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मुद्दा: सीखचों के पीछे कमजोर तबका

विचाराधीन कैदियों की बड़ी संख्या न सिर्फ न्याय व्यवस्था की बदतर स्थिति की ओर इशारा करती है बल्कि सामाजिक ताने-बाने के लिए भी घातक है।
Author November 13, 2016 02:32 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

क्या कमजोर तबके के लोग ही ज्यादा अपराध करते हैं? जेलों में बंद सजायाफ्ता और विचाराधीन कैदियों की संख्या देखी जाए तो कुछ ऐसा ही नजर आता है। लेकिन, अपराधशास्त्री और समाजशास्त्री मानते हैं कि गरीबी और अशिक्षा का अपराध से कोई सीधा रिश्ता नहीं है। अगर आज जेलों में मुसलिम, दलित या आदिवासियों की तादाद ज्यादा है तो उसकी सबसे बड़ी वजह है उनका आर्थिकरूप से कमजोर होना। इस कमजोरी के कारण उन्हें बेहतर कानूनी राय और सलाह नहीं मिल पाती। अच्छा वकील रखने के लिए जो पैसा चाहिए, वह उनके पास नहीं होता। कह सकते हैं कि इस देश में महंगी हो चुकी न्याय प्रणाली की कीमत चुकाने की हैसियत उनके पास नहीं होती। इस कारण मामूली अपराध में आरोपी होने के बावजूद सालोंसाल मुकदमे चलते हैं और वे जेलों में बंद रहते हैं। न उन्हें जमानत मिल पाती है और न ही मुकदमों का निस्तारण हो पाता है।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरों की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि देश की जेलों में विचाराधीन कैदियों में पचपन फीसद मुसलिम, दलित और आदिवासी समुदायों से हैं। इस तरह के आंकड़े चिंता पैदा करते हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में 14.2 फीसद आबादी मुसलिमों की, 16.6 फीसद दलित और 8.6 फीसद आदिवासी समुदाय की है। जेलों में कुल विचाराधीन कैदियों में से 20.9 फीसद मुसलिम, 21.6 दलित और 13.7 फीसद आदिवासी हैं। जानकारों का मानना है कि विचाराधीन कैदियों की वजह से न सिर्फ सामाजिक ताना-बाना क्षत-विक्षत हो रहा है, बल्कि जेलों पर अनावश्यकरूप से दबाव पड़ रहा है। त्वरित सुनवाई हो जाए तो इनमें से ज्यादातर बरी हो जाएंगे।

जेलें ठसाठस भरी हुई हैं। इस वजह से वहां सामान्य मानवीय जीवन भी बदहाल हो चुका है। अस्वास्थ्यकर माहौल और खस्ता खुराकी की वजह से अधिकांश कैदी बीमार रहते हैं। इनमें दादर और नागर हवेली, छत्तीसगढ़, दिल्ली, मेघायल, उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश की जेलों के स्थिति की भयावहता की खबरें आए दिन अखबारों में छपती रहती हैं। कई बार तो खाने-पीने की सामग्री की लूट होती है, लड़ाई-झगड़े भी होते हैं।

सच्चर समिति की रिपोर्ट ने मुसलिमों की दयनीय सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति की ओर ध्यान खींचा था। इसी में पहली बार यह खुलासा हुआ था कि देश की जेलों में बंद मुसलमानों की संख्या उनकी आबादी के अनुपात से कहीं ज्यादा है। हालांकि इस मुद्दे को सियासी रंग भी दिया जाता रहा है, लेकिन सच्चाई यही है कि चाहे कोई भी सरकार क्यों न रही हो देश में गरीब तबका ही हर जगह पिसता है। सच्चर समिति ने महाराष्ट्र की जेलों में सबसे अधिक मुसलिम कैदियों की बात उठाई थी। मगर आंकड़े गवाह हैं कि चाहे पश्चिम बंगाल हो, जहां लंबे समय तक वामपंथियों की सरकार रही, चाहे महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे राज्य हों, सब जगह विचाराधीन कैदियों में कमजोर तबके के लोग ही शामिल हैं। सजायाफ्ता कैदियों में भी ज्यादा तादाद इन्हीं की है। इनमें भी 18-30 आयु वर्ग के कैदियों की संख्या अधिक है। दलितों, आदिवासियों व मुसलिम कैदियों की बड़ी तादाद को उनकी आर्थिक, सामाजिक व शैक्षणिक स्थिति से भी जोड़ कर देखा जा सकता है। न्याय पाने में अक्षम और जागरूकता में कमी की वजह से भी इन तबकों को शोषण का शिकार होना पड़ता है। वहीं न्यायालयों पर बढ़ते मुकदमों के बोझ से भी इस समस्या को जोड़ कर देखा जा सकता है।

देश में जिन दलित, मुसलिम और आदिवासी समुदायों को कमजोर वर्ग की श्रेणी में रखा जाता रहा है, उन्हीं तबकों से आज अधिकतर लोग अगर जेलों में बंद लंबी सजा भुगत रहे हों तो सवाल उठना लाजिमी हैं। इन कैदियों में उन लोगों की संख्या अधिक है जो या तो विचाराधीन हैं या फिर मामूली अपराध के तहत उन्हें कम अवधि की सजा मिली। फिर भी जेलों में बंद हैं। यह स्थिति दो दशक में और भयावह रूप में सामने आई है। देखा गया कि तमाम ऐसे लोग जिन्हें साजिशन आतंकवाद, नक्सलवाद जैसे गंभीर आरोपों में जेलों में बंद किया गया लेकिन बाद में वे बाइज्जत बरी हो गए। जेलों में बंद इनमें ज्यादातर कैदियों की आर्थिक स्थिति कमजोर है। इस वजह से इनको कानूनी सहायता नहीं मिल पाती। इस बीच जब लंबी सजा के बाद ये लोग जेल से छूटते भी हैं तो इनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा तबाह हो चुका होता है और वे तमाम गंभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। सामाजिक दायरा सिमट चुका होता है और अक्सर सामाजिक तौर पर बहिष्कृत इनका परिवार भी बिखर चुका होता है। ऐसे में हालात और भी संजीदा होकर सामने आते हैं। इस तरह के मामलों को क्या महज कानूनी व्यवस्था की खस्ता हालत से जोड़कर या प्रशासनिक कमजोरी समझ कर छोड़ देना बेहतर है?

आजादी के इन 69 वर्षों में जेलों में लोगों के जो हालात उभर कर सामने आए हैं, वह महात्मा गांधी के उस स्वप्न को पूरी तरह खंडित करते हैं जिसमें वे जेलों को सुधार- गृह के तौर पर देखते थे। विचाराधीन कैदियों की बड़ी संख्या न सिर्फ न्याय व्यवस्था की बदतर स्थिति की ओर इशारा करती है बल्कि सामाजिक ताने-बाने के लिए भी घातक है। भारत की धीमी चलनेवाली न्याय प्रणाली भी इस तबके की यातना के लिए काफी-कुछ जिम्मेदार है। छत्तीसगढ़ की अलग-अलग जेलों में करीब दो हजार से ज्यादा आदिवासी छोटे-छोटे अपराधों के एवज में वर्षों से सजा भुगत रहे हैं। इस तरह के मामलों को देखते हुए राज्य सरकार ने एक एक उच्चाधिकारी समिति गठित की थी जिसका मकसद था आदिवासियों को न्याय दिलाना। मगर यह समिति कुछ मामलों पर ही विचार कर पाई है, जो कि बंदी आदिवासियों की संख्या के अनुपात में काफी कम है। इस मामले में छत्तीसगढ़, ओड़ीशा और झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य काफी आगे हैं।

इनमें आदिवासी हितों की अनदेखी से लेकर निर्दोष आदिवासियों को शक के आधार पर नक्सली होने के आरोप में वर्षों तक जेलों में बंद रखना शामिल है। आदिवासियों का संघर्ष अपनी जमीन, जंगल और संसाधन बचाने के लिए ही अधिक रहा है मगर आज हालात काफी खराब हैं। जेलों में बंद निर्दोष मुसलिमों को छुड़ाने के लिए जमीयत उलेमा ए हिंद जैसे संगठन जकात आदि के जरिए भी रुपए इकट्ठे कर उन्हें कानूनी सहायता मुहैया कराते हैं। लेकिन, वह मुदद भी कुल मिलाकर ऊंट के मुंह में जारी साबित होती है। आदिवासियों और दलितों के लिए तो कोई ऐसा संगठन भी नहीं है।

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