चारदीवारी के बाद दूर तक खुला मैदान था। वहां कुत्ते अक्सर भौंका करते थे, पर आज ऐसा लग रहा था जैसे वे भौंक-भौंक कर उन्हें जगा रहे हों। विक्की के डैडी को भी कुत्तों का ऐसा व्यवहार कुछ अजीब-सा लगा।

वे पता लगाना चाहते थे कि आखिर माजरा क्या है? वे बंगले के पीछे गए, साथ में विक्की और उसकी मम्मी भी थे। जैसे ही उन्होनें टॉर्च की रोशनी फेंकी, कोई चारदीवारी से फांद कर भागता हुआ दिखाई दिया। पर विक्की ने टॉर्च की रोशनी में जो देखा, उसे अपनी आंखों पर एक बार तो विश्वास ही नहीं हुआ- ये भूरी और उसके बच्चे थे, जो अब काफी बड़े हो गए थे, पर अपने रंगों से पहचाने जा रहे थे। विक्की ने जब उन्हें पुचकारते हुए उनके नामों से पुकारा तो वे सब दुम हिलाते हुए भौंकना छोड़ शांत हो गए, जैसे उन्होंने अपने दोस्त होने का दायित्व निभा दिया हो।विक्की का गला भर आया। ‘मम्मी, क्या तुम इन कुत्तों को पहचान रही हो? ये कोई लावारिस कुत्ते नहीं हैं। ये भूरी और उसके बच्चे हैं। अगर इन्होंने मौके पर शोर न मचाया होता तो आज वह चोर न जाने हमारी कितनी कीमती चीजों को चुरा ले गया होता।’ कहते हुए विक्की भूरी और उसके बच्चों की ओर तेजी से दौड़ पड़ा। विक्की की मम्मी ने उसे भूरी और उसके बच्चों से मिलने से नहीं रोका। ०

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.