December 09, 2016

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चौथेपन की बेला

भारत में बुजुर्गों की स्थिति दिनोंदिन दयनीय होती जा रही है। वे न केवल शारीरिक बल्कि आर्थिक समस्याओं से भी जूझ रहे हैं।उनके लिए लिए जो थोड़ी-बहुत कल्याणकारी योजनाएं हैं भी, वे धरातल पर ठीक से लागू नहीं हो रही हैं। ऐसे में उनका दुखड़ा कौन सुने ? जायजा ले रहे हैं श्रीशचंद्र मिश्र।

Author नई दिल्ली | November 20, 2016 00:57 am
प्रतीकात्मक तस्वीर ।

श्रीशचंद्र मिश्र

कुछ दिन पहले एक खबर सुर्खियां बनी और कुछ अनुत्तरित सवाल छोड़ गई। दिल्ली में नब्बे साल का बुखार से पीड़ित और कुपोषण का शिकार एक वृद्ध इस गफलत में कई दिन तक अपनी पत्नी के शव को रखे रहा कि वह जीवित है। वृद्ध दंपति की कोई संतान नहीं थी। बरसों से वे न्यूनतम खुराक लेकर या डाकघर में जमा रकम से मिलने वाले मामूली ब्याज में से कुछ पैसा बचाने के लिए बिना कुछ खाए रह रहे थे। यह सिर्फ एक घटना नहीं है। बढ़ती उम्र सीमा, सामाजिक और पारिवारिक उपेक्षा, उस पर सरकारी उदासीनता ने बुजुर्गों को इस कदर अलग-थलग कर दिया है कि बुढ़ापा उनके लिए अभिशाप बन गया है। कहने को बुजुर्गों को वरिष्ठ नागरिक का तमगा देकर उन्हें कुछ सुविधाएं देने की औपचारिकता जरूर की गई है, लेकिन कुल मिलाकर बुजुर्गों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। संयुक्त परिवार के विघटन के बाद तो उनकी पारिवारिक स्थिति और दयनीय हो गई है। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक दस करोड़ से ज्यादा वरिष्ठ नागरिकों में से डेढ़ करोड़ एकाकी जीवन बिताने को विवश हैं। समय-समय पर हुए सर्वे बताते हैं कि बुजुर्ग उपेक्षा, दुर्व्यवहार और प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं।

बुजुर्गों के घर में उपेक्षित व प्रताड़ित होने के कारणों में प्रमुख है-अपनी संतानों से उनका तालमेल न बैठ पाना और अपनी जरूरतों के लिए उनका संतानों पर पूरी तरह निर्भर रहना। उम्र सीमा बढ़ना भी बुजुर्गों के लिए समस्या बनता जा रहा है। साठ साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या कुल आबादी के साढ़े सात फीसद के आसपास है। देश के बीस बड़े राज्यों में से सत्रह में से साठ साल से ज्यादा उम्र के लोगों में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले ज्यादा है और वे अपेक्षा व प्रताड़ना का ज्यादा शिकार भी हैं। इसे आधुनिकता का दोष मानें या युवा पीढ़ी में संस्कारों की कमी, पर ठीकरा फोड़े या एकल परिवारों के बढ़ते चलन से बुजुर्गों को सामाजिक व्यवस्था की मुख्यधारा से काटने की प्रवृत्ति का हवाला दे, सच तो यह है कि देश के हर चार में से एक और कुछ मामलों में तो हर तीन में एक बुजुर्ग शारीरिक प्रताड़ना का शिकार है।

रिश्तेदारों का तो खैर बुजुर्गों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया होने का आधार ही नहीं बनता, अपने सगे भी उन्हें सम्मानजनक सहारा नहीं देते। छप्पन फीसद मामलों में तो सगा बेटा ही इसके लिए जिम्मेदार होता है। तेईस फीसद मामलों में पुत्रवधुओं पर उंगलियां उठती हैं। इस समस्या का एक पहलू यह भी है कि केवल 47 फीसद मामलों में ही बुजुर्ग अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की शिकायत करते हैं। आधे से ज्यादा इसकी हिम्मत नहीं जुटा पाते। इन तिरपन फीसद मामलों में से करीब अस्सी फीसद इस शर्म से शिकायत नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे परिवार की बदनामी होगी। बुजुर्गों की उपेक्षा या अपमान करने की घटनाएं बड़े शहरों में ज्यादा बढ़ रही है। सामाजिक व्यवस्था परिवार केंद्रित होने की वजह से परिवार ही बुजुर्गों को सहारा देने का मुख्य आधार है। देश में अट्ठावन फीसद बुजुर्ग परिवार के साथ रहते हैं। बुजुर्गों का मानना है कि यह समस्या लाइलाज नहीं है। छियासी फीसद की राय है युवा वर्ग में संवेदना जगा कर और पीढ़ियों के बीच बेहतर संपर्क कायम कर इस समस्या का कारगर समाधान तलाशा जा सकता है। चौदह फीसद इसे समाधान नहीं मानते हैं। उन्हें लगता है कि बुजुर्गों को आर्थिक रूप से निर्भर बना कर ही उनकी स्थिति सुधारी जा सकती है।

असल मुद्दा आर्थिक निर्भरता से जुड़ा है। घर-परिवार और सरकार से पर्याप्त सहारा न मिल पाने की वजह से साठ साल से ज्यादा उम्र के पैंसठ फीसद ग्रामीण और पैंतीस फीसद शहरी बुजुर्गों को गुजारे के लिए बुढ़ापे में काम करना पड़ता है। कम शिक्षित और कम प्रशिक्षित होने की वजह से महिला बुजुर्गों की हालत ज्यादा दयनीय है। कामकाजी बुजुर्गों का वर्ग उन लोगों का है जो काम तो करते हैं लेकिन इतना नहीं कमा पाते कि गरीबी की परिभाषित रेखा से ऊपर उठ सकें। वरिष्ठ नागरिकों के लिए बनी राष्ट्रीय नीति में स्वीकार किया गया था कि बुजुर्गों का भला परिवार में ही संभव है। पारिवारिक मूल्य विकसित करने, युवा वर्ग को बुजुर्गों के प्रति संवेदना जगाने और उनकी जरूरतों और आकांक्षाओं को समझाने के लिए अभियान चलाना तय किया गया था। एक प्रस्ताव यह भी सामने आया था कि बुजुर्गों को साथ रखने वालों को कर में राहत, चिकित्सा सुविधा और मकानों के आवंटन में वरीयता दी जाए। एक सुझाव यह भी था कि घर के लोगों को अगर बाहर जाना हो तो बुजुर्गों की देखभाल के लिए अल्पावधि की वैकल्पिक व्यवस्था की जाए। यह सही है कि समाज में जागरूकता लाकर बुजुर्गों के प्रति सम्मान कायम किया जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि यह करेगा कौन? योजनाएं ढेरों हैं पर उन पर अमल कहां हो पाता है?

कामकाजी गरीब बुजुर्गों का वर्ग उन लोगों का है जो सामाजिक सुरक्षा की कोई व्यवस्था न होने की वजह से अशक्त शरीर से दिन रात खटने के बाद भी गुजारे के लिए पर्याप्त कमा नहीं पाते। 2011 की जनगणना के आधार पर इस साल सरकार ने देश में बुजुर्गों की स्थिति पर जो रिपोर्ट जारी की है, उसका विश्लेषण कर एजवैल फाउंडेशन ने निचोड़ निकाला है कि दस करोड़ अड़तालीस लाख बुजुर्गों में से पैंसठ फीसद अपनी संतानों पर आश्रित हैं। इस तरह के आंकड़े हालांकि उपलब्ध नहीं हैं कि इनमें से कितने फीसद बुजुर्गों को गुजारे के लिए अशक्त शरीर के साथ खटना पड़ता है। कइयों का बैंक खाता नहीं है और न ही उनके पास बीपीएल कार्ड है। लिहाजा उन्हें न तो पेंशन मिलती है और न ही किसी तरह की सरकारी सुविधा। उनकी स्थितियां अलग हैं। आजीविका के साधन में फर्क है। लेकिन एक बात सामान्य है और वह यह कि भरपूर मेहनत के बावजूद वे असंगठित क्षेत्र के दिहाड़ी मजदूर से ज्यादा नहीं कमा पाते।

सिर्फ दुनिया के विकसित देशों में ही नहीं भारत में भी उम्र सीमा बढ़ रही है। इसी के साथ एक नया सवाल उठ खड़ा हुआ है कि और बढ़ती उम्र के साथ उभरने वाली समस्याओं का समाधान कैसे होगा? अभी हमारे नीति नियोजक इस तथ्य से ही गदगद हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी इस समय भारत में हैं और उसका अच्छा सुफल मिलेगा लेकिन उन आंकड़ों की तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा जिसमें कहा गया है कि आने वाले कुछ ही सालों में भारत में उम्र दराज लोगों की संख्या भी दुनिया में सबसे ज्यादा हो जाने वाली है। विकास और बदलाव का शोर बुजुर्गों को सबसे ज्यादा प्रतिड़त कर रहा है। आज यह हालत है तो 2050 में क्या स्थिति होगी जब संयुक्त राष्ट्र के आकलन के मुताबिक भारत में सौ साल या ज्यादा की उम्र के लोगों की संख्या एक लाख छप्पन हजार से छह लाख बीस हजार के बीच के किसी आंकड़े तक पहुंच जाएगी। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और हेल्पेज इंटरनेशनल की रिपोर्ट को सिरे से खारिज भी कर दिया जाए तो भी यह सच तो सामने है ही कि भारत में उपेक्षा और प्रताड़ना के बावजूद लोगों की जीवन अवधि बढ़ रही है।

सरकारी स्तर पर साठ से पैंसठ साल की उम्र के लोगों को बुजुर्ग माना जाता है। सामाजिक मान्यता साठ पार करते ही व्यक्ति को सठियाए हुए की कतार में खड़ा कर देती है। अस्सी साल या ज्यादा के उम्र के लोगों को बुजुर्गों में भी बुजुर्ग मानने की धारणा विकासशील देशों में मुख्य रूप से तेजी से बदल रही है। अभी दुनिया में अस्सी साल से ज्यादा उम्र के लोग कुल आबादी का 1.6 फीसद हैं। 2050 तक इसके 4.3 फीसद हो जाने का अनुमान है। भारत में साठ साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या दस करोड़ से ज्यादा है। इनमें से पचहत्तर फीसद गांवों में रहते हैं। रजिस्ट्रार जनरल आफ इंडिया के अध्ययन से पता चला है कि भारत में तेजी से उम्र का विस्तार हो रहा है। 1998 में जो औसत उम्र थी उसमें 2008 में पुरुषों के मामले में चार से छह साल और महिलाओं के मामले में तीन साल की वृद्धि हुई। जीवन विस्तार का जो आंकड़ा 2002 में जुटाया गया था उसमें छह साल में महिलाओं की औसत उम्र ढाई साल बढ़कर 67.7 साल हो गई, वहीं पुरुषों की 1.8 साल बढ़कर 64.6 साल हो गई। अध्ययन के मुताबिक गांवों में औसत उम्र 2.2 साल बढ़ी और शहरों में 1.2 साल।

केरल के गांवों में महिलाओं की औसत उम्र सबसे ज्यादा 77.2 साल दर्ज हुई। जबकि साठ साल से कम की औसत उम्र से मध्य प्रदेश की ग्रामीण महिलाएं सबसे पीछे रहीं। लेकिन देश का औसत देखें तो शहरी महिला ग्रामीण महिला से 4.9 साल ज्यादा और ग्रामीण पुरुष से 7.9 साल ज्यादा जीती हैं। केरल के गांवों की महिलाओं की ही नहीं पुरुषों की औसत उम्र भी सबसे ज्यादा 70.2 साल है जो पूरे देश के ग्रामीण पुरुषों के जीवन विस्तार से करीब 7.7 साल ज्यादा है। 2000 से 2004 के बीच औसत भारतीय की उम्र 63.9 साल थी जो 2010 में 66.1 साल हो गई। यानी 2.2 साल बढ़ गई। गांवों में 2000-2004 में पुरुषों की औसत उम्र 62.7 साल और महिलाओं की 64.9 साल थी जो 2006-2010 में 2.5 साल बढ़ गई। इसी तरह शहरों में 2000-2004 में पुरुषों की उम्र 68.4 साल और महिलाओं की 69.6 साल थी जो 2006.2010 में ढाई साल बढ़ी। यह तो खैर ठहरा पुराना आकलन।

भविष्य का सटीक अनुमान लगाने का कोई कारगर उपाय भले ही न हो लेकिन पिछले कुछ सालों में बदले संतुलन के आधार पर माना जा रहा है कि 2021 में औसत भारतीय पुरुष की उम्र 69.8 साल हो जाएगी। महिलाओं की औसत उम्र तब 72.3 साल रहेगी। 2008 से तुलना करें तो 2021 में पुरुषों की उम्र 5.2 साल और महिलाओं की उम्र 4.6 साल बढ़ जाएगी। तेरह साल में यह वृद्धि है तो जाहिर है कि आगे वाले सालों में यह और बढ़ेगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अध्ययन बताता है कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ बुजुर्गों के गंभीर बीमारियों की चपेट में आने की आशंका बढ़ जाती है। भारत समेत छह विकासशील देशों में किए गए अध्ययन का निचोड़ यह है कि पचास साल से ज्यादा उम्र के 87.9 फीसद पुरुषों व 93.5 फीसद महिलाओं को पर्याप्त पोषक आहार उपलब्ध नहीं हैं, जो उनकी शारीरिक व्याधियां बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है। उपेक्षा और प्रताड़ना से हर चार में से एक यानी पच्चीस फीसद बुजुर्ग मानसिक अवसाद का शिकार हैं। हर तीन में से एक बुजुर्ग गठिया का शिकार है और हर पांचवा बुजुर्ग सुनने की क्षमता खो चुका है। ग्रामीण इलाकों में हर तीन में से एक और शहरी इलाकों में हर दो में से एक बुजुर्ग उच्च रक्तचाप का शिकार है। करीब आधों की आंखों की रोशनी खराब है। दस में से एक बुजुर्ग किसी न किसी हादसे की वजह से फ्रेक्चर का शिकार हो चुका है। साठ साल से ज्यादा उम्र के चालीस फीसद लोगों को अनिद्रा की शिकायत रहती है। गांवों में ऐसे दस फीसद और शहरों में चालीस फीसद लोग मधुमेह का शिकार हैं। तीस फीसद से ज्यादा आंतों की बीमारियों से ग्रस्त हैं।

संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि दुनिया में साठ साल से ज्यादा के लोगों की जो आबादी 1995 में 54 करोड़ बीस लाख थी वह 2025 में बढ़कर 120 करोड़ हो जाएगी। इसी आधार पर योजना आयोग ने अनुमान लगाया कि 2025 तक देश में बुजुर्ग कुल आबादी का बारह फीसद होंगे लेकिन उनकी दशा क्या होगी, इसका जो अनुमान लगाया गया है वह काफी वेदनापूर्ण है। 2025 में दस फीसद बुजुर्ग हिलने डुलने की हालत में नहीं होंगे। लिहाजा उनका विशेष ध्यान रखना होगा। बुजुर्गों की ज्यादा संख्या क्योंकि ग्रामीण इलाकों में होगी लिहाजा उन तक सुविधाएं पहुंचा पाना एक बड़ी चुनौती होगी।

रही महिलाओं की बात तो बुजुर्ग महिलाओं की संख्या पुरुषों से आगे निकल रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का आकलन है कि बुजुर्ग महिलाओं की संख्या बुजुर्गों की कुल आबादी का इक्यावन फीसद से ज्यादा है। इस समय करीब तीस फीसद बुजुर्ग गरीबी रेखा से नीचे हैं। गरीबी रेखा से नीचे, जीवन बिताने को विवश होने वालों में महिलाओं की संख्या ज्यादा रहने वाली है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का आकलन है कि बुजुर्ग महिलाओं में विधवा महिलाओं की संख्या ज्यादा है और यह लगातार बढ़ेगी। उनकी आज जो दशा है उसके आधार पर भविष्य की कल्पना की जा सकती है। यह आशंका नहीं बल्कि हकीकत है कि बुजुर्ग महिलाओं को ज्यादा खराब स्थितियों में जीवन बिताना पड़ता है। इसकी सबसे बड़ी वजह सामाजिक ताना-बाना है। आर्थिक जरूरतों को पूरा करुने के लिए और समाज में हैसियत पाने के लिए ज्यादातर महिलाओं को पति या बेटे पर आश्रित रहना पड़ता है।

ऐसा नहीं कि बुजुर्गों की समस्या सिर्फ भारत में ही है। दुनिया भर में बुजुर्ग पारिवारिक उपेक्षा का शिकार होकर अकेलेपन से जूझ रहे हैं। विकसित देशों में हालांकि सरकारी स्तर पर उन्हें सहारा देने की मजबूत व्यवस्था है। भारत जैसे परिवार केंद्रित समाज में कहने को सरकार ने कुछ कथित कल्याणकारी योजनाएं बुजुर्गों के लिए चला रखी हैं। लेकिन वे कागजों पर ज्यादा हैं, जमीनी स्तर पर उनकी मौजूदगी और उपयोगिता कम ही दिखाती है। बुजुर्गों की संख्या को देखते हुए उन योजनाओं का दायरा भी काफी सीमित है। परिवार से प्रताड़ित और सरकार से उपेक्षित झुर्रियों और निराशा से भरे बुजुर्ग महानगरों में ही नहीं छोटे शहरों और कस्बों तक में छोटे मोटे काम कर गुजारा करने को अभिशप्त हैं।

परिवार उन्हें बोझ मानते हैं और सरकार को लगता है कि वृद्धावस्था पेंशन के नाम पर बुजुर्गों को थोड़ी बहुत खैरात बांट देने से उसकी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है। यह खैरात भी सबको कहां मिल पाती है? योजना आयोग के एक समिति का मानना है कि करीब चार करोड़ बुजुर्ग पेंशन पाने के हकदार हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय का रिकार्ड बताता है कि इनमें से एक तिहाई लोगों को ही पेंशन दी जा रही है। 2006 में विश्व बैंक ने असलियत खोली थी कि तब आठ फीसद बुजुर्गों को ही पेंशन मिल पा रही है।

एक और अध्ययन का आकलन है कि देश के सबसे गरीब बीस फीसद बुजुर्गों में से केवल पंद्रह फीसद ही पेंशन का लाभ ले पा रहे हैं। कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर वृद्धावस्था पेंशन की राशि बढ़ाई है। बहरहाल पेशन योजना का लाभ उन बुजुर्गों को नहीं मिल पाता जिनके पास यह साबित करने का प्रमाण नहीं होता कि वे गरीबी रेखा के नीचे हैं। ये तमाम दयनीय स्थितियां सवाल उठाती हैं कि आबादी के दसवें हिस्से की सुध लेने की कोई सार्थक पहल कभी हो पाएगी क्या?

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First Published on November 20, 2016 12:56 am

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