ताज़ा खबर
 

साहित्य- आलोचना की प्रासंगिकता पर सवाल

संस्कृत में ‘आलोचना’ शब्द नहीं है। आलोचना दरअसल हिंदी का शब्द है। संस्कृत में टीका, भाष्य, वृत्ति आदि की परंपरा रही है। आलोचना सिद्धांत से नहीं, अपने पर्यवेक्षण से पैदा होती है और यह पर्यवेक्षण की दृष्टि उसे साहित्य के भीतर से ही प्राप्त होती है।
Author July 2, 2017 00:30 am
प्रतीकात्मक चित्र

पंकज पराशर

पिछले कुछ वर्षों से कवि-लेखक हिंदी आलोचना की गुणवत्ता, उसकी प्रासंगिकता और आलोचकीय निष्पक्षता पर सवाल उठाते रहे हैं। चिंतन के क्षेत्र में कुछ भी अंतिम नहीं होता और एक बार जिस प्रसंग पर अतीत में गहन विचार-विमर्श हो चुका हो, उस मामले को साहित्यिक विमर्श के दायरे में फिर से खोला जा सकता है। हमारे यहां ‘शास्त्र सुचिंतित पुनि-पुनि देखिय’ आखिर यों ही नहीं कहा गया। एक ही रचना को एक बार हम पढ़ते हैं, तो कुछ चीजें निश्चित रूप से छूट जाती हैं और बाद में जाकर यह ध्यान आता है कि हमसे ये चीजें छूट गर्इं। आलोचना की दुनिया विचारों की दुनिया है और विचार के लिए चाहे गुरु-शिष्य परंपरा हो या विद्वानों का समुदाय, उनके बीच बातचीत और बहस जरूरी है।  संस्कृत काव्यशास्त्र में भामह ने काव्य की जो परिभाषा दी, हजार वर्षों के लंबे अंतराल के बाद पंडितराज जगन्नाथ ने फिर से उसी प्रश्न पर विचार किया। यानी भामह और पंडितराज जगन्नाथ के बीच एक हजार वर्ष के लंबे अंतराल में संस्कृत के आचार्यों के बीच इस मुद्दे पर लगातार बहस होती रही। अभिनवगुप्त ने कहा है कि कविता ही नहीं, शास्त्र को भी बार-बार देखने की जरूरत होती है। संस्कृत में ‘आलोचना’ शब्द नहीं है। आलोचना दरअसल हिंदी का शब्द है। संस्कृत में टीका, भाष्य, वृत्ति आदि की परंपरा रही है। आलोचना सिद्धांत से नहीं, अपने पर्यवेक्षण से पैदा होती है और यह पर्यवेक्षण की दृष्टि उसे साहित्य के भीतर से ही प्राप्त होती है। हर पीढ़ी एक ही कविता का अर्थ करते हुए कुछ नया जोड़ती है, कुछ पुराने अर्थों से असहमति जताती है और अनेक बार अपने से पहले की व्याख्या और मूल्यांकन को खारिज ही कर देती है।

आलोचना का कार्य अतीत की रक्षा के साथ-साथ यह भी है कि वह समकालीनता में हो, समकालीन रचनाओं को जांचे-परखे और मूल्य निर्णय दे। अक्सर यह सुनाई पड़ता है कि गुणवत्ता के मामले में कौन-सी रचना किस स्तर की है, इसका निर्णय समय करेगा। गौरतलब है कि जब सारा निर्णय समय को ही करना है, तो फिर आप क्या कर रहे हैं? कोई रचनाकार यह नहीं कहता कि समय रचना करेगा। आज साहित्य, समाज, संस्कृति एक-दूसरे में घुल-मिल कर इतने संश्लिष्ट हो गए हैं कि एक साहित्यिक कृति की आलोचना लगभग एक समूची संस्कृति और समूची राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था की चुनौती बन जाती है। क्योंकि सत्ता केवल कुछ राजनीतिक विचारधाराओं के रूप में ही अपने आप को व्यक्त नहीं कर रही है, बल्कि वह अनेक सांस्कृतिक-मूल्यों, जीवन-मूल्यों और नैतिक मूल्यों के द्वारा साहित्य और आलोचनात्मक कर्म को प्रभावित कर रही है। इसलिए प्रो. मैनेजर पांडेय कहते हैं कि जो सुविधा के आदी होते हैं, वही दुविधा की भाषा बोलते हैं। आलोचक की दुविधा और तत्काल सहमति बन जाने की संस्कृति के कारण ही बहुधा रचना से सम्यक और संतोषजनक जिरह नहीं होती है।

रचनाकारों को अक्सर यह शिकायत रहती है कि आलोचना के नाम पर पिछले कुछ वर्षों में जैसी व्याख्याएं और मूल्यांकन सामने आया है, जिस तरह के शोध-प्रबंधों को प्रकाशित करा कर लोग साहिबे-किताब बन रहे हैं, उसमें पर्यवेक्षण की दृष्टि का घोर अभाव है, रचना से जूझने का धैर्य नहीं है, सच्चे सहृदय की तरह रचना की एक-एक पंखुड़ियों को खोलने की क्षमता भी नहीं है। इस संकट के दूसरे पहलू को देखें तो देश के लोकतंत्र में जहां स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व में कमी आई है, वहीं आलोचना में एक बड़ा संकट यह दिख रहा है कि देखने का धैर्य ही आलोचना के पास नहीं रह गया है। आलोचना का काम साहित्यिक प्रवृत्तियों की व्याख्या करना भर नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक कर्म की व्याख्या करना भी है। क्योंकि आज सत्ता सांस्कृतिक कार्यों द्वारा ही साहित्य को प्रभावित कर रही है। पिछले वर्षों में बहुत अच्छी कविताएं लिखी गई हैं, बहुत अच्छे उपन्यास आए हैं, लेकिन किसी एक रचना पर टिक कर विचार करने की परंपरा खत्म होती जा रही है। तरह-तरह के ‘विमर्श’ के दायरे में अनेक रचनाओं को लेकर सर्वसमेटू आलोचना की प्रवृत्ति बढ़ गई है। चूंकि आलोचना केवल विश्लेषण और व्याख्या नहीं करती, मूल्यांकन भी करती है, इसलिए वह निर्णयवादी तरीके से अच्छी रचना को अच्छी और स्तरहीन रचना को बेझिझक स्तरहीन कहने से गुरेज नहीं करती। इस प्रक्रिया में कई बार वह इतनी कटु हो जाती है कि ‘गुडी गुडी’ आलोचना के माहौल में उस आलोचक की पक्षधरता और वैचारिकता को लेकर प्रवाद फैल जाता है।

लोकतंत्र में हर चीज को अच्छा-अच्छा कहना जरूरी नहीं है, इसके विपरीत खुला हुआ विवाद आलोचना में जब-जब हुआ है, वह बहुत रोचक और निर्णायक सिद्ध हुआ है। निराला ने छायावादी दौर में अपने मित्र सुमित्रानंदन पंत की कृति ‘पल्लव’ की कड़ी आलोचना की और पंतजी ने उसे स्वीकार भी किया। पंडितराज जगन्नाथ ने मम्मट की बहुत मारक और कटु आलोचना की है। रामविलास शर्मा ने गैर-मार्क्सवादी लोगों के विरुद्ध उतना कटु नहीं लिखा है, जितना कि मार्क्सवादियों के विरुद्ध। आजकल के माहौल में कटु आलोचना की परंपरा सिकुड़ रही है और इस बीच बौद्धिक उग्रता, वैचारिक तीव्रता और साहित्यिक निष्ठा के अभाव के कारण भी आलोचना की प्रासंगिकता को लेकर आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं।
आलोचना की प्रासंगिकता को लेकर बहस में जब यह बात सामने आती है कि समकालीन आलोचना के पास सर्जनात्मक भाषा नहीं है, तो यह काफी हद तक सही लगती है। कवि और कथाकार पुरानी भाषा को तोड़ कर एक नई भाषा रच रहे हैं, समकालीन समाज की विद्रूपताओं को पकड़ने के लिए नई शैली, नई कहन, नई गढ़न को संभव करते हुए रचना कर रहे हैं। जब तक किसी विधा में पुरानी भाषा को तोड़ कर नई भाषा नहीं गढ़ी जाती है, तब तक नया सृजन संभव नहीं हो पाता। आज भी हमारी आलोचना प्रत्ययों, अवधारणाओं और भाषा की पारंपरिकता से इस कदर जकड़ी हुई है कि वह नई बन ही नहीं पा रही है। ऐसी आलोचना की समकालीन रचनात्मकता की ताप, उसकी चिंताएं और रचना-समय की लंबी आह को सुनने-समझने से कोई लेना-देना नहीं होता। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अंतत: आलोचना भी एक रचना है। आलोचना भी एक रचनात्मक कर्म है, जो किसी भी लिहाज से दोयम दर्जे का काम नहीं है। अगर आप में सर्जनात्मकता नहीं है, तो आप सिद्धांत-निर्माण, भाषा-टीका चाहे जितना कर लें, अकादमिक अहंकार में तालीबजाऊ जुमलेबाजी चाहे जितनी कर लें, आलोचना नहीं कर सकते। आलोचना शास्त्र नहीं है, बल्कि उसमें निहित है। शास्त्र की सीमाएं वहां प्रकट होती हैं, जहां से आलोचना शुरू होती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार जिस तरह ‘सभ्यता के विकास के साथ-साथ कवि-कर्म कठिन होता चला जाता है’, उसी तरह यह बात कहने में कोई हिचक नहीं है कि आलोचना-कर्म और भी कठिन होता चला जाता है। मुक्तिबोध कहते थे कि रचना का कहां छद्म होता है, यह पहचानना आज की सबसे बड़ी समस्या है। इसलिए आलोचना-कर्म कठिन होता जा रहा है।

आलोचक की दृष्टि अपने समय के साहित्य से टकरा कर बनती है और यही उसकी सर्जनात्मकता है। आज की आलोचना के लिए सबसे बड़ी चुनौती आज की कहानियां, उपन्यास और कविताएं हैं, लेकिन यह सबसे बड़ी विडंबना है कि पिछले अनेक वर्षों से जैसी आलोचना हो रही हैं, उनमें से अधिकतर गुणवत्ता और प्रासंगिकता की कसौटी पर कहीं नहीं ठहरती हैं। आलोचना की मुख्य चुनौती समकालीन रचनाएं ही होती हैं और जो आलोचक समकालीन रचनाओं से नहीं जूझ सकता, वह सिद्धांत और टीका चाहे जितना निर्मित कर ले, प्रासंगिकता के धरातल पर पिछड़ जाता है। सर्जनात्मक दृष्टि और परिश्रम के अभाव में जिस तरह अधिकतर अकादमिक संस्थानों में पाठ्यक्रमों और शोधों में नवता और सृजनात्मकता को हतोत्साहित किया जाता है, उससे आलोचना के अच्छे प्रयास भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के उल्लेख के नाम पर अकारण कही-सुनी जा चुकी घिसी-पिटी बातों को ही कहने को मजबूर होते हैं। जबकि इसके औचित्य और इस संरचना को लेकर सोचने की चिंता कहीं दृष्टिगोचर नहीं होती। तमाम विमर्श, विश्लेषण के बावजूद अगर आलोचना-कर्म यथास्थिति का समर्थन करता है, सत्ता के सांस्कृतिक सर्वग्राही विकास के खतरों के प्रति आगाह नहीं करता, तो वह आलोचना अपने धर्म से च्युत होती है। ०

 

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग