December 10, 2016

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शादी की बढ़ती उम्र: जरूरत या मजबूरी

कम से कम पंद्रह-बीस हजार रुपए महीना कमाने वाली बहू के परिवार में आगमन अब आर्थिक समस्या से निपटने का उपाय माना जाने लगा है।

Author October 22, 2016 23:37 pm
प्रतिकात्मक तस्वीर।

जनगणना के आंकड़ों से स्पष्ट हो चुका है कि महिलाओं की शादी की औसत उम्र ही नहीं बढ़ी है बल्कि महिलाएं आर्थिक रूप से भी सबल हुई हैं। जहां 2001 में दस प्रतिशत महिलाएं कामकाजी थीं, तो वहीं 2011 में यह आंकड़ा तेरह प्रतिशत हो गया है। गौरतलब है कि भारत में तैंतीस प्रतिशत महिलाओं की शादी अठारह साल से कम उम्र में हो जाती है, वहीं मात्र छह प्रतिशत पुरुषों की शादी अठारह वर्ष की उम्र से पहले होती है। ऐसे में महिलाओं के शादी की औसत उम्र को किस तरफ से समझना चाहिए। हमारे समाज में आज भी लंबे समय तक कुंवारी रह गई महिलाओं को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता। मां-बाप चाहते हैं कि उनकी लड़की का करिअ‍ॅर चाहे बने या नहीं, पर उनकी शादी जल्दी हो जाए, तो वे गंगा नहा लें। यों शहरों में ये कायदे बदल रहे हैं।

वहां बड़ी तादाद में लड़कियां शादी से पहले करिअ‍ॅर की फिक्र करने लगी हैं। यही कारण है कि अच्छे करिअ‍ॅर की चाह में उनकी शादी की कथित उम्र भी निकलने लगी है।शायद लड़कियों या अविवाहित महिलाओं को इससे ज्यादा फर्क न पड़े कि वे आखिर अकेले क्यों हैं? क्योंकि उनके पास अपने कामकाज या नौकरी के अलावा खुद को व्यस्त करने वाली दिनचर्या के अलावा वह आर्थिक सुरक्षा भी है, जिसका हवाला या तर्क देकर हाल तक उन्हें शादी के बंधन में बांधा जाता रहा है। पूरी दुनिया में ‘सोलो लाइफ’ का जो नया चलन उभर रहा है, उसमें खासतौर से महिलाओं ने दिखा दिया है कि वे अकेले रहकर मजे में और पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा सामाजिक जिंदगी जी सकती हैं। समस्या सुरक्षा और समाज के नजरिए का है, जो उनके अकेलेपन में बाधक है और भारत जैसे समाज में उन्हें मजबूर किया जाता है कि वे शादीशुदा जिंदगी बिताएं। लेकिन इस मामले में हमारे समाज का दोहरापन उनके लिए समस्याएं खड़ी कर रहा है। वैसे तो आज ज्यादातर परिवार इसके लिए राजी होने लगे हैं कि उन्हें अपने बेटे के लिए कमाऊ बहू मिल जाए। इससे घर में आने वाले चार पैसे से उनके रहन-सहन का स्तर सुधरता है और कथित तौर पर वे दहेज लेने की तोहमत से भी खुद को बचा ले जाते हैं। पर शादी योग्य कमाऊ लड़कियों से यह अपेक्षा की जा रही है कि वे उन्हीं गिनेचुने पेशों में हों, जिससे वे नौकरी के साथ घर-गृहस्थी की दोहरी जिम्मेदारी निभा सकें।

सबसे अच्छा तो यह होगा कि आस-पड़ोस के स्कूल में शिक्षक हों, जहां से दो-ढाई बजे फारिग होने के बाद सुबह छोड़ दी गई अपनी वे सारी जिम्मेदारी उठा सकें, जो एक घरेलू बहू से अपेक्षित होती है।इस अपेक्षा के दो अहम आधार हैं। पिछले कुछ अरसे से देश में बीएड करने वाली महिलाओं और टीचर्स एबेलिटी टैस्ट (सीटेट और यूपीटेट) जैसी परीक्षाओं में बैठने वाले अभ्यर्थियों में महिला-पुरुष का अनुपात निकाला जाए तो यह साफ पता चल जाएगा कि समाज के दबाव में लड़कियां ही शिक्षक बनने में ज्यादा पहल कर रही हैं। इसका दूसरा लक्षण पिछले साल उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद बार एसोसिएशन से जुड़ी महिला वकीलों के बारे में आए समाचार से उजागर हुआ था। महिलाओं की सुरक्षा के संबंध में बने कानूनों के अमल में आने के बाद से कुंवारे पुरुष, खासतौर पर, महिला वकीलों से शादी करने से कतराने लगे हैं। गाजियाबाद बार एसोसिएशन की ही दो दर्जन से ज्यादा महिला वकीलों के अनब्याहे रह जाने के आंकड़े से यह तथ्य सामने आया कि लड़के वाले इस बात को लेकर घबरा जाते हैं कि लड़की वकील है। उन्हें यह आशंका सताती है कि शादी हो जाने के बाद अगर कोई समस्या खड़ी हो गई तो ससुराल पक्ष की पूरी जिंदगी कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाते बीतेगी।

समाज में भय तो इसका होना चाहिए था कि महिला सुरक्षा से जुड़े कड़े कानूनों के अस्तित्व में आने के बाद सभी लड़कियों का कैसा भी उत्पीड़न लोगों को पूरी जिंदगी कोर्ट या जेल की हवा खिला सकता है, लेकिन ऐसी सारी आशंकाएं वकालत जैसे कुछ पेशों के साथ ही जोड़ दी गई हैं। यानी लड़की अगर पुलिस में है, वकालत में है, पत्रकार है या पब्लिक डीलिंग वाले ऐसे पेशे में हैं जहां स्वभाव में तेजतर्रारी जरूरी है और जहां काम के वक्त से परिवार की जिम्मेदारियों का तालमेल नहीं बैठता है, तो ऐसी लड़की से लोग शादी करने से दूर भागते हैं। बेशक, समाज कुछ बदला है। एक-डेढ़ दशक पहले तो लोगों को अपने परिवार में कामकाजी बहू किसी कीमत पर मंजूर नहीं थी। लोगों को तर्क होता था कि उन्हें बहू की कमाई थोड़े ही खानी है, हालांकि, इसके एवज में दहेज तो जमकर लिया जाता रहा है। पर इधर डॉक्टर, शिक्षक, बीपीओ में काम करने वाली, आइटी एक्सपर्ट या नागरिक उड्डयन, स्वास्थ्य सेवाओं जैसे सेक्टर की लड़की बहू के तौर पर ज्यादा स्वीकार्य होने लगी हैं,बशर्ते वे घर के कामकाज से तालमेल बिठा लें।

बढ़ती महंगाई और आधुनिक रहन-सहन की चाहत ने हमारे समाज को इतना तो झुकने के लिए मजबूर कर ही दिया है कि कम से कम पंद्रह-बीस हजार रुपए महीना कमाने वाली बहू के परिवार में आगमन अब आर्थिक समस्या से निपटने का उपाय माना जाने लगा है। लेकिन पुरुष-प्रधान और पितृ-सत्तात्मक समाज की वह ऐंठ अभी बदस्तूर कायम है कि कामकाजी बहू वही चाहिए जो शिक्षक जैसे सीधे-सादे पेशे में हो। क्यों भला? जब लोगों को हर महीने होने वाली अतिरिक्त कमाई से परहेज नहीं है तो कामकाज की प्रकृति को लेकर ऐतराज क्यों। भारत जैसे समाजों की दिक्कत यह है कि वहां बहू के रूप में बेटे से कमतर लड़की चाहिए, जो सास-ससुर से लेकर हरेक की धौंस सह सके। लेकिन अब महिलाएं हर जगह शिक्षित हो रही हैं, वे अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हो रही हैं, इसलिए उनसे अपने कमतर बेटों का ब्याह रचाने में लोगों को समस्या होने लगी है। लड़कियां खुद भी ऐसे व्यक्ति से शादी नहीं करना चाहतीं जो पढ़ाई और करिअ‍ॅर में उनसे कमतर हो।

लोगों को पढ़ीलिखी कमाऊ बहू तो चाहिए, पर वह इतनी जागरूक न हो कि अपने अधिकारों की बात उठाने का दुस्साहस करे और किसी दबाव या प्रताड़ना का पलटकर जवाब दे। लोगों को अपने परिवार में गाय-सी बहू इसलिए भी चाहिए कि मौका पड़ने पर वह सास-ससुर के पांव भी दबाए और घर-बाहर के सारे काम अपने जिम्मे लेकर जबर्दस्ती खुद को सुपर-वुमेन होने का मुगालता पाले, जबकि हकीकत में वह ऐसी नहीं है। इसके उलट वह दोहरी जिम्मेदारियों और घर-बाहर के काम के बेतहाशा बोझ की मारी ऐसी नारी या बहू है जो न अपने हकों की आवाज उठा सकती है और घर में किसी से अपने लिए एक प्याला चाय बनाकर देने की मांग कर सकती है।

गंभीर बात तो यह है कि ऐसा रवैया सिर्फ हमारे समाज और परिवारों का नहीं है, बल्कि अच्छी-भली बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भी है। ज्यादातर कंपनियां एक कर्मचारी के तौर पर महिलाओं के करिअ‍ॅर (नौकरी या व्यवसाय) से जुड़े मुद्दों में असुरक्षा के अलावा उन पारिवारिक दबावों की कोई गिनती नहीं करती हैं जोकि हमारे समाज की हकीकत हैं। कंपनियां यह नहीं देखना चाहतीं कि उनके यहां काम करने वाली महिलाओं को एक तरफ अपनी सुरक्षा की फिक्र सताती है तो दूसरी तरफ नौकरी के साथ गृहस्थी संभालने की चिंता भी करनी होती है। एक संस्था ने अपने सर्वेक्षण में पाया है कि नौकरी और गृहस्थी का दोहरा भार कॉरपोरेट जगत में भारतीय महिलाओं के आगे बढ़ने सबसे बड़ी अड़चन है। दोहरी पाली के कारण भारत में अधिकतर महिलाएं अपनी नौकरी तब छोड़ देती हैं जब वे अपने करिअ‍ॅर के मध्य में होती हैं और शीर्ष पदों पर उनके पहुंचने की संभावना बन रही होती है। भारत, कोरिया, जापान, आॅस्ट्रेलिया, चीन, हांगकांग और सिंगापुर आदि देशों की महिलाओं को लेकर किए गए इस सर्वेक्षण में यह बात भी निकल कर सामने आई थी कि ज्यादातर एशियाई कंपनियां महिलाओं की सुरक्षा के मसले पर और नौकरी-गृहस्थी के उनके दायित्वों में सामंजस्य बिठाने में कोई मदद इसलिए नहीं करना चाहतीं क्योकि नौकरी में महिलाओं की संख्या बढ़ाना उनके एजेंडे में नहीं है।

आज के भारत की स्त्री हर कीमत पर आगे बढ़ना चाहती है। लिहाजा वही हादसे उसके साथ हो रहे हैं, जिनका दर्द गाजियाबाद की महिला वकीलों ने बयान किया था। यह असल में एकाकीपन की शर्त के साथ कामकाजी होने के विडंबना है जो चीन और भारत जैसे विकासशील समाजों की युवा महिलाओं के जीवन की सच्चाई बन गई है। कानूनन लड़कों की शादी की न्यूनतम उम्र इक्कीस वर्ष है, जबकि लड़कियों की शादी की आयु अठारह साल है। यह फर्क क्यों? जब सत्रह साल की उम्र तक दोनों एक जैसे ही माहौल में बड़े होते हैं तो फिर लड़कियों को अठारह साल की उम्र में लड़कों के मुकाबले अधिक परिपक्व कैसे माना जा सकता है? एक याचिका में यह सवाल मद्रास हाईकोर्ट में भी उठा तो अदालत ने लड़कियों की शादी की न्यूनतम आयु को बढ़ाने का सुझाव दिया था।
वैसे तो कहा जाता है कि शादी की सही उम्र वही होती है जब आप इसके लिए पूरी तरह से तैयार हों लेकिन इस उम्र का एक अनुमान गणित से भी लगाया जा चुका है। पिछले साल उटाह यूनिवर्सिटी की समाजशास्त्री निक वोल्फिंगर ने इस बारे में एक आकलन किया और बताया कि गणितीय आकलन के मुताबिक शादी की सही उम्र अट्ठाईस से बत्तीस के बीच है। इसकी वजह यह है कि इस उम्र में तलाक की आशंका सबसे कम होती है। इस उम्र तक आते-आते स्त्री-पुरुष मानसिक, शारीरिक और सामजिक रूप से मजबूत हो चुके होते हैं और यही गुण लोगों को अच्छा जीवनसाथी बनाता है। सर्वेक्षणों में यह जानने की कोशिश की गई थी कि किशोरावस्था और उसके खत्म होते ही शादी करना तलाक की वजह क्यों बन रहा है। आकलन से उन्हें पता लगा कि इस उम्र में शादी करने वाले अधिकतर लोगों की पसंद-नापसंद में बदलाव आता है जिसकी वजह से तलाक होते हैं।

पड़ोसी मुल्क चीन में भी युवाओं में देर से शादी करने का चलन बढ़ रहा है, पर वहां के समाज ने खास तौर से लड़कियों को लेकर एक अजीब टिप्पणी की है। वहां पच्चीस पार चुकी कर चुकी अविवाहित लड़कियों को ‘शेंग नु’ यानी ‘बची-खुची लड़कियां’ कहकर संबोधित किया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में वहां की सरकारी महिलावादी वेबसाइट आॅल चाइना वीमेंस पर बची-खुची लड़कियों पर कई सारे लेख तब तक प्रकाशित किए जाते रहे जब तक कि देश के कई महिलाओं ने इस पर आपत्ति नहीं प्रकट की। हमारे देश में भी शिक्षा और करिअ‍ॅर के लिए एक उम्र पार कर चुकी लड़कियों के लिए योग्य वर की तलाश कर पाना टेढ़ी खीर साबित होने लगा है क्योंकि उनतीस-तीस की उम्र की अविवाहित लड़कियों को इस नजर से देखा जाता है कि उनमें कोई कमी होगी, अन्यथा उनकी शादी हो चुकी होती। देर से शादी के सामाजिक दबाव अपनी जगह हैं, लेकिन प्रकृति की व्यवस्था के लिहाज से भी विलंबित विवाह सही साबित नहीं हो रहा है।

इनफर्टिलिटी क्लीनिकों की जो बाढ़ आई हुई है, उससे साफ साबित हो रहा है कि हमारे आधुनिक समाज में ऐसे दंपतियों की संख्या तेजी से बढ़ी है जो बच्चे पैदा कर पाने में असमर्थ हैं। इसके पीछे शादी की बढ़ती उम्र को एक बड़ी वजह माना जा रहा है। चिकित्सा जगत मानता है कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ महिलाओं की प्रजनन क्षमता यानी मां बनने की संभावना घटती चली जाती है। यही नहीं, अगर बढ़ती उम्र में महिलाएं मां बन भी जाएं तो कई तरह की दिक्कतें आती हैं और इसे जन्म लेने वाले बच्चे के स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक माना जाता है। आम तौर पर महिलाओं के लिए बीस से तीस साल की उम्र मां बनने के लिए सबसे बेहतरीन दौर माना जाता है। इसके बाद चालीस की उम्र तक उनके मां बनने की संभावनाएं बहुत तेजी से घटती हैं और चालीस के बाद न के बराबर रह जाती हैं।

 

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First Published on October 22, 2016 11:37 pm

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