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सेल्फी, सुंदरता और सादगी का सवाल

यहां एक महत्त्वपूर्ण बात यह उभरती है कि स्त्री ने कभी अपनी देह को अपनी नजर से न देख कर पुरुष की नजर से देखा है। पुरुष द्वारा गढ़े गए सौंदर्य के मानदंडों को अपनाते हुए वह सोलह शृंगार करती आई है। क्या सुंदर दिखना निजी मामला नहीं है?
Author August 13, 2017 01:23 am
सांकेतिक तस्वीर

ममता धवन    

पिछले दिनों फेसबुक पर ‘सेल्फी विदाउट मेकअप’ की मुहिम इस तरह चली कि हर फेसबुकिया, यहां तक कि पुरुष भी यह कह कर अपनी फोटो धड़ल्ले से पोस्ट करने लगे कि यह भी ‘सेल्फी विदाउट मेकअप’ है। यह अभियान पुरुष सोच को केंद्र में रख कर चलाया गया। स्त्रियों को लगता है कि पुरुष सौंदर्य का उपासक है और अगर पुरुष का विरोध करना है तो पहले उसकी मर्जी से दिखना बंद करो, यानी अपने को सजाना-संवारना बंद करो। जिन स्त्रियों ने इस मुहिम के तहत अपनी ‘नैसर्गिक तस्वीर’ हैशटैग के साथ पोस्ट की, उन्होंने साबित किया कि वे अब तक दूसरों को दिखाने के लिए या पुरुषसत्ता के वर्चस्व और उसकी मांग के अनुसार ही खुद को सुंदर बनाती चली आ रही हैं। वास्तव में उनकी अपनी ऐसी कोई इच्छा नहीं रही।

यहां एक महत्त्वपूर्ण बात यह उभरती है कि स्त्री ने कभी अपनी देह को अपनी नजर से न देख कर पुरुष की नजर से देखा है। पुरुष द्वारा गढ़े गए सौंदर्य के मानदंडों को अपनाते हुए वह सोलह शृंगार करती आई है। क्या सुंदर दिखना निजी मामला नहीं है? हम क्यों यह बात मान नहीं लेते कि आज की स्त्री अपने लिए मेकअप या टचअप करती है। उसे इसके लिए किसी सहारे या नाम की जरूरत नहीं। उसने अपना एक भरा-पूरा संसार बनाया है, जहां वह किसी की मोहताज नहीं। उसने अपने लिए खुश होना सीख लिया है। सुंदर दिखने के लिए मेकअप करना स्त्री की मजबूरी नहीं होनी चाहिए। न ही ऐसा कोई सामाजिक दबाव होना चाहिए, जहां स्त्रियों के अस्तित्व को उनकी सुंदरता से ही पहचाना जाए और तथाकथित असुंदर (जो कि हमारे यहां केवल त्वचा के रंग से निर्धारित कर लिया जाता है) को खारिज कर दिया जाए। व्यक्ति के चारित्रिक गुण और उसकी योग्यता ही उसकी वास्तविक सुंदरता है, जिसे दरकिनार कर ज्यादातर लोग केवल रूप के सौंदर्य को प्राथमिकता देने लगते हैं। हमारे विज्ञापन भी इस तर्क को बढ़ावा न देकर अपने प्रसाधनों का विज्ञापन करें, तो बेहतर, जिनमें त्वचा के रंग को हफ्ते में गोरा करने और सुंदर दिखने पर बल दिया जाता है।

इससे अलग जो स्त्रियां मेकअप नहीं करतीं, उसमें दो वर्ग शामिल हैं- एक वे, जिनके लिए सौंदर्य-प्रसाधन कोई मायने नहीं रखते, दूसरा वर्ग वह, जो सुंदर दिखना चाहता है, पर उसे यह कला आती नहीं। कई स्त्रियों को इस बात पर अफसोस करते सुना गया है कि काश उन्हें भी प्रसाधनों का कुशलता से प्रयोग करना आता, आता है तो बस एक लिपस्टिक और बिंदी लगाना। अब आप इस दूसरे वर्ग वाली महिलाओं के लिए क्या कहेंगे? क्या ये इस मुहिम के प्रति ईमानदार हैं? या ये मजबूरन इस मुहिम में शामिल कर ली गई हैं? कई बार मेकअप केवल सुंदरता को नहीं, आत्मविश्वास दिखाने में भी मदद करता है। कई जगहों पर महिलाओं की स्थिति इतनी कमतर और बदतर है कि अपनी मानसिक परेशानी और चेहरे की शिकन को छिपाने के लिए भी वे सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग करतीं हैं। यह जो ‘फेस विद मेकअप’ की दुनिया दिखाई देती है, इसके पीछे असंख्य दुख भरी, चौंकाने वाली कहानियां भी छिपी हुई हैं। इन कहानियों में शामिल महिलाएं इस अभियान में शामिल नहीं हुई हैं और न ही होंगीं। ऐसी महिलाओं को कोई मनोविज्ञानी ही समझ सकता है।
‘सेल्फी विदाउट मेकअप’ को एक स्त्री-विरोधी मुहिम भी कहा जा सकता है। इसके पीछे मानसिकता यह है कि जो औरत घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए नौकरी कर रही है; वह कमाई का जरिया बनी रहे, अपनी सुंदरता को बढ़ाने या अपने को ‘मेनटेन’ करने के नाम पर पैसा खर्च न करे। अफसोस, अब स्त्री से उसके निजी अधिकार भी छीन लिए जाएंगे क्या? अफसोस, कि नई परिभाषा के साथ स्त्री फिर पुरुष के बनाए नियमों पर चलेगी। इस पर विचार किए बिना कई औरतें इसमें शामिल हो रही हैं और पुरुष समाज के प्रपंच को बढ़ावा दे रही हैं। माना कि इसकी शुरुआत एक स्त्री ने की, लेकिन अन्य स्त्रियों को भेड़चाल में शामिल नहीं होना चाहिए, जो कि वे अक्सर और ज्यादातर हो जाती हैं। कुछ नए के चक्कर में कुछ अलग के चक्कर में।

सादगी का भी आकर्षण है, लेकिन केवल सादा रहने की कसम खा लेना गलत है। रंगों से दूर भागना गलत है। इसी तरह ‘फेस विद मेकअप’ भी सुंदर दिखता है, पर हर समय, हर वक्त मेकअप में दिखने की विवशता होना गलत है। सादगी और मेकअप दोनों स्थितियां सहज होनी चाहिए। अभिप्राय यह कि स्त्री को अपनी वृत्ति और अपनी कामनाओं में सहज होना चाहिए दुराग्रही नहीं। क्योंकि ये आग्रह भी समाज के दबाव से निर्मित होते हैं। दरअसल, आज मूल समस्या स्त्री द्वारा अपनी निजता को पहचानने की है। स्त्री को पता ही नहीं कि उसकी निजता क्या है? अपनी निजता का अधिकार उसे आज तक नहीं मिला। बिना अधिकार के आभास नहीं होता। पुरुष को अपनी हर कामना का आभास रहा है। वह अधिकार क्षेत्र का मालिक बना रहा है और भोक्ता भी। किसी भी क्षेत्र में स्त्री की अभिव्यक्ति मूलत: उसकी अपनी वृत्ति नहीं है, वह आरोपित है, समाज प्रदत्त है। स्त्री एक ऐसी इकाई है, जो आश्रय में पली है और जो आश्रय में पलता है उसकी निजता का विकास नहीं हो पाता। बहरहाल, समन्वय और सामंजस्य बनाते हुए स्त्री को समय, स्थान और परिस्थिति को ध्यान में रख कर ‘नेचुरल फेस’ और ‘फेस विद मेकअप’ का चयन करना चाहिए।

 

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