ताज़ा खबर
 

प्रसंगवश- उपवास और प्रतिरोध

उपवास प्रतिरोध का सबसे पवित्र और अहिंसक हथियार है। इसे राजनीतिक और सामाजिक प्रतिरोध का साधन महात्मा गांधी ने बनाया।
महात्मा गांधी (File Photo)

उपवास प्रतिरोध का सबसे पवित्र और अहिंसक हथियार है। इसे राजनीतिक और सामाजिक प्रतिरोध का साधन महात्मा गांधी ने बनाया। गांधी के पहले इसका प्रयोग व्यक्तिगत प्रतिरोध के तौर पर होता था। प्रतिरोध के इस पवित्र, नैतिक और अहिंसक हथियार के जरिए साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में उन्होंने नई जान डाल दी। तब से यह जनता के लिए प्रतिरोध का सबसे कारगर हथियार है। उपवास प्रतिरोध का ऐसा साधन है, जो उपवास करने वाले को तो नैतिक बनाता ही है, जिसके विरुद्ध किया जा रहा है उसे भी नैतिक बनाता है। एक तरह से पक्ष-विपक्ष दोनों को बदलने की ताकत प्रतिरोध के इस साधन में है। ऐसी ताकत प्रतिरोध के दूसरे तरीकों में शायद ही हो! धरना, प्रदर्शन, आक्रमण आदि भी विरोधी को झुकाने और उसे पराजित करने के साधन रहे हैं, लेकिन उन साधनों में उन्हें भौतिक रूप से पराजित करने पर जोर अधिक है; जबकि उपवास के जरिए विरोधी को भौतिक के साथ आत्मिक रूप से मित्र बनाने पर जोर है। किसी अनैतिक व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले उपवास के उद्देश्य को सही ठहराने से पहले लोग सौ बार सोचेंगे। इसीलिए प्रतिरोध के रूप में जब कोई व्यक्ति उपवास का प्रयोग करता है तो उसका शत-प्रतिशत नैतिक होना जरूरी है।

उपवास सत्याग्रह का ही दूसरा नाम है। किसी गलत उद्देश्य और आचरण का व्यक्ति इस हथियार का प्रयोग नहीं कर सकता। सत्य के आग्रह के साथ ही उपवास का प्रयोग शोभनीय और नैतिक है। सत्याग्रह को महात्मा गांधी ने ‘आत्मबल’ का ही समानार्थी माना है, जिसे अंग्रेजी में ‘पैसिव रेसिस्टेंस’ कहते हैं। गांधी के शब्दों में यह ‘शस्त्र बल’ के उलट है। इसके आगे सत्याग्रह की और साफ व्याख्या करते हुए उन्होंने ‘हिंद स्वराज’ में लिखा है कि ‘मुझे जो काम पसंद न हो उसे मैं न करूं तो मैं सत्याग्रह या आत्मबल से काम लेता हूं। मिसाल के लिए मान लीजिए सरकार ने एक कानून बनाया, जो मुझ पर लागू होता है। वह मुझे पसंद नहीं है। अब अगर मैं सरकार पर हमला करके उसे वह कानून रद्द करने को मजबूर करूं तो मैंने शस्त्र बल से काम लिया। पर मैं उस कानून को मंजूर ही न करूं और उसे न मानने की जो सजा मिले उसे खुशी से भुगत लूं, तो मैंने आत्मबल से काम लिया अथवा सत्याग्रह किया। सत्याग्रह में अपनी ही बलि देनी पड़ती है।’ इसी के साथ गांधी ने यह भी जोड़ा कि ‘पर बल’ से ‘आत्मबल’ ज्यादा बड़ी चीज है। प्रतिरोध के इस रास्ते में ‘पर बलि’ है। जबकि सत्याग्रह ‘आत्म-बलि’ पर आधारित है। सत्याग्रह के रास्ते पर चलने वाले आदमी के स्वाभाव का अनिवार्य हिस्सा विनम्रता होती है। इस रास्ते में बौद्धिक या शारीरिक शक्ति के बजाय आत्मा की शक्ति और आचरण पर जोर दिया जाता है। इसलिए अहंकार के लिए सत्याग्रही के जीवन में कोई जगह नहीं है। प्रतिरोध के दूसरे मार्गों के जो राही हैं, उनमें अपनी शक्ति का, वह चाहे बौद्धिक हो या शारीरिक, अहंकार प्राय: देखने को मिलता है। विनम्रता भयजनित नहीं होती। उसके पीछे सत्याचरण की शक्ति होती है। इसलिए सत्याग्रही में जहां अहंकार की जगह विनम्रता होती है, वहीं वह दयनीयता से मुक्त आत्मविश्वास से भरा होता है।

सत्याग्रही के लिए बलशाली होना या अपने समर्थकों की बड़ी फौज इकट्ठी करना कतई जरूरी नहीं। शरीर से वह कमजोर है या बलवान, वह अकेले है या उसके पास समर्थकों की बड़ी भीड़ है, ये सारे प्रश्न उसके लिए फिजूल हैं। गांधी कहते हैं- ‘सत्याग्रह के लिए जिस हिम्मत और मर्दानगी की जरूरत होती है वह तोप-बंदूक का बल रखने वालों के पास हो ही नहीं सकती। सत्याग्रही को फौज खड़ी करने की जरूरत नहीं पड़ती। कुश्ती की कला सीखने की भी जरूरत नहीं होती। उसने अपने मन को वश में किया कि फिर वनराज सिंह की तरह दहाड़ करता है और उसकी गर्जना जो लोग उनके दुश्मन बने बैठे हों, उन्हें कंपा देती है।’ सत्याग्रही के लिए गांधी लोभ रहित जीवन की वकालत करते हैं। वे सत्याग्रही के लिए गरीबी का जीवन आवश्यक मानते हैं। गरीबी का जीवन से आशय है कम से कम में जीवन यापन करना। वे मानते हैं कि सत्याग्रही के पीछे सत्य का बल काम करता है। इसलिए उसे सत्य की राह कभी नहीं छोड़नी चाहिए।

सत्याग्रही के लिए अभय होना जरूरी है। अभय हुए बिना सत्याग्रही की यात्रा एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती। गांधी के शब्दों में ‘उसे सब प्रकार और सभी बातों में निर्भय होना चाहिए। धन-दौलत, झूठा मान-सम्मान, नेह-नाता, राज दरबार, चोट-मृत्यु सबके भय से मुक्त हो जाए तभी सत्याग्रह का पालन हो सकता है।’आजाद भारत में सत्याग्रह को प्रतिरोध का हथियार जेपी और लोहिया ने बनाया। वे सत्याग्रह को ‘सिविल नाफरमानी’ कहते थे। लोहिया उपवास के पक्ष में नहीं थे, लेकिन सत्याग्रह के जरिए शांतिपूर्ण प्रतिरोध के हिमायती थे। शांतिपूर्ण धरना, मार्च, प्रदर्शन आदि को वे सिविल नाफरमानी कहते थे। उनकी नजर में सिविल नाफरमानी अन्याय के प्रतिकार का सबसे कारगर औजार है। सिविल नाफरमानी की परिभाषा करते हुए उन्होंने कहा है, ‘सिविल नाफरमानी या अन्याय से शांतिपूर्ण लड़ना अपने आप में एक कर्तव्य है। सिविल नाफरमानी का एक मतलब यह होता है कि विरोधी के दिल से गुस्सा दूर करे, तो इसका मतलब होता है कि जनता के दिल की कमजोरी को दूर करें।… अगर सिविल नाफरमानी करने वाले लोगों के काम के नतीजे से हिंदुस्तान के करोड़ों लोगों के दिल से कमजोरी और डरपोकपन दूर हो जाए तो सिविल नाफरमानी कामयाब समझी जाएगी।’ उपवास सिविल नाफरमानी का ही एक तरीका है। इसके जरिए बड़े प्रतिरोध का आधार तैयार होता है, लेकिन सबसे पहले उपवास हमें अभय करता है। अभय होकर हम क्रूर से क्रूर सत्ता की अनीति का विरोध करने का नैतिक साहस हासिल करते हैं। रघुवीर सहाय कहते हैं:
‘न टूटे, न टूटे
सत्ता का तिलिस्म
मेरे भीतर का कायर टूटेगा’
इसे पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि सहायजी लोहिया के प्रतिरोध के औजार- सिविल नाफरमानी- को ही कविता का सुंदर बाना पहना रहे थे। जिसके पास न अनुयायियों की बड़ी भीड़ है और न प्रतिरोध को इवेंट बना देने की एनजीओ मार्का तरकीब है, ऐसा कोई व्यक्ति जब सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ उपवास का रास्ता चुनता है तब वह गांधी के सत्याग्रह और लोहिया के सिविल नाफरमानी वाले रास्ते पर चल कर नैतिक प्रतिरोध के लिए हमारे सामने एक सगुण उदाहरण बन जाता है।

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग