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फिल्म जो अफसाना बन गई…तीसरी कसम

कहानी के मुख्यपात्र हीरामन की भूमिका में राजकपूर और हीराबाई की भूमिका में वहीदा रहमान हैं। राजकपूर और वहीदा रहमान दोनों ने अभिनय को नई ऊंचाई दी है।
Author October 9, 2016 01:11 am
फिल्म तीसरी कसम।

अधिकतर ऐसा देखा गया है कि साहित्य और सिनेमा का सृजन अलग-अलग विषयों पर होता रहा है। साहित्यिक कृतियों पर सिनेमा बनता रहा है। प्रेमचंद के ‘गबन’, ‘गोदान’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’, धर्मवीर भारती के ‘सूरज का सातवां घोड़ा’, शरत चंद का ‘देवदास’ और ‘परिणीता’, रवींद्रनाथ का ‘काबुलीवाला’ जैसी कृतियां इसमें शामिल की जा सकती है। लेकिन, तीसरी कसम इन सबसे अलग है।

फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा लिखित कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ एक अंचल की कथा है जिसका परिवेश ग्रामीण है, जहां जीविकोपार्जन का साधन कृषि और पषु-पालन है। इस कहानी के मूल पात्र हीरामन और हीराबाई हैं। कहानी के अन्य पात्र हैं-लालमोहर, पलटदास लहसनवॉ, लेकिन कहानी के केंद्र में हैं हीरामन और हीराबाई। हीरामन एक गाड़ीवान है। हीराबाई नौंटकी में अभिनय करने वाली एक रूपवती स्त्री है जिसे सामान्य भाषा में ‘बाई’ कहा जाता है। इस कहानी का नायक हीरामन एक सीधा सादा और भोला ग्रामीण युवक है। हीरामन लंबे अरसे से यानी बीस साल से बैलगाड़ी हांकता आ रहा है और इस कला में उसे महारत हासिल है। वह चाहे सीमा के उस पार नेपाल से धान और लकड़ी ढोने जैसा साहसिक कार्य हो या कंट्रोल के जमाने में चोर बाजारी का माल इस पार से उस पार पहुंचाने जैसा जोखिम भरा कार्य। वह बड़ी सफाई से अपना कार्य पूरा करता है। बहुत कम ऐसी साहित्यिक कृतियां हैं जिसमें सिनेमाकार कहानी को उसके मौलिक स्वरूप में प्रस्तुत करता है। रेणु इस दृष्टि से भाग्यशाली लेखक हैं। उनकी कहानी को सिनेमा में चित्रित करते समय सभी पात्रों के नाम, अधिकतम संवाद और कुछ गीत भी वही हैं जो कहानी के मूलस्वरूप में हंै। इसलिए कहानी और सिनेमा में अलगाव खोजना एक कठिन कार्य है।

कहानी के मुख्यपात्र हीरामन की भूमिका में राजकपूर और हीराबाई की भूमिका में वहीदा रहमान हैं। राजकपूर और वहीदा रहमान दोनों ने अभिनय को नई ऊंचाई दी है। दोनों ही अभिनय के अप्रतिम शिखर को छूते हैं। जिस ढंग से दोनों ने मानवीय संवेदनाओं को सहजता से प्रदर्शित किया है, वह प्रशंसनीय है। राजकपूर भारतीय सिनेमा में शोमैन की छवि रखते थे लेकिन जिस तन्मयता से उन्होंने गाड़ीवान की भूमिका निभाई है, वह उन्हें अभिनय की पूर्णता के स्तर तक पहुंचा देती है। राजकपूर की ताकत उनकी सादगी और भोलापन है। यह कथा एक अंचल की है, लेकिन इसका विषय सार्वभौमिक है। प्रेम मनुष्य का सौंदर्य है। कहानी व्यक्ति के साहचर्य-प्रेम की शक्ति को अभिव्यक्त करती है। कितनी सहजता से एक नौंटकी की बाई एक गाड़ीवान पर मोहित हो जाती है और दुनिया के तमाम जमींदार जैसे संपन्न लोगों को डांट कर भगा देती है।

हीरामन भी चाहता है कि हीराबाई को दुनिया न देख पाए। वह ऐसी हीराबाई को दुनिया की नजरों से बचाकर रखना चाहता है, जिसे अठन्नी का टिकिट लेकर कोई भी देख सकता है और वाह-वाह कर सकता है। इस फिल्म के निर्देशक बासु भट्टाचार्य है। निर्देशन की नजर से भी यह फिल्म बेजोड़ है। वैसे ग्रामीण परिवेष का चित्रांकन करना एक कठिन कार्य है लेकिन निर्देशक ने फिल्म के साथ पूर्णतया न्याय किया है। गीतकार स्वयं शैलेंद्र और हसरत जयपुरी हैं। गीतों को अपनी स्वरलहरीं से झंकृत करने वाले कलाकार मुकेश, लता मंगेशकर, आशा भोंसले और मन्नाडे हैं। संवाद स्वयं रेणु के हैं। पटकथा नवेंदु घोष की है। इन कलाकारों के संगम ने ‘तीसरी कसम’ के संवादों और गीतों को दर्शकों के हृदय में उतार दिया। गीत के कुछ मुखडेÞ मूल कहानी में हैं-

जिसमें ‘सजनवा बैरी हो गए हमार!’
‘लाली लाली डोलिया में लाली रे दुलहिनिया!’
‘सजन रे झूठ मति बोलो, खुदा के पास जाना है!’ शामिल है।
रेणु के शब्दों में इस सिनेमा की कहानी को देखना अप्रासंगिक नही होगा। रेणु स्वयं इस की श्ूटिंग देखने मुंबई गए थे। इसके अलावा, फिल्म का देर से प्रदर्शन और उससे उत्पन्न गल्प की भी चर्चा की जा सकती है। रेणु ने लिखा है कि वे जब गांव लौटकर आए तो तरह तरह के सवाल उनसे पूछे गए। उन सवालों को सुनकर रेणु को लगा कि वह ‘फिल्म युग’ में जी रहे हैं। नायक, नायिका, गीत-लेखक, संगीत-निर्देशक, पार्श्व-गायक-गायिका, खलनायक और हास्य अभिनेताओं के प्रशंसक समाज के हर वर्ग में हंै। रेणु ने अपने समाज द्वारा किए गए प्रश्नों के कुछ नमूने प्रस्तुत किए हैं। ‘अच्छा! राजकपूर की यानी हीरामन की पीठ में गुदगुदी लगने को किस तरह दिखलाया गया है ? आप की कहानी में जो संवाद हंै वे बदले तो नहीं हंै? क्या राजकपूर ने सचमुच बैलगाड़ी हांकी है? बैलों को हाँकते समय टिटकारी दी है? वहीदा रहमान नौटंकी की बाई की तरह लगती है न? राजकपूर क्या खाते हंै? यानी भात या रोटी? लता मंगेशकर कभी बोलती हंै या चुप रहती हैं? वगैरह, वगैरह। रेणु को फिल्म बनने के षुरूआती दिनों में इन प्रश्नों का सामना करना पड़ा। लेकिन जब फिल्म के प्रदर्शन में देरी होने लगी तो लोगों के प्रश्न भी बदलने लगे।

ये प्रश्न जिज्ञासा के नहीं बल्कि व्यंग्य के थे। रेणु कहते थे कि जिन्होंने उनकी कहानी पढ़ी है, वे सब कुछ पूछने के बाद एक सवाल पूछना कभी नही भूलते थे – और कहानी का अंत? माने दोनों को मिला तो नहीं दिया है? अंत में सभी बेताबी से यही पूछते हैं ‘कब रिलीज हो रही है? कब देखने को मिलेगी? इन प्रश्नों के साथ कुछ कटु अनुभव के प्रश्न भी रहें हैं। रेणु के अनुसार पिछले दो तीन साल से तस्वीर रिलीज होने की जितनी संभावित तिथियां बतलाई गईं वे सब गलत साबित हुर्इं। इस बीच ‘क्या से क्या हो गया’ और मेरी फिल्म अभी तक परदे का मुंह नही देख पाई। रेणु के शब्दों में ‘सजनवां भी बैरी हो गए। जो जन्म के बैरी हंै वे तो मेरे घर के सामने बिस्तर बिछाकर पड़े रहते और घर से निकलते ही चालू हो जाते ! अपने, पराए, दोस्त, परिचित, अपरिचित सभी मुझे देखकर मुंह बिदकाने लगे। ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जिस दिन पीठ पीछे या आमने सामने गुदगुदी लगनेवाली नहीं! चुभनेवाली दस बातें सुनने को नहीं मिलती। लोग उलाहना देते थे। ‘एक इनकी फिल्म बन रही है सो मुद्दत से बन रही है।’ ‘अजी मुगले आजम के बाद अब इनकी बेगमे आजम बन रही है। भैया बैलगाड़ी का खेला है, जेट-प्लेन का नहीं। इतनी जल्दी कैसे बन जाएगी। बैलगाड़ी तो अपने ही चाल से चलेगी। कहिए जनाब! राजकपूर के साथ कोई फोटो खिंचवाई या नही? वहीदा के साथ तो जरूर।

लेकिन अभिनय और निर्देशन की नजर से यह फिल्म बेजोड़ थी। इसका अभिनय उच्चकोटि का रहा। इसीलिए 1967 में ‘राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार’ में इसे सर्वश्रेष्ठ हिंदी फीचर फिल्म का पुरस्कार दिया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि सब कुछ सादगी से दर्शाया गया। निसंदेह ‘तीसरी कसम’ अपने दोनों माध्यमों में ऊंचे दरजे का सृजन है। इससे साहित्य और सिनेमा दोनों में निकटता आई है। आजादी के बाद भारत के ग्रामीण समाज को समझने के लिए ‘तीसरी कसम’ मील का पत्थर साबित हुई। ०

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