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लौटा जमाना अनारकली का

चाहे वह शादी-ब्याह का मौका हो या फिर कोई त्योहार-उत्सव, हर उम्र के लोग मुगलिया अंदाज के अनारकली डिजाइन के परिधान पहने देखे जा सकते हैं।
Author November 12, 2017 04:59 am
सुशांत बताते हैं कि मुगलों की संस्कृति भारतीय संस्कृति में इतनी घुल-मिल चुकी है कि सभी उस तरह के कपड़े पहनना चाहते हैं।

फैशन आधुनिकता के साथ-साथ परंपरा को भी साथ लेकर चलता है। परंपरा और आधुनिकता के मेल से सांस्कृतिक बहुलता का पोषण होता है। इन दिनों मुगलिया अंदाज के परिधान का चलन काफी तेजी से बढ़ा है। चाहे वह शादी-ब्याह का मौका हो या फिर कोई त्योहार-उत्सव, हर उम्र के लोग मुगलिया अंदाज के अनारकली डिजाइन के परिधान पहने देखे जा सकते हैं। अनारकली डिजाइन की लोकप्रियता के बारे में बता रही हैं मीना।

एक तरफ जहां मुगलिया निशानियों के नाम बदलने को लेकर विवाद चल रहा है, तो दूसरी ओर मुगलिया पोशाकों का रुझान लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। आज बच्चे-बुजुर्ग, नौजवान, महिलाएं, लड़कियां सभी पर मुगलिया पहनावे का खुमार चढ़ा हुआ है। मुगल-ए-आजम फिल्म में अनारकली ने जो ड्रेस पहनी थी, वह आज हर लड़की किसी न किसी शादी या पार्टी में पहन कर दिखाई दे जाएगी। ऐसा लगता है जैसे पुराना जमाना वापस आ रहा है। भारत में मुगलों की बनाई इमारतें ही धरोहर नहीं हैं, बल्कि उनके समय का खानपान, कपड़े, आभूषण आदि भी हम इस्तेमाल में ला रहे हैं। यह अच्छी बात है कि लोग ताजमहल या टीपू सुल्तान के संकीर्ण विवाद में न फंस कर एक-दूसरे से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं। आलम यह है कि मुगलिया फैशन का लोगों पर ऐसा खुमार चढ़ा है कि बाजार हो या मॉल्स सभी जगह पर लंबे-लंबे फ्रॉक सूट, कली वाले सूट, खूब घेरेदार लहंगे, मुगलिया एंब्रॉइडरी किए हुए दुपट्टे आदि दिखाई देंगे। आजकल शादियों में दूल्हा-दुल्हन भी तैयार होते हैं तो नवाबी ठाठ में। मतलब वे डिजानर से डिमांड करते हैं कि मेरी शादी के कपड़े अकबर जैसे हों या जोधा जैसे हों। जब ‘जोधा अकबर’ फिल्म आई तो उसके बाद तो मुगलिया फैशन का बुखार लोगों में और तेजी से चढ़ा।

नाक की नथ हो या कानों का झुमका सब कुछ हम मुगलिया पहनना चाहते हैं। क्योंकि यह ट्रेंड बन गया है। तो वहीं सोशल साइट्स पर मुगलिया पोशाकों की भरमार है। वहां आपको सिल्क, वेलवेट, मखमली, जॉरजट या जैसा भी कपड़ा आपको चाहिए मिल जाएगा। सोने पर सुहागा यह होता है कि हम केवल अनारकली सूट नहीं पहन रहे हैं बल्कि सिर पर दुपट्टा डाल कर खुद को अनारकली जैसा महसूस भी करवाते हैं। भई जब फैशन किया है तो आधा-अधूरा क्यों? पूरा ही क्यों न किया जाए। यही वजह कि हम सिर से लेकर पैरों तक मुगलई हो जाते हैं।मशहूर फैशन डिजाइनर रोहित बाल के साथ काम करने वाले सुशांत का कहना है कि ‘मुगलिया लिबास के लिए हमारे सामने सबसे बड़ी प्रेरणा ताजमहल है। क्योंकि उसमें जो कला उकेरी गई है। हम उसे ही अपने कपड़ों में डिजाइन करवाते हैं। आज हम चाहे कोई परिधान बनाएं, उसमें काम जरदोजी का ही करते हैं। और उन कपड़ों में डिजाइन की मूल अवधारणा मुगलों की होती है।’ इसके अलावा सुशांत से जब ताजमहल विवाद को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि हमारे अधिकतर कारीगर मुसलमान हैं, जो जरदोजी का काम करते हैं। उनके हाथ से निकल कर जो चीज आती है उसे हर तबके और हर धर्म के लोग पहनते हैं। उसमें कोई भेदभाव नहीं होता। राजनीति बेशक हमें बांटने का काम करे, लेकिन हम जोड़ने का काम करते हैं।

सुशांत बताते हैं कि मुगलों की संस्कृति भारतीय संस्कृति में इतनी घुल-मिल चुकी है कि सभी उस तरह के कपड़े पहनना चाहते हैं। वह ट्रेंड इतना प्रसिद्ध हुआ कि आज भी चल रहा है। क्योंकि मुगलिया पोशाक एक शाही अंदाज देती हैं। मसलन, अनारकली और शेरवानी की मूल अवधारणा मुगलों से आई है, जिसे आदमी और औरत दोनों ही बड़े चाव से पहनते हैं। आप जो पोशाक तैयार करते हैं, क्या वह किसी धारणा या विचार के तहत तैयार किए जाते हैं? इस सवाल के जवाब में सुशांत बताते हैं कि हां, हमारे सारे कपड़े किसी न किसी थीम पर आधारित होते हैं।  दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर एमएन फातिमा कहती हैं कि मैं लखनऊ की रहने वाली हूं और शादी के बाद दिल्ली में पढ़ा रही हूं। वे बताती हैं कि लखनऊ हो या दिल्ली, हर तरफ आजकल शरारा, गरारा, चोली, लंबी फ्रॉक, गाउन जैसी पोशाकें बहुत देखने को मिल जाती हैं। इन सभी पोशाकों का आधार मुगलिया डिजाइन है। गरारा और शरारा तो शुद्ध मुगलिया हैं। मुगलों के खानपान, रहन-सहन और व्यवस्था का जिक्र ‘आइन-ए-अकबरी’ में किया गया है। इसके अलावा उसमें बड़े विस्तार से उस समय के पहनावे के बारे में भी बताया गया है। जिससे हमें मालूम चलता है कि आजकल हम जिस फैशन ट्रेंड को देख रहे हैं, वह मुगलिया है। हाट-बाजार हो या मॉल, सब तरफ मुगलिया कुर्ते, पाजामे, शादी के जोड़े, जूतियां पगड़ी दिखाई दे जाएंगे। इन पोशाकों की खास बात यह है कि ये कपड़े आपके बदन को सिर से लेकर पांव तक ढक देते हैं। और गरमी में आपकी त्वचा को धूप और सर्दियों में ठंड से बचाते हैं।

बंगलुरू में आॅनलाइन कपड़ों का काम करने वाली तूलिका कहती हैं कि अभी मेरे भाई की शादी होने वाली है और मैं उसमें मुगलिया स्टाइल वाला लहंगा पहनने वाली हूं। आजकल इस तरह के लहंगों का बहुत चलन है। वे बताती हैं कि अब शरारा, अनारकली किस्म के लहंगे वापस चलन में आ रहे हैं। और इसी तरह के कपड़ों की बिक्री भी खूब हो रही है। तूलिका बताती हैं कि उनके कलेक्शन में फ्रंट फ्लिप, साइड फ्लिप, लांग कुर्ते, क्रॉप टॉप, कोटी, फुल लेंथ का गाऊन जो अनारकली जैसा दिखता है, आदि हैं। शादी का मौसम होने की वजह से वे आजकल दस से पंद्रह जोड़े रोज बेच देती हैं। उत्तर प्रदेश में कपड़े सिलने का काम करने वाली रेखा कहती हैं कि मेरे पास कपड़े सिलवाने के लिए जो नई लड़कियां आती हैं, वे कहती हैं कि टीवी में आने वाले ससुराल सिमर का, नाटक में सिमर की बेटी ने जो मुगलों के स्टाइल वाला फ्रॉक पहना था, वैसा बना दो, और मुझे वैसा बनाना पड़ता है। क्योंकि आजकल मुगलई कपड़ों का ट्रेंड है। और अभी मेरे पास पांच जोड़ों का आॅर्डर है, जिनका मुझे शरारा सूट बनाना है।

‘हर साल फैशन बदलता रहता है। और जो ट्रेंड है मैं उसी के हिसाब से कपड़े सिलता हूं। मुझे पंद्रह साल हो गए सिलाई का काम करते हुए। लेकिन इन पंद्रह सालों में पिछले दो सालों से मुगलों के राजा-महाराजा जैसी पोशाकें लोग बहुत सिलवा रहे हैं।’ यह कहना है विजेंदर कुमार का। विजेंदर बदायूं में वी आर बुटीक नाम से अपनी शॉप चलाते हैं। वे बताते हैं कि पिछले साल महिलाएं लंबे सूट ज्यादा सिलवा रही थीं। और इस साल प्लाजो सूट। यह सभी डिजाइन मुगल काल के राजा-रानियों के कपड़ों से बहुत मेल खाते हैं। और ऐसी ड्रेसों के मैं रोज पांच से दस जोड़े डिजाइन करता हूं।गांधीनगर में थोक विक्रेता सोनू शर्मा का कहना है कि हम मुगलिया पोशाकों में शेरवानी, जूती और पगड़ी, पटका समेत पूरा सैट तैयार करते हैं। और शादी सीजन में ये जोड़े ठीक-ठाक बिक जाते हैं।
दुकानदार, बुटीक, फैशन डिजाइन, टेलर या ग्राहक कोई भी हो, सभी पर मुगलिया पोशाकों का रंग बिखरा हुआ है। इसके अलावा कई सोशल साइट्स हैं, जो इस तरह के कपड़ों को बेचती हैं। इन सभी को देखते हुए लगता है कि पुराना जमाना वापस आ रहा है। ०

 

 

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