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बाल कविता- लालच बुरी बला

देशबंधु ‘शाहजहांपुरी’ की कविताएं।
Author October 22, 2017 05:43 am
प्रतीकात्मक चित्र।

देशबंधु ‘शाहजहांपुरी’

बड़े ठाठ से चीकू चूहा,
निकला अपने बिल से
कैसे दावत आज उड़ाऊं,
सोच रहा था दिल से।
तभी अचानक पड़ा दिखाई,
अदभुत एक मकान
आकृति बिल्कुल मानव जैसी,
बड़ी नाक और कान।

जिसको बंगला उसने समझा,
वह था रावण का पुतला
पैरों से सिर तक पहुंचा पर,
खाने को कुछ नहीं मिला।

पुतले के मुख के अंदर से,
जब झांका उसने बाहर
सूख गया मुंह, फूली सांसें,
आने लगा उसे चक्कर।

झटपट सरपट नीचे भागा,
समझा लालच बुरी बला
घर का रुखा सूखा खाना,
दावत से है कहीं भला।

 

शब्द-भेद

कुछ शब्द बोलने में एक जैसे जान पड़ते हैं, इसलिए उन्हें लिखने में अक्सर गड़बड़ी हो जाती है। इससे बचने के लिए आइए उनके अर्थ समझते हुए उनका अंतर समझते हैं।

कामना / कमाना

जब हम अपने मन में किसी चीज की इच्छा रखते हैं तो उसे कामना भी कहते हैं, जबकि किसी काम के बदले हम जो पैसा या उसके बदले कोई वस्तु प्राप्त करते हैं उसे कमाना कहा जाता है।

इच्छा / ईक्षा

किसी वस्तु या काम की चाहत रखने को इच्छा कहते हैं, जबकि ईक्षा का अर्थ होता है बारीकी से देखना। समीक्षा शब्द इसी से बना है।

 

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