December 10, 2016

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मुद्दा: कैसे आत्मनिर्भर बनें गांव

पंचायतों के सशक्तीकरण से महिला सशक्तीकरण को भी जोर मिला है। संविधान में एक तिहाई सीटों का आरक्षण महिलाओं के लिए है।

Author October 23, 2016 00:45 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

गांवों को सारा इंतजाम अपने हाथ में लेना होगा, अपना भला-बुरा दूसरा कोई नहीं कर सकता, हम खुद ही अपना उद्धार कर सकते हैं। ऐसा आत्मविश्वास गांव वालों को पैदा करना होगा। गांव का कारोबार संभालने के लिए ग्रामसभा मजबूत बनानी होगी।’ बिनोवा भावे के इन विचारों में लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण की झलक साफ है। इसके लिए जरूरी है कि एक मजबूत ग्राम पंचायत का निर्माण किया जाए। भारत गांवों का देश है। 2011 की जनगणना के अनुसार आज भी देश की लगभग अड़सठ फीसद जनसंख्या गांवों में निवास करती है। यानी गांव के विकास के बिना लोकतंत्र की कल्पना कोरी है। यही कारण है कि संविधान के कर्णधारों ने ग्राम पंचायत के महत्त्व को प्रमुखता से न केवल स्वीकारा, बल्कि संविधान के भाग-चार के नीति निर्देशक तत्त्व में अनुच्छेद-40 में उसकी स्थापना का भी प्रावधान किया। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के काल को आधुनिक पंचायती राज का स्वर्णकाल कहा जाता है। 1986 में गठित एलएम सिंघवी समिति ने पंचायतीराज को संवैधानिक दर्जा देने की सिफारिश की थी। इस दिशा में एक और महत्त्वपूर्ण कदम बढ़ाते हुए पीवी नरसिम्हाराव की सरकार ने तिहत्तरवें संविधान संशोधन द्वारा 24 अप्रैल 1993 से इसे संवैधानिक दर्जा देते हुए पूरे भारत में लागू किया।

देश में पंचायतीराज व्यवस्था लागू करने का मकसद गांवों को पर्याप्त शक्ति और संसाधन मुहैया कराकर आत्मनिर्भर बनाना है। ताकि कोई भी ग्रामवासी, शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, आवास और रोजगार की सुविधाओं से वंचित न हो। इन्हीं सबको ध्यान में रखते हुए देश में गांव के विकास से जुडी सैकड़ों योजनाएं चलाई जाती हैं। इन योजनाओं ने कुछ हद तक लोगों के जीवन को प्रभावित भी किया है। वाईवी रेड्डी की अध्यक्षता में गठित चौदहवें वित्त आयोग ने भी पंचायतों के महत्त्व को समझते हुए पर्याप्त राशि का आवंटन ग्राम पंचायतों के लिए किया है। इसका मात्र यह उद्देश्य है की ग्राम पंचायतें अपने यहां के लिए उपयुक्त योजनाओं का निर्माण करें और राशि को विभिन्न मदों पर योजनाबद्ध तरीके से खर्च करें।

पंचायतों को कुशल बनाने के लिए स्मार्ट ग्राम, स्मार्ट पंचायत योजना चलाई जा रही है। ग्राम पंचायत की इस विकास योजना को तैयार करने के लिए स्थानीय परिवेश और पूर्ण सहभागिता की बात कही जा रही है। ग्राम पंचायत के समग्र विकास की इस योजना में सभी घटकों में लिए जाने वाले कार्यों की प्राथमिकता भी तय की जाएगी। ग्राम पंचायत को अपनी योजना बनाने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। ग्राम पंचायतें स्थानीय तकनीकी अधिकारियों से भी तकनीकी सहायता प्राप्त कर सकेंगी। चौदहवें वित्त आयोग के अनुसार केंद्र से पंचायतों को दी जाने वाली राशि में अगले तीन वर्षों में तीन फीसद तक की वृद्धि होगी। वर्तमान समय में ग्राम पंचायत अपनी कुल आय का ग्यारह फीसद हिस्सा अपने श्रोतों द्वारा स्वयं कमाती हैं, बाकी 89 फीसद हिस्सा उन्हें केंद्रीय कोषों,केंद्रीय वित्त आयोग और राज्य सरकार के अनुदानों से प्राप्त होता है।

पंचायतों के सशक्तीकरण से महिला सशक्तीकरण को भी जोर मिला है। संविधान में एक तिहाई सीटों का आरक्षण महिलाओं के लिए है। कई राज्यों ने महिलाओं के लिए पचास फीसद आरक्षण की व्यवस्था की है, जिसके कारण वह आज सत्ता के केंद्र बिंदु में आ गई है। लेकिन इसका दूसरा स्वरूप यह भी देखने को मिलता है कि कई महिलाएं केवल नाम और हस्ताक्षर करने के लिए ही पंचायत में प्रधान या सरपंच बनती हैं। बाकी का काम उनके पति, स्वसुर या बच्चे देखते हैं। यहाँ तक की पंचायतों की बैठकों में भी वे अनुपस्थित रहती हैं या घूंघट में रहती हैं। इसकी जानकारी आम नागरिकों से लेकर वहां के अफसर तक को रहती है। इसका सीधा सा अभिप्राय यह है की सीट आरक्षित होने पर जब पुरुष चुनाव नहीं लड़ पाते तो वे अपने ही घर की किसी महिला के नाम पर स्वयं चुनाव लड़ते हैं और यदि आरक्षण की व्यवस्था न हो तो यहां भी महिलाओं की स्थिति भी कुछ राष्ट्रीय राजनीति की तरह ही होती। इन सबके बाद भी इस सत्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता की स्थानीय राजनीति महिलाओं को एक प्रारंभिक मंच दे रही है जिससे उनकी भागेदारी राजनीति में सुनिश्चित की जा सके। धीरे-धीरे ही सही, यह महिलाओं की पाबंदियों को तोड़ते हुए उनके जीवन पर गुणात्मक प्रभाव डाल रही है।

नेहरू ने भी कहा था, ‘हमारी पीढ़ी के महानतम व्यक्ति की महत्त्वाकांक्षा हर आंख से हर आंसू पोछने की रही है। यह शायद हमारे लिए कर पाना मुश्किल हो, परंतु जब तक आंसू और पीड़ा है, तब तक हमारा कार्य समाप्त नहीं होगा।’ ग्राम पंचायत की भूमिका को बढ़ाते हुए अकुशल ग्रामवासियों को कम से कम सौ दिन का रोजगार प्रतिवर्ष देने के लिए मनरेगा योजना की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों को सौंपी गई है। प्राथमिक शिक्षा से संबंधित मध्यान्ह भोजन की देखभाल भी ग्राम प्रधान के द्वारा किया जाता है। गांव के विकास का महत्त्व संविधान से लेकर सभी सरकार की सूची में प्राथमिकता से शामिल रहा है।

इसके लिए स्थानीय निकायों के सशक्तीकरण को सभी ने एक सुर में स्वीकारा है। प्रत्येक सरकार ग्राम पंचायतों को स्वतंत्रता देने की बात को मानती है। लेकिन, दुर्भाग्य यही है कि जिस सिद्धांतरूप में सब मानते हैं, उसे व्यवहार में लागू करना असंभव हो गया है। पंचायतों के कामकाज पारदर्शिता का अभाव, गले-गले तक धंसा भ्रष्टाचार, अधिकारियों और प्रधानों की मिलीभगत से पैसे की लूट आदि ने मिल कर सारी योजनाएं को बंटाढार कर रखा है। कितनी भी योजनाएं बना ली जाएं, कितने अच्छे विचार रोप दिए जाएं, जब उसे सही तरीके से लागू करने और ईमानदारी से हिसाब रखने की व्यवस्था नहीं होगी, ग्राम पंचायतें अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाएंगी।

 

 

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First Published on October 23, 2016 12:44 am

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