December 05, 2016

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नन्ही दुनिया: पापा का जन्मदिन

मनोरमाजी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं। अभी तक उनकी आश्चर्य भरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई थी। वे ड्राइंग-रूम में पहुंचीं।

Author November 27, 2016 04:11 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

रामकुमार आत्रेय

शाम होने को थी। मनोरमाजी रसोईघर में काम कर रही थीं। देखने पर ऐसा लगता था, मानो वे किसी विशेष अवसर के लिए तैयारी कर रही हैं। उनके चेहरे पर खुशी के भाव थे। हाथ फटाफट चल रहे थे। तभी हर्ष रसोईघर में घुसा। वह ट्यूशन से अभी-अभी लौटा था। मनोरमा को ढूंढ़ता हुआ वह रसोईघर में पहुंचा। मनोरमा को वहां पाकर उसने कहा-मम्मीजी, जरा ड्राइंग-रूम में आना।

ड्राइंग रूम में क्या होगा? यहीं कह दो बेटा, जो भी कहना हो। कुछ खाने को चाहिए क्या?- मम्मी ने अपने हाथों को विराम देते हुए उत्तर दिया।
आप अभी ड्राइंग रूम में आ जाएं, बस। मुझे एक मीटिंग करनी है। दीदी भी वहीं आ रही है।- हर्ष ने बताया।
‘मीटिंग! तू मीटिंग करेगा?अपनी जगह पर खड़े-खड़े मम्मी ने पलटकर आश्चर्य के साथ पूछा था।
हां मम्मी, मुझे मीटिंग ही करनी है। प्लीज, एक बार आप वहां आ जाओ।- उत्साहित स्वर से उत्तर देते हुए हर्ष रसोईघर से निकल कर ड्राइंग-रूम की तरफ चला गया।

मनोरमाजी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं। अभी तक उनकी आश्चर्य भरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई थी। वे ड्राइंग-रूम में पहुंचीं। टेबल के दूसरी ओर रखी कुर्सी पर हर्ष बैठा हुआ था। मानो कोई बड़ा अधिकारी अपने से छोटे अधिकारियों की मीटिंग लेने के लिए तैयार बैठा हो। वे समझ गर्इं कि वहां उस कुर्सी को हर्ष ही लाया है ताकि वह मीटिंग ले सके। सामने के सोफे पर हर्षिता बैठी थी। हर्षिता तीन वर्ष बड़ी थी हर्ष से। भाई-बहन होने के नाते दोनों की शक्लें काफी मिलती थीं।
इससे पहले कि हर्ष अपनी बात शुरू करता, मम्मी ने उससे पूछा-बेटा, यह तो बता कि तूने मीटिंग वाली बात कहां से और कैसे सीखी? तू तो अभी बहुत छोटा है रे। -मम्मी, अब मैं छोटा नहीं हूं। छठी कक्षा में पढ़ रहा हूं। अगर मैं बहुत छोटा होता तो हमारे प्रिंसिपल सर मुझे मीटिंग में नहीं बुलाते। समझी न मम्मी जी। हर्ष ने कहा।

-किस तरह की मीटिंग में बुलाया था तुम्हें, प्रिंसिपल सर ने?

पिछले मास स्कूल में वन महोत्सव मनाया गया था। उसमें शिक्षकों के साथ-साथ अपनी-अपनी कक्षा में प्रथम आने वाले छात्रों को भी मीटिंग में बुलाया गया था। मैं अपनी कक्षा में प्रथम आता रहा हूं, यह तो आपको मालूम है ही, मम्मी। मनोरमाजी मन ही मन बहुत खुश हुर्इं। फिर बड़े प्यार से उसने बेटे से कहा-ठीक है, बेटा, अब तुम कहो तुमने यह मीटिंग क्यों बुलाई है? हर्ष ने कहना शुरू किया -रिस्पेक्टिड मम्मीजी, प्यारी दीदी, आप सभी को शायद पता ही होगा कि कल पापा जी का जन्म दिन है। आप इस अवसर को बड़ी शान से मनाना चाहती होंगी। मैं भी चाहता हूं कि हम इस दिन को इस तरह से मनाएं कि यह दिन हमें हमेशा हमेशा के लिए याद रहे। मैं आप दोनों से अनुरोध करता हूं कि इस विषय में अपने कीमती सुझाव दें। सबसे पहले मम्मीजी, आप बताएं कि कल का दिन आप किस तरह से मनाना चाहेंगी?

आनंदित स्वर में मनोरमाजी ने कहा- बेटा, कल मैं तुम्हारे पापा का मन-पसंद भोजन बनाऊंगी। खाने की जो जो चीजें उन्हें पसंद हैं, वे सब कल हमारे यहां बनेंगी। अगर तुम, कोई बात अलग से बताना चाहो तो वह भी बता दो।हर्ष ने अपनी ओर से कोई सुझाव न देकर, अपनी बहन से पूछा- हां तो हर्षिता दीदी, आप कहें, कल का दिन आप किस तरह मनाना पसंद करेंगी? क्या आप पापा को कोई उपहार देना पसंद करेंगी?अगर हां तो कौन-सा?  हर्षिता को हर्ष की बातों में बहुत मजा आ रहा था। वह चहकते हुए बोली- भैया, पापा रोज डायरी लिखते हैं। मैंने कल रात देखा था, उनकी डायरी समाप्त होने वाली है । मैं मम्मी को साथ लेकर किसी दुकान से अच्छी-सी डायरी खरीद कर लाऊंगी। साथ में एक पेन भी लाऊंगी। ये दोनों चीजें मैं पापा को भेंट करूंगी।

शाबास, बहुत बढ़िया! कल का दिन निशचय ही एक अच्छा-दिन होगा। ठीक है, आप सब तुरंत तैयारियां शुरू कर दें। शुभकामनाएं आप सब के लिए। ऐसा कहते हुए हर्ष कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।अरे! तूने तो बताया ही नहीं कि तू कल का दिन कैसे मनाएगा ? मनोरमा के साथ हर्षिता भी बोल उठी थी। यह बात अभी परदे में ही रहनें दें। कल आप सभी को मालूम पड़ जाएगा कि मैं यह दिन कैसे मनाता हूं। इतना कह कर हर्ष बाहर निकल गया। अगले दिन सुबह हर्ष अपने पापा, मम्मी और दीदी के साथ अपने स्कूल पहुंच गया । रात में ही उसने पापा को उनके दफ्तर से छुट्टी लेने के लिए मना लिया था। प्रात:कालीन सभा में स्कूल के प्रिंसिपल ने हर्ष के पापा का परिचय कराया। उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दी। उनके हाथों से स्कूल के प्रांगण में आम का एक पौधा लगवाया गया। वह पौधा हर्ष के अनुरोध पर किसी पौधशाला से प्रिंसिपल सर ने मंगवाया था।

हर्ष के पापा ने उसका खर्च चुकाया। बच्चों को अपने हाथ से उन्होंने मिठाई बांटी।वे सभी घर लौटने लगे तो हर्ष ने वहीं रखा एक और पौधा जो जामुन का था, साथ ले लिया। वह भी प्रिंसिपल सर ने मंगवाया था। हर्ष के घर के समीप सड़क के किनारे थोड़ी जगह खाली पड़ी थी। हर्ष ने पापा के हाथों से वह पौधा वहां लगवाया। पक्की र्इंटों का घेरा बनाया, ताकि पौधा सुरक्षित रहे। हर्ष ने निश्चय किया कि वह जामुन के उस पौधे को पानी खुद दिया करेगा। इसके उपरांत वे सभी अपने घर पहुंचे। हर्ष ने वहां मम्मी-पापा के पांव छूते हुए कहा- पापा, पता नहीं, आपको अच्छा लगा कि नहीं ? मैं तो आपको यही उपहार दे पाया। आपके हाथों से रोपे गए पौधों की छाया में लोग बैठेंगे। फल खाएंगे और आपको याद करेंगे। ठीक किया न, पापा? बिल्कुल ठीक किया, बेटा, बिल्कुल ठीक। इतना बढ़िया उपहार तो आज तक मुझे किसी ने नहीं दिया बेटा। पापा ने ऐसा कहते हुए हर्ष को छाती से लगा लिया।
तब मम्मी और दीदी प्यार से उसके कंधों को थपथपा रही थीं। १

 

 

 

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First Published on November 27, 2016 4:09 am

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