January 19, 2017

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सूने पड़े अखाड़े

मथुरा के अखाड़े और पहलवान एक जमाने में दूर-दूर तक काफी मशहूर थे। लेकिन धीरे-धीरे कुश्तीबाजी की परंपरा कमजोर होती चली गई। कई पारंपरिक खेल आज खत्म होने की कगार पर हैं। ऐसे दौर में अखाड़ों और पहलवानी की पृष्ठभूमि में झांक रहे हैं पवन गौतम।

Author October 2, 2016 03:07 am
भगवत अखाड़ा, लक्ष्मण अखाड़ा, गिरधरवाला अखाड़ा, भूतेश्वर अखाड़ा, खेरावाला अखाड़ा आदि अपने जमाने के प्रसिद्ध अखाड़े थे।

किसी जमाने में दूर-दूर तक ख्यात रहे मथुरा के अखाड़े आज वीरान पड़े हैं। एक वक्त था, जब डेढ़ सौ से ज्यादा छोटे-बड़े अखाड़ों में मल्ल-शिक्षा सिखाई जाती थी। आज कई अखाड़े स्थानीय प्रभावशाली लोगों की निजी जागीर बन गए हैं और बाकी बचे -खुचे अखाड़ों को अंगुलियों पर आसानी से गिना जा सकता है। बुजुर्ग बताते हैं कि जब हाथी की चाल से झूमते मथुरा के पहलवान अपने घरों से अखाड़ों की ओर कूच करते थे तो राहगीर उन्हें हसरतभरी नजरों से निहारते और उन पर गर्व करते थे। लोग उन कद्दावर शरीर वाले पहलवानों को देखकर प्रसन्न होते थे। मल्लविद्या के मामले में मथुरा का कोई सानी नहीं रहा। अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के कई शहरों-अमृतसर, लाहौर, लुधियाना, जालंधर, पटियाला आदि में बसे पहलवानों से मथुरा के चौबे पहलवान ही टक्कर लेते थे। यों तो पौराणिक कथाओं में कंस के प्रसिद्ध मल्ल चाणूर और मुष्टिक का जिक्र मिलता है, जिसकी कुश्ती श्रीकृष्ण से हुई थी। लेकिन मथुरा के अखाड़ों और पहलवानों की प्रामाणिक जानकारी अकबर के काल से मिलनी शुरू होती है।

मथुरा के किशोरी रमण डिग्री कॉलेज के गेट पर पचास फुट ऊंचे टीले पर बना अकबरकालीन चौकी अखाड़ा आज भी सुरक्षित है। अकबर के शासन में अलदत्त और कुलदत्त नाम के दो पहलवान भाई चौकी अखाड़े पर कुश्ती लड़ते थे और ताल ठोंकने में माहिर माने जाते थे। दोनों चौबे पहलवानों की ताल ठोंकने की बात एक जनश्रुति के रूप में इस प्रकार सुनने में आती है कि शाम खत्म होने पर जोर-आजमाइश समाप्त होती थी। फिर दोनों पहलवान अखाड़े पर खड़े होकर ताल ठोंकते थे। आधा किलोमीटर दूर चौबिया पाड़े के घर पर अपने बेटों की बाट जोहती पहलवानों की मां उस आवाज को सुन लेती थी और अपने पहलवान बेटों के भोजन की व्यवस्था में जुट जाती थी। दसवींं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में खुनखुन और पाई नामक दो चौबे भाइयों का जिक्र आज भी मथुरा के बुजुर्ग पहलवानों की जुबान पर है। खुनखुन और पाई भरतपुर रियासत के पहलवान थे। उस वक्त का एक रोचक किस्सा आज भी मशहूर है। हुआ कुछ ऐसे कि अंग्रेजों ने ऐतिहासिक चौकी अखाड़े को नष्ट कर सड़क बनाने का काम शुरू किया।

मथुरा के पहलवान इसे सहन न कर सके। खुनखुन और पाई भरतपुर से रात को भागकर मथुरा आते और अंग्रेजी सड़क को काटकर रात ही रात में तीस किलोमीटर दूर भरतपुर भाग जाते। सुबह अंग्रेजी प्रशासन सड़क को ठीक करा देता। यह क्रम कई दिन तक चला। हारकर अंग्रेजों को चौकी अखाड़े को सुरक्षित रखने का निर्णय लेना ही पड़ा। आज भी सड़क चौकी अखाड़े को छूती हुई दिखलाई पड़ती है। बड़ौदा-नरेश गायकवाड़ खांडेराव को पहलवानी करने और नामी-गिरामी पहलवानों को अपने यहां रखने का शौक था। 1865 में उनके पास कई हजार पहलवान थे। इनमें पंजाब के पहलवानों के मुकाबले मथुरा के चौबे पहलवानों की संख्या सबसे ज्यादा थी। हौआ गुरु, उद्धव गुरु, भंगा गुरु, हीरा चौबे, दाऊ चौबे, नत्थू, श्रीगुरु, पीनूजी आदि पहलवान महाराज को कुश्ती के दांवपेंच सिखलाते थे और पंजाब के पहलवानों से जोर आजमाइश में सारा जीवन निकाल देते थे। मथुरा के मल्लविद्या-विशेषज्ञ जीवन लाल चतुर्वेदी का कहना है कि बुजुर्ग पहलवानों से उन्होंने सुना था कि महाराजा लंगोट पहनकर अखाड़े में उतरते थे तो मिट्टी के ऊपर गुलाल की मोटी परत बिछाई जाती थी।

इसी युग में चूं-चूं चौबे पहलवानी की दुनिया में एक धमाके के समान उभरे थे। 1886 में कानपुर के प्रसिद्ध पहलवान मिसिर को पछाड़कर उन्होंने काफी ख्याति अर्जित की। बिहार प्रांत में सुरजा नट और चूं-चूं की कुश्ती भी काफी चर्चा का विषय रही थी। यह कुश्ती छह घंटे चली थी और बराबर पर छूटी थी। दंगी चौबे, मठो चौबे, देविया, मोरखी, चौहरी, भौंदू, महादेव आदि पहलवान उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में मथुरा और दूसरे नगरों के अखाड़ों में ताल ठोंका करते थे। देविया चौबे के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने दरभंगा राज्य में शेर से कुश्ती लड़ी थी और बुरी तरह घायल हुए थे। महादेवा पहलवान नेत्रहीन थे, मगर वह अखाड़े में सामने खड़े पहलवान से हाथ मिलाते थे और फिर उन्हें कुश्ती जीतने में देर नहीं लगती थी।

भगवत अखाड़ा, लक्ष्मण अखाड़ा, गिरधरवाला अखाड़ा, भूतेश्वर अखाड़ा, खेरावाला अखाड़ा आदि अपने जमाने के प्रसिद्ध अखाड़े थे। जमीन की कीमतें बढ़ने से अधिकांश अखाड़ों पर आधुनिक हथियारबंद पहलवानों ने कब्जा कर लिया है। बहुत से अखाड़े कोर्ट-कचहरी में स्वामित्व के प्रश्न को लेकर विवाद बन गए हैं। दूध, घी और बादाम की अखनी मथुरा के पहलवानों का प्रिय भोजन था। अखनी का मतलब था- कढ़ाई में पांच सेर दूध में एक सेर घी और सेरभर बादाम डाल दिए जाएं और जब सारी सामग्री ओटते-ओटते तीन सेर रह जाए तब उसका इच्छानुसार सेवन किया जाए। आर्थिक दबावों ने लोगों की कमर तोड़ दी। दो वक्त की रोटी के लाले पड़ गए। अखनी को चखना तो दूर उसकी कल्पना करना भी मुश्किल हो गया है। धीरे-धीरे कुश्ती की वह परंपरा क्षीण होती चली गई और आज लगभग मृतप्राय है।अभी कुछ हफ्ते पहले साक्षी मलिक द्वारा ओलंपिक खेलों में कांस्य पदक जीतने से कुश्ती पर चर्चा को जोर मिला है। सलमान खान की फिल्म ‘सुल्तान’ और आमिर खान की आने वाली फिल्म ‘दंगल’ से भी कुश्ती के प्रति रुझान और इसका प्रचार-प्रसार थोड़ा बढ़ा है। केंद्र और राज्य सरकारों ने इस खेल और उससे भी ज्यादा इस परंपरा को और पोषित करने की दिशा में कुछ कदम बढ़ाए हैं। लेकिन अभी और ज्यादा प्रयास करने की जरूरत है ताकि सूने पड़ते जा रहे अखाड़े फिर से आबाद हो सकें। १

 

 

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First Published on October 2, 2016 3:03 am

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