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भंडारण की मुश्किलें

एक अध्ययन के अनुसार ब्रिटेन के कुल उत्पादन के बराबर भारत में अनाज बर्बाद हो रहा है।
Author November 13, 2016 00:16 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

एक तरफ देश में करोड़ों लोग भूख से मर रहे हैं, जबकि, दूसरी तरफ हर साल लाखों टन खाद्यान्न बर्बाद हो रहा है। सरकारी मशीनरी की घोर लापरवाही और भंडार गृहों के अभाव से देश का बेशकीमती अनाज बर्बाद हो रहा है। फसल तैयार होने के बाद करीब एक लाख करोड़ रुपये की कृषि उपज बर्बाद हो जाता है जोकि देश के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग एक फीसद है। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान खुले आसमान के नीचे पड़े अनाज की बर्बादी के आंकड़े रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। आजादी के सात दशक बाद भी देश में अनाज के भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं हो पाई है। भारतीय खाद्य निगम के मुख्यालय से मिली जानकारी के अनुसार पिछले चार वित्तीय वर्षों के दौरान 20 हजार 776 मीट्रिक टन अनाज, जिसमें गेहूं और चावल शामिल हैं, बर्बाद हो गया। सबसे अफसोस की बात यह है कि अनाज की यह बर्बादी लगातार हो रही है और इसे रोकने के लिए ठोस कार्ययोजना नहीं बन पा रही है।

एक अध्ययन के अनुसार ब्रिटेन के कुल उत्पादन के बराबर भारत में अनाज बर्बाद हो रहा है। यानी लगभग एक लाख करोड़ रुपए का खाद्यान्न हर साल बर्बाद हो जाता है। खाद्यान्न की जितनी बर्बादी इस देश में प्रतिवर्ष हो रही है उससे पूरे बिहार की आबादी को एक साल खिलाया जा सकता है। भारत सरकार के सेंट्रल इंस्टीट्यूट आॅफ पोस्ट हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के एक अध्ययन के मुताबिक उचित भंडारण की कमी ने देश में खाद्यान्न की बर्बादी को बढ़ाया है। खाद्य वस्तुओं की बर्बादी का सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था को भी नुकसान दे रहा है। इससे जहां एक तरफ महंगाई बढ़ रही है, वहीं किसानों को निवेश पर लाभ तो क्या, लागत भी वसूल नहीं हो पा रही है। देश के कई राज्यों में किसान घाटे की खेती के कारण आत्महत्या करने को बाध्य हो रहे हैं। महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात जैसे राज्यों से किसानों की आत्महत्या की खबरें आती रहती हैं। खाद्यान्न न मिलने के कारण भूख से मरने वालों की समाचार भी मिलते हैं। यही नहीं, भूख से पीड़ित भीड़ द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकानों की लूट की खबरें भी आ रही हैं।

उत्तर प्रदेश के बांदा जिले से एक खबर हाल ही में आई कि भूख से परेशान महिलाओं की एक भीड़ ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दुकानों को लूट दिया।
भारत में खाद्य पदार्थों की महंगाई बढ़ाने में मुख्य भूमिका फलों, सब्जियों और दालों की है। अध्ययन के मुताबिक सही भंडारण के अभाव में प्याज, सब्जियों और दालों की बर्बादी ज्यादा हो रही है। दस लाख टन प्याज और बाइस लाख टन टमाटर प्रति वर्ष खेत से बाजार पहुंचते-पहुंचते रास्ते में बर्बाद हो जाते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने आज तक उचित कदम नहीं उठाए। बर्बादी से बड़े बचाव का एकमात्र तरीका भंडारण की उचित व्यवस्था करना है। भंडारण की कई स्थानीय विधियां तो गांवों में हैं, लेकिन अब उनका भी इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। एक सौ बीस जिलों में अध्ययन के बाद पाया गया कि अनुचित प्रबंधन और जलरोधक भंडारण के अभाव में काफी खाद्यान्न खराब हो जाता है। अगर यही खाद्यान्न लोगों तक पहुंच जाए तो देश में निश्चित तौर पर भुखमरी कम होगी। इसलिए भंडारण में ज्यादा से ज्यादा निवेश की जरूरत है।

पिछले दिनों भंडारित उत्पादों पर आयोजित चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मलेन में खाद्य प्रसंस्करण सचिव ने कहा कि फसलों के तैयार होने के बाद खेतों के अलावा रखरखाव के सही तरीकों के अभाव में किसानों के घर, स्टोरेज और मंडी में उपज बर्बाद होती है। इस नुकसान को रोकने के लिए और अधिक अनुसंधान करने की जरूरत है। इससे ही खेत और किसानों के यहां होने वाले नुकसान को कम से कम किया जा सकता है। भारत अनाजों के अलावा दूध, फलों व सब्जियों, दलहन और तिलहन का बड़ा उत्पादक है, लेकिन इनके सुरक्षित भंडारण की आवश्यकता है। भारत दालों की भारी कमी से जूझ रहा है, इसलिए बुहलर ग्रेन तकनीकी का लाभ उठाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस बर्बादी को रोकने के लिए सरकार नई तकनीकों को बढ़ावा देगी। अब देखना यह है कि भंड़ारण के लिए सरकार की कोशिशें कितनी कामयाब हो पाती हैं क्योंकि अनाज के उचित भंडारण से देश में भुखमरी की समस्या से काफी हद तक निजात मिलेगी ।

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