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शब्द-भेदी- अच्छा-भला

किसी के लिए कोई विशेषण तत्काल न सूझे तो हम ‘अच्छा’ का प्रयोग करते हैं। यह समस्या निवारक शब्द जैसे हमारी जीभ पर स्थायी निवास बनाए बैठा है। अकेला शब्द अनेक सद्गुणों को अपने में समेटे हुए है और अपनी मिठास बिखेर कर माहौल को अच्छा बनाता है।
Author November 12, 2017 04:35 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

सुरेश पंत 

किसी के लिए कोई विशेषण तत्काल न सूझे तो हम ‘अच्छा’ का प्रयोग करते हैं। यह समस्या निवारक शब्द जैसे हमारी जीभ पर स्थायी निवास बनाए बैठा है। अकेला शब्द अनेक सद्गुणों को अपने में समेटे हुए है और अपनी मिठास बिखेर कर माहौल को अच्छा बनाता है। आप अच्छे, आपका पद अच्छा, स्वभाव अच्छा, कपड़े अच्छे, घर अच्छा, सब अच्छा-ही-अच्छा! अब अगर कहा जाए कि छोटा-सा भोला-भाला यह शब्द कितना ही अच्छा हो, अपने आप में बड़ा उलझा हुआ है, तो अच्छे-अच्छों को शायद विश्वास न हो।  किसी भी शब्द की व्युत्पत्ति ढूंढने के लिए हम पहले संस्कृत की ओर भागते हैं, सो इसका मूल भी संस्कृत में दिखाई पड़ता है। संस्कृत में एक शब्द है ‘अच्छ’, जो हिंदी में ‘स्वच्छ’ शब्द में ज्यों-का-त्यों दिखाई पड़ता है। इसका मूल अर्थ है साफ, निर्मल, पारदर्शी, ‘क्रिस्टल क्लियर’! हिंदी में इसका बहुत अर्थ-विस्तार हुआ है। विशेषण के रूप में इसका प्रयोग ऐसे अनेक संदर्भों में होता है जब किसी की प्रशंसा उसके कार्यों, गुणों या अन्य बातों के लिए की जाती है। जैसे: प्रशंसनीय या अनुकरणीय होने पर: अच्छा विचार है आपका, अच्छे काम कीजिए, अच्छा स्वभाव हो तो मित्र बना लो, अच्छा मित्र हितैषी भी होता है…।

देखने-सुनने में मन को आनंदित/ प्रसन्न करने वाला, मनोरंजक: अच्छा था कार्यक्रम, अच्छा संगीत, अच्छा स्वर, अच्छी पेंटिंग, अच्छी धूप…।
खोट या मिलावट रहित, शुद्ध: अच्छी मिठाई दीजिए, अच्छा देसी घी चाहिए, अच्छा सोना है इन गहनों में, अच्छा मोती चमकदार होता है…
गुणी, अनुभवी, विश्वसनीय: हमें अच्छा डॉक्टर मिल गया, अच्छे नागरिक बनिए, कोई अच्छा शिक्षक बताइए…।
शुभ या कल्याणकारी: अच्छा मुहूर्त है आज, अच्छा लग्न था, अच्छी साइत तो दस बजे की है, लगता है आज दिन अच्छा है…।
लाभदायक, आनंददायक: अच्छा लाभ कमाया, मिल गई अच्छी नौकरी? अच्छे दिन कब आएंगे, अबके अच्छी फसल होगी…।
संतोषजनक, सुंदर, निर्दोष: अच्छी बहू, अच्छा कुल, अच्छी लिखावट, अच्छा प्रश्न, अच्छा उत्तर…।
गुण, दशा, स्थिति: अच्छा आम (मीठा, ताजा), रोगी कुछ अच्छा है (दशा सुधर रही है), ‘वे समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।’
पर्याप्त, बहुत: धंधे में अच्छा मुनाफा कमाया। मेरी आमदनी अच्छी है, अच्छे दाम मिलें तो बेच दूंगा।
हितैषी/ घनिष्ठता: वे हमारे अच्छे संबंधी हैं। दोनों में अच्छी मित्रता है।
विपरीत भाव में: उसकी अच्छी पिटाई हुई। (=बुरी तरह पीटा), अच्छा हाल बनाया उसका (=बुरा हाल बनाया)।
अव्यय के रूप में भी अच्छा की अर्थ-छवियां विविध हैं। कहीं यह किसी प्रोक्ति के भीतर अपने आप में स्वतंत्र वाक्य होता है, तो कहीं वाक्य का अंश बन कर विशेष अर्थ देता है। जैसे:
ठीक, बेहतर: कैसे हैं आप? अच्छा हूं।
स्वीकृति: समय से खा लेना। जी, अच्छा।
अविश्वास: उनका तो निधन हो गया। अच्छा…?
विस्मय: अच्छा, आप भी नहीं समझे मेरी बात!
बात प्रारंभ करने के लिए: अच्छा, आप पहले क्या करते थे?
विषय बदलने के लिए: अच्छा, अब दूसरी बात पर आइए।
दशा, स्थिति: ‘वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।’ हाल अच्छा नहीं है उनका।
आभार का भाव: अच्छा याद दिलाया आपने।
अपेक्षित स्वीकृति: चुपचाप बैठे रहना, अच्छा?
कुछ शब्दों के साथ संयुक्त होने पर यह विशेष अर्थ देता है। जैसे अच्छे-भले (योग्य, कुशल), अच्छा-खासा (विशेष, ठीकठाक), अच्छे-अच्छों को (बड़े-बड़ों को)। अच्छा से बने कुछ मजेदार मुहावरों पर भी एक दृष्टि यहां डाली जा सकती है:
अच्छा होना: स्वस्थ होना: मैं तो काढ़ा पीने से ही अच्छा हो गया। व्यंग्य: अच्छा हुआ, तुम आ गए! (‘आ गए हो तो झेलो’ वाला भाव)। सकुशल होना: अच्छे तो हो तुम लोग? जी, सब अच्छे हैं।
अच्छा लगना (प्यारा लगना, पसंद होना) ऋषभ को कृत्तिका अच्छी लगती है। उसे मुंबई अच्छा लगता है।
भला से बढ़िया तक
भला की उत्पत्ति का इतिहास रोचक है। माना जाता है कि यह संस्कृत के ‘भद्र’ से बना है। भद्र > भल्ल > भला। कुछ लोग मानते हैं कि इसी ‘भद्र’ से ‘भला’ का विलोम भाई ‘भद्दा’ भी बना है। भद्र > भद्द > भद्दा। इस भले को संस्कृत की एक और धातु ‘भल्’ से निष्पन्न भी माना जा सकता है, जिसका अर्थ है ‘देखना’। देखा जाए तो कम से कम देख-भाल, देखना-भालना जैसे शब्दयुग्मों में तो भद्र की अपेक्षा ‘भल्’ अधिक निकट लगता है।
संस्कृत में ‘भद्र’ के ही अनुरूप हिंदी में भी ‘भला’ के बीसियों अर्थ-छवियों वाले प्रयोग मिलते हैं। विशेषण के रूप में प्राय: इसका प्रयोग त्रुटि रहित, निर्दोष, विकार रहित, नेक, शरीफ आदि के अर्थ में होता है और अनेक स्थितियों में यह अच्छा का समानार्थी या बुरा का विलोम है, जैसे: अच्छा आदमी, भला आदमी, अच्छे लोग, भले लोग।
यह शब्दयुग्म भी बनाता है: अच्छा-भला, भले-बुरे, भला-चंगा, भलमनसाई आदि। अव्यय के रूप में यह ‘भला’ भी अनेक अर्थछवियां समेटे हुए है:
शर्त (चाहे): लोग भले निंदा करें किंतु…, भले तुम आज न मानो, कल मानना पड़ेगा।
व्यंग्य: ये भली रही…, भली चलाई तुम्हारी।
निषेध: वह भला क्या समझे! (वह नहीं समझ सकता), भला मैं कैसे जानूं! (मैं नहीं जानता)
धिक्कार, निंदा: धत, तेरा भला हो।
बोलने का लहजा बदल देने पर यह शुभकामना का अर्थ भी दे सकता है: भगवान करे तुम्हारा भला हो।
अच्छा के भाई-बंदों में ही एक है बढ़िया। यह संस्कृत की ‘वृध्’ धातु से बनी ‘बढ़ना’ क्रिया से विकसित विशेषण है- वृध् > वर्द्ध > बड्ढ > बढ़ > बढ़िया। कुछ संदर्भों में, और एक सीमा तक यह अच्छा के स्थान पर विकल्प से प्रयुक्त हो सकता है। जैसे:
आम अच्छा है, आम बढ़िया है। वह अफसर अच्छा है, अफसर बढ़िया है।
कभी-कभी तुलना में दूसरे से अच्छा बताने के लिए भी बढ़िया का प्रयोग होता है जैसे:
यह साड़ी देखिए, यह बढ़िया है (पहले वाली से अच्छी साड़ी)। अबकी बढ़िया चाय पिलाऊंगी (पिछली चाय की अपेक्षा अच्छी चाय)।
तुलनात्मक रूप से अच्छा बताने के लिए हिंदी में आमतौर पर ‘उससे/ उसकी अपेक्षा अच्छा’ या चरम अवस्था बताने के लिए ‘सबसे अच्छा’ पदों का प्रयोग होता है। कुछ स्थितियों में हम संस्कृत के तत्सम शब्दों उत्तम और श्रेष्ठ/ श्रेष्ठतम का भी प्रयोग करते हैं। उत्तम तो सीध-सीधे उपसर्ग ‘उत्’ से ‘तम’ प्रत्यय जोड़ कर बना लिया गया है। ‘श्रेष्ठ’ संस्कृत में चरम (सुपरलेटिव) अवस्था का ही सूचक है, हम हिंदी वाले उसके सिर पर ‘तम’ का अवांछित भार लादकर उसे डबल-सुपरलेटिव ‘श्रेष्ठतम’ (सबसे श्रेष्ठ) बना देते हैं और भूल जाते हैं कि जब श्रेष्ठ में चरम भाव है तो उसे श्रेष्ठतम बनाने और अशुद्ध प्रयोग की क्या आवश्यकता है!
पर जीवित भाषा तो बहता नीर होती है। वह व्याकरण की चिंता नहीं करती, भाषा के प्रयोक्ता ही उसका मार्ग निर्धारित करते हैं। श्रेष्ठतम का प्रयोग खूब चल रहा है, और रहेगा। ऐसे ही और बहुत से प्रयोग हैं, जो हिंदी ने अपना लिए हैं, उनकी चर्चा फिर कभी। ०

 

 

 

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