April 23, 2017

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टिप्पणी: युद्धोन्माद के निहितार्थ

जॉर्ज आॅरवेल ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘नाइंटीन एटी फोर’ में भविष्यवाणी की थी कि आने वाले समय में दुनिया के देशों के बीच युद्ध नहीं होंगे, बल्कि युद्ध जैसे हालात बने रहेंगे।

Author नई दिल्ली | November 6, 2016 00:50 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

जॉर्ज आॅरवेल ने 1949 में प्रकाशित अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘नाइंटीन एटी फोर’ में भविष्यवाणी की थी कि आने वाले समय में दुनिया के देशों के बीच युद्ध नहीं होंगे, बल्कि युद्ध जैसे हालात बने रहेंगे। इसी उपन्यास में लेखक ने कहा है कि अगर युद्ध या युद्ध जैसे हालात न हों तो दुनिया में हर व्यक्ति के पास गाड़ी, बंगला जैसी सभी सुविधाएं होंगी और गरीब तथा अमीर के बीच का भेद मिट जाएगा।

जॉर्ज आॅरवेल का मानना था कि संसार के मनुष्य अपने परिश्रम के बल से इतना पैसा कमा लेते हैं कि कोई भी मनुष्य गरीब नहीं रह सकता। लेकिन संसार के चंद ताकतवर लोग गरीब अमीर के भेद को बनाए रखना चाहते हैं और इसके लिए वे मानव श्रम से उत्पन्न धन दौलत को हथियार, जंगी जहाज और युद्ध से संबंधित विनाशकारी चीजों पर खर्च करते हैं।हालांकि, ये सब बातें लेखक की कल्पना या निजी विचार हैं लेकिन आज दुनिया में गरीब और अमीर की बढ़ती खाई और साथ ही साथ बढ़ता युद्धोन्माद जॉर्ज आॅरवेल की बातों को सच साबित करता प्रतीत होता है। युद्धोन्माद या तनाव जैसे हालात पैदा करने में किसी की साजिश होती है या नहीं, कहा नहीं जा सकता। लेकिन इससे चंद ताकतवर लोगों को भारी फायदा होता है, यह तय है। सीधा-सीधा फायदा उन देशों या कंपनियों को होता है, जो हथियार बेचते हैं। अप्रत्यक्ष रूप से उस राजनीति को भी भारी फायदा होता है जो भावुकता का फायदा उठाकर शिक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाओं की बुरी हालत की जिम्मदारी से पल्ला झाड़ लेती है।

आज हमारे देश में सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर जिस तरह कई राजनीतिक दल एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं, उससे इतना तो इशारा मिलता ही है कि राजनीति को इस मुद्दे में भारी संभावनाएं नजर आ रही हैं। अगर आज अधिकांश न्यूज चैनल युद्ध के तनाव से ग्रस्त नजर आ रहे हैं, तो इसका कारण यह है कि उनके लिए भी यह फायदा ही पहुंचाता प्रतीत होता है। अगर इन चैनलों को आम जनता से जुड़ी खबरें दिखानी हों तो जमीन पर जाना होगा, जबकि युद्धोन्माद की रिपोर्टिंग तुलनात्मक रूप से बेहद आसान है। दर्शकों को दिखाने के लिए े अधिकांश सामग्री इंटरनेट से ही मिल जाती है और मुद्दा भावुक होने की वजह से दर्शक भी भारी संख्या में मिल जाते हैं। न्यूज चैनल इस युद्धोन्माद और आम जनता से इस कदर जुड़े हैं कि किसी को यह समझ नहीं आ रहा है कि ये चैनल युद्धोन्माद को दिखा रहे हैं या भड़का रहे हैं।

इस उन्माद को रोकने के लिए लोगों को यह विश्वास दिलाना जरूरी है कि युद्ध में सही मायनों में किसी भी पक्ष की जीत नहीं होती है और इसके नुकसान दोनों ही पक्षों के लिए बहुत ही घातक होते हैं। अगर एक बार युद्ध शुरू हो जाए तो हालात किस दिशा में और किस हद तक बढ़ जाएंगे, इसकी भविष्यवाणी कोई नहीं कर सकता। अक्सर युद्धोन्माद के दौर में करीब करीब हर देश का मीडिया अर्द्धसत्य पर आधारित रिपोर्टिंग करता है, जिससे आम लोगों को लगता है कि उनका देश पूरी तरह निर्दोष और पीड़ित है, जबकि विरोधी देश दोषी है और खलनायक है। यही सोच जनता को सरकार पर युद्ध के द्वारा विरोधी देश को सबक सिखाने के लिए दबाव डालने को मजबूर करती है।  मीडिया ने समाज को शिक्षित और जागरूक बनाने में बहुत भारी योगदान दिया है। मीडिया को चाहिए कि जनता को युद्ध के दुष्परिणामों और इसकी निस्सारता के बारे में भी जागरूक करे। साथ ही साथ समाज को यह भी बताना जरूरी है कि उसका बड़ा दुश्मन फलां देश है या गरीबी, प्रदूषण, बीमारी जैसी समस्याएं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकलन के अनुसार साल 2012 में वायु प्रदूषण के कारण करीब सत्तर लाख लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी। लेकिन खेद है कि मानव जाति में वायु प्रदूषण के खिलाफ युद्ध छेड़ने का वैसा उत्साह नजर नहीं आता। इसी तरह हमारे देश में हर साल लाखों लोग सड़क दुर्घटनाओं में या तो जान गवां देते हैं या दिव्यांग हो जाते हैं, जबकि सड़कों के सही प्रबन्धन द्वारा इन दुर्घटनाओं की संख्या में भारी कमी लाना संभव है। लेकिन इस समस्या के खिलाफ भी समाज अपेक्षित रूप से उत्साहित नजर नहीं आता। गरीबी और कुपोषण की समस्या कितनी विकराल है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत में करीब 21.9 फीसद आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। मानव जाति को यह समझना होगा कि देशभक्ति बेहद जरूरी है, लेकिन उग्र राष्ट्रवाद लाभदायक नहीं है ।

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First Published on November 6, 2016 12:50 am

  1. T
    Tapas
    Nov 6, 2016 at 1:59 pm
    Great article.
    Reply

    सबरंग