March 28, 2017

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ललित प्रसंग: बौखलाने का समाजशास्त्र

सीधी सरल यह खाट भी बेचारी मुहावरे से बाहर आकर राजनीतिक उद्यमिता का दर्जा प्राप्त कर चुकी है।  गंगेश गुंजन का लेख।

Author October 8, 2016 23:33 pm
पुरस्कृतजी से अपुरस्कृत यानी पुरस्कार वंचितजी से खार खाए बैठे हैं। आलोचक पर समीक्षक महोदय बौखलाए हुए हैं।

 गंगेश गुंजन

कोई-कोई शब्द भी जीवन में ऋतु की तरह आता है। इधर बौखलाना शब्द बयार की तरह आया हुआ है। ऋतुरंगी! बौखलाना शब्द उचारना-सुनना-पढ़ना आजकल बहुत प्रिय लगता है। इसकी लोकप्रियता भी काफी बढ़ी है। मीडिया और अखबारी दुनिया में तो अब यह एक लफ्ज भर नहीं है, पूरा विचार हो गया है या कहें कि अभिमत बन चुका है। मसलन, पाकिस्तान बौखलाया हुआ है कि अमेरिका से भारत का सैन्य समझौता हो गया। यानी अब इस पर चीन भी जरूर बौखलाएगा, क्योंकि वह मानता है कि अमेरिका और जापान दोनों की मिलीभगत से भारत की मार्फत वे चीन को घेरेंगे। खैर, तो भले यह भारत आधारित वैदेशिक कूटनीतिक बौखलाहट का अपना-सा उदाहरण हो, पर देश पर खुद अपना भी देश तो बौखलाया हुआ है। पड़ोसी पर पड़ोसी का बौखलाए रहना तो खैर नागर सभ्यता की कॉलोनियों का पुराना महात्म्य है।

अपना खांटी देसी आलम भी आजकल विकासवादी बाजारों-नारों में उछाल खाते हुए बौखलाहट में खासा ऊर्जावान प्रतीत हो रहा है। जैसे एक राजनीतिक दल को अपने पक्ष में बढ़ते हुए मतदाता प्रतिशत से प्रचंड खुशी होती है, वहीं जिसका वोट आधार सिकुड़ता हुआ यानी कि छिनता हुआ दिखाई पड़ता है वह बेचारा बौखलाए नहीं तो क्या करे? सो, बौखलाहट में वह सर्वे कर्ता एजेंसी को ही झुट्ठा, कमीशनखोर, दलाल आदि कहे जा रहा है। लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मुझे बहरहाल, इस रफ्तार में बौखलाहट के बढ़ते हुए दायरे से काफी उम्मीदें हैं और भरोसा है कि ‘बौखलाहट पसंदों’ के लिए अभी और अच्छे दिन आने वाले हैं। जबकि अच्छे दिन लाने वाले प्रतिज्ञा धारक इस बात से बौखलाए हुए हैं कि विरोधी पार्टियां अच्छे दिन आने के लिए इस कदर उतावली क्यों हो गई हैं? इस तरह उत्पात मचाने पर क्यों तुल गई हैं? अब घर के संदूक में रखे हुए तो हैं नहीं कि निकाल कर विपक्ष के संदूक में धर दें। सारा विपक्ष हमारी खाट खड़ी करने पर तुला है।

खाट से ध्यान आया। सीधी सरल यह खाट भी बेचारी मुहावरे से बाहर आकर राजनीतिक उद्यमिता का दर्जा प्राप्त कर चुकी है। खाट सभा! परम मौलिक बुद्धि वाले समानांतर राजनीति पंडितों ने तो खाट को अपनी उच्च संवेदनशीलता और कल्पना प्रतिभा का ऐतिहासिक और नायाब नमूना बना डाला है। पूरा सड़क दर्शन बना दिया है कि आज यह नई राजनीतिक युक्ति का महान नमूना है। ऐसा प्रदर्शन करके बहुत कुछ संदेश दे दिया है। ताकत दिखाऊ सड़क दर्शन! खटिया को लेकर एक अलग ही मुहावरे का उद्भव हुआ है।  जा! मैं तो अच्छे दिन के बेचैन आंदोलन वालों की बौखलाहट का जिक्र कर रहा था। वैसे बौखलाहट उनकी भी जायज है। सभी पक्ष की जहां तक बात है वहां प्रमुख विपक्षी का कहना है कि सरकार बेवजह बनावटी कारणों से समय काट रही है। जनता को धोखा दे रही है। तो जाहिर है अब जनता इस बात से बौखलाई हुई है कि उसे सरकार धोखा दे रही है। विपक्ष भी धोखा दे रहा है। बाकी दुनिया की भाग-दौड़ वाली राजनीति धोखा दे रही है। पाकिस्तान धोखा दे रहा है या अमेरिका धोखा दे रहा है, जनता इससे बौखलाई हुई है। अपनी इस बौखलाहट में उसे कुछ सूझ नहीं रहा है। कुछ विवेकधारी लोग इसलिए बौखला रहे हैं कि वे क्यों बौखलाए हुए हैं? आखिर किस जगह उसकी बौखलाहट कम हो, इसकी फिलहाल कोई सूरत नजर नहीं आती। कोई बौखलाया हुआ है कि उसे गलत ढंग से फंसाया जा रहा है, तो दूसरा इसलिए बौखला रहा है कि वह तो अपना काम कर रहा है। नियम का काम कर रहा है। जनता का काम कर रहा है। सरकार का काम कर रहा है। तो वह गलत कैसे कर रहा है? यह तो राजनीति की बात हुई।

परिवार में कुछ-न-कुछ बौखलाहट का माहौल तो यों ही सदाबहार है। हम आप सभी जानते हैं। परिवार में बौखलाहट न रहे, मामूली बात पर पति पत्नी पर बौखलाया न करे तो पति की महत्ता क्या? ठीक उसी वजन में इस स्त्री सशक्तीकरण के महान युग की बेचारी पत्नी भी, बौखलाए नहीं तो और क्या करे? पत्नी तो बहरहाल, बौखलाने के और भी कारणों से लोकतांत्रिक अधिकार रखती है। क्योंकि आप देखिए- कितनी महंगाई बढ़ गई है? दाम आसमान चढ़ गया है। रोजमर्रा की दाल नहीं गल रही है, न सब्जी सिद्ध हो रही है। कुल मिलाकर अब यह सब एक सार्वजनिक बौखलाहट पैदा कर रहे हैं। जनता को मामूली उपयोग की चीज ही इतना ज्यादा दाम देकर लेना पड़ता है कि बाजार में हर बार ही उसे मुक्केबाज तजुर्बे से गुजरना पड़ता है। सामान लेते हुए दुकानदार पर झल्लाता है। अभी कल शाम भाव इतना था और आज सुबह-सुबह दाम इतना चढ़ गया! दुकानदार चिढ़ता है ग्राहक पर। ‘हम क्या घर में सामान बनाते हैं भाई साहब? दाल क्या अपने घर में उपजाते हैं? बाजार जो देता है, हम तो वहां से लाते हैं। हम भी खरीद कर लाते हैं। हम कहां से करें?’
अब दुकानदार की यह बौखलाहट जायज है। लेकिन छोड़िए ये तो सारी बातें हुर्इं।

तमाम राजनीतिक और आर्थिक दुनिया के अलावा हमारी साहित्य की जो दुनिया है, वह भी कुछ कम बौखलाई हुई नहीं लग रही है। लेखकजी लेखक से बौखलाए हुए हैं। पुरस्कृतजी से अपुरस्कृत यानी पुरस्कार वंचितजी से खार खाए बैठे हैं। आलोचक पर समीक्षक महोदय बौखलाए हुए हैं। पत्रिकाओं से पत्रिकाएं बौखलाई लग रही हैं। यानी संपादक से संपादक बौखलाए हुए हैं। और तो और, प्रकाशक से प्रकाशक और इनके पाठक वर्ग से उनका पाठक वर्ग बौखलाया हुआ है। इधर सुना है महानगर के दो-तीन दिग्गजों में इसी बौखलाहट में घमासान मचा हुआ है। मुद्दा यह है कि एक आलोचक ने दूसरे आलोचक की आलोचना पर भूल से कुछ खरी टिप्पणी कर दी, जो कि संबद्ध विद्वान ने अपनी शान में प्रतिकूल टिप्पणी मानी। अब टिप्पणी इतनी खतरनाक हो गई कि वे नखशिख बौखलाए हुए हैं। मैं तो आशावादी जीव हूं, सो मुझे तो इस उर्वर साहित्यिक बौखलाहट की परिस्थिति में कोई महान विकल्प ही जन्मता हुआ परिलक्षित हो रहा है। इस बौखलाहट-मंथन से साहित्यिक राजनीतिक दल के प्रादुर्भाव की संभावना साफ दिखाई पड़ती है। तो स्वागत योग्य है। वैसे बौखलाहट शब्द के सौंदर्यशास्त्रीय विवेचन क्या हो सकते हैं उनके अर्थ लोगों के बारे में क्या आकलन हो सकता है, भाषा साहित्य शास्त्री जानें। मगर मुझे बौखलाहट का भविष्य बड़ा उज्ज्वल और उर्जावान दिख रहा है।

बौखलाहट वैसे बहुत निरामिष शब्द है, सो किसी के लिए कोई बौखला जाए, मानहानि का मुकदमा दायर नहीं हो सकता। निहायत लोकतांत्रिक और विशुद्ध भारतीय संस्कार का गर्वीला शब्द है। देखना चाहिए। और अब तो यों भी यह शब्द सिर्फ राजनीति का प्रिय शब्द नहीं रह गया है, बल्कि हरके क्षेत्र में लोकप्रिय हो रहा है। क्योंकि संगठन संगठन पर बौखला रहा है और व्यवसाय पर व्यवसाय की बौखलाहट जारी है। बौखलाना सर्वथा नकारात्मक शब्द भी नहीं है। चाहें तो मनोविज्ञान के पंडित से भी पूछ सकते हैं। यह सच मेरे पुलिस प्रकृति के एक परम मित्र ने समझाया कि कई बार बड़ा से बड़ा और मंजा हुआ अपराधी भी गहन पूछताछ से बौखला कर सच उगल देता है। अब यह सिद्धांत सचमुच है भी या नहीं, मैंने पता नहीं किया है। लेकिन हां, जहां तक मेरे अपने सौंदर्यबोध का सवाल है, मुझे पाकिस्तान और चीन की बौखलाहट वाली युगल छवि बहुत पसंद है। यद्यपि ये दोनों अलग-अलग बौखलाएं, तो भी खूब फबते हैं! ०

 

 

 

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First Published on October 8, 2016 11:33 pm

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