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चिंता: कुपोषण की छाया

अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में भारत अब 118 देशों की सूची में 97वें स्थान पर है। नीतू तिवारी का लेख।
Author October 23, 2016 00:55 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

नीतू तिवारी

साल 2014 में अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में भारत को जहां 55वें स्थान पर रखा गया था, वहीं 2016 में आए नतीजों के मुताबिक यह स्थिति सुधरने की बजाय और बिगड़ गई है। भारत अब 118 देशों की सूची में 97वें स्थान पर है। इसके अनुसार जिस देश में भोजन की आश्वस्ति नागरिकों को जितनी कम होगी, सूचकांक उस देश को चिह्नित करेगा। लेकिन नागरिकों में यह भरोसा आएगा कहां से? क्या इसके लिए मुफ्त जन-आहार जैसी योजनाएं सही उपाय हैं या कि अन्य सरकारी उपक्रम, जिनके कारण एक पूरे भ्रष्ट तंत्र का पेट तो भरेगा, लेकिन अन्न की दरकार रखने वाले गरीब-निर्धन परिवारों तक इसके लाभ का कितना अंश पहुंच सकेगा इसमें संदेह है।

खाद्य-सामग्रियों के घोटाले का हमारे देश में बहुत पुराना इतिहास है। पशुचारा हो या आंगनबाड़ी में बांटी जाने वाली सामग्री-सब कुछ को हजम कर सकने वाला ढीठ किस्म का पाचनतंत्र इस देश में है। इस बेमेल सुधार के सपनों का एक रूप यह है कि देश भर की अनाज मंडियों में तैयार फसल को घाटे के दामों में खरीदा जाता है। इसके लिए किसानों से अनुचित दाम की बोली लगाते हुए उसकी भर्ती डूबने तक की स्थिति पर लाने वाले सेठ, समूह और संस्थाएं दोहरा काम कर रही हैं। एक ओर किसानों को आत्महत्या की प्रेरणा दे रही हैं और दूसरी ओर अपनी जेबें भरी जा रही हैं। इस पूरे विनाश-तंत्र को ‘कॉटन फॉर माय श्राउड’ नाम से कविता बहल और नंदन सक्सेना के निर्देशन में बने वृत्तचित्र में देखा जा सकता है। न केवल अनाज बल्कि प्याज, कपास या गन्ना जैसी अन्य जरूरी फसलें भी भ्रष्ट सरकारी तंत्र और दृढ़-इच्छशक्ति के अभाव में जरूरी हाथों तक न पहुंच कर बीच में ही सड़ रही हैं।कुपोषण वास्तव में घरेलू खाद्य असुरक्षा का सीधा परिणाम होता है। सामान्य अर्थ में खाद्य असुरक्षा को इस तरह समझा जा सकता है कि समाज के हर तबके तक खाद्य उत्पादों की पहुंच बनी रहे, इसकी उपलब्धता संभव हो और स्वस्थ सक्रिय जीवन की

शर्तों को पूरा कर सकें। खाद्य असुरक्षा का सीधा कारण शासन की नीतियों में है। इस पूरे घटनाक्रम में समाज की जो इकाई सबसे अधिक पिस रही है वे हैं महिलाएं। मुक्तिबोध ने ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में एक जगह लिखा है,‘वह श्रेणी जो सबके लिए पैसा कमा कर लाती है, उसे सबसे ज्यादा आदर ही नहीं दिया जाता वरन उसकी रुचि-अरुचि, उसके मान्यता-विचार और कार्य शीघ्र ही सबके लिए मानदंड के रूप में प्रस्तुत हो जाते हैं…सबसे निचली श्रेणी उन लोगों की है जो चौके में सोते हैं। यानी घर की स्त्रियां, जिनका पोषण और स्वास्थ्य परिवार की पहली प्राथमिकताओं में गिना नहीं जाता। यही कारण है कि 53.9 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं रक्ताल्पता से ग्रस्त हैं। कुल गर्भवती महिलाओं का लगभग 49.7 प्रतिशत रक्त की कमी से जूझ रहा है। और यह मातृत्व और प्रसव पूर्व मृत्यु की खास वजह है। बाल कुपोषण को आमतौर पर जन्म के बाद न मिल सके पर्याप्त भोजन का अभाव समझा जाता है, जबकि वास्तविक कुपोषण मां के गर्भ से शुरू होता है। अपर्याप्त पोषण के कारण गर्भवती महिला से जन्मे बच्चे भी बीमार और अविकसित रह जाते हैं।

गर्भवती होने के दौरान और जीवन के पहले साल में बाल कुपोषण की शुरुआत हो जाती है। सामान्य से छोटे कद के बच्चे न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक दृष्टि से भी हीनभावना की चपेट में आ जाते हैं। अब समझना बहुत कठिन नहीं होना चाहिए कि किस प्रकार महिलाओं की सेहत की अनदेखी होने से एक पूरी पीढ़ी कमजोर और कुपोषित हो रही है। आधिकारिक गणनाओं के अनुसार अभी स्कूली शिक्षा पा रही हमारी भावी पीढ़ी का हर दूसरा बच्चा सामान्य या फिर अतिकुपोषण से ग्रसित है। भारत जैसा देश जो महाशक्ति बनने की लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा है, उसके लिए बुनयादी समस्याओं से जूझना पहला पड़ाव होना चाहिए। और देश की लगभग इक्कीस करोड़ कुपोषित और भूखी जनता के पेट पर बुलेट रेल या फ्री इंटरनेट और स्मार्ट सिटी बनाने जैसे सपनों की बात अजीब तरह की विसंगति है। भारतीय समाज व्यवस्था में एक बड़ी कमी लैंगिक भेदभाव के कारण भी है। जो महिलाओं को शारीरिक स्तर पर अस्वस्थ और कमजोर करती है।

लड़के और लड़की का अंतर हमारे समाजों में बहुत गहरे तक बैठा हुआ है। वह शिक्षा का अधिकार हो, खानपान की व्यवस्था या फिर जीवन की अन्य प्राथमिकताएं, सभी में स्त्री दोयम दर्जे की मनुष्य हो जाती है। परिवारों में बेटों के स्वास्थ्य की चिंता जितनी बारीकी से की जाती है, उसी अनुपात में भावी पीढ़ी को जन्म देने वाली और जन्म-पूर्व भी पोषण की जिम्मेदारी निभाने वाली माताओं की सेहत पर ध्यान नहीं दिया जाता।  बेहतर विकल्प की खोज हर समाज का लक्ष्य होता है। लेकिन उसके मानक तय करते समय अपने साथ हाशिए पर जाते जा रहे निर्धन नागरिकों और धूमिल पड़ती जा रही आधारभूत प्राथमिकताओं को विकास की ओर बढ़ते समय सबसे पहले हल करना अधिक सरल और व्यवस्थित तरीका होगा। अगर समाज का एक बड़ा हिस्सा कुपोषित होगा तो उसकी कार्यक्षमता और उत्पादकता भी प्रभावित होगी। कम उत्पादन का सीधा अर्थ कमतर आमदनी का होना है। कुपोषण के कारण मानव उत्पादकता 10.15 प्रतिशत तक कम हो जाती है जो सकल घरेलू उत्पाद को 5.10 प्रतिशत तक कम कर सकता है। नतीजतन निम्न-मध्यवर्गीय परिवार लगातार महंगाई और बीमारी की मार से परेशान रहते हैं।

लंबे समय से चली आ रही तंगहाली आत्महत्या, चोरी जैसी अनेक सामाजिक बुराइयों की तरफ ले जाती है। यह भी एक दुश्चक्र है जो गरीब परिवार के लोगों को अपराध के संसार में लाकर छोड़ देता है। अगर समाज को स्वस्थ नागरिक चाहिए तो उसके लिए गर्भ से ही अच्चे पोषाहार की व्यवस्था करनी ही होगी। इस ओर हमारे समाज में जागरूकता की अब भी भारी कमी है। कुपोषण कार्यक्रमों और गतिविधियों से नहीं रुक सकता है। एक मजबूत जन समर्पण और पहल जरूरी है। पूंजीवादी समाज व्यवस्था में लाभ के अधिकार का आधिपत्य केवल शक्तिशाली को होता है।

इस खतरे को समाजवादी अर्थ-व्यवस्थाएं बहुत पहले भांप चुकी थीं, तभी उन्होंने लाभांश को समाज के सभी हिस्सों में बराबर बांटने के निर्णय लाने के अलावा सबसे जरूरी सुधार सीमित आय के अर्जन को लाकर किया था। भारतीय अर्थव्यवस्था में कई झोल हैं। यहां धनी वर्ग बढ़त और मजदूर वर्ग लगातार आर्थिक स्तर की गिरावट के दो विपरीत धुरी पर रहता है। राष्ट्रीय समस्याओं के अनगिनत रूपों में से एक समस्या यह भी है जिसकी ओर हमारे नेतागण ध्यान नहीं देते। जनभागीदारी भी इसके लिए जरूरी है। किसी राष्ट्र की जनसंख्या का स्वास्थ्य और पोषणीय स्थिति देश के विकास का महत्त्वपूर्ण सूचक होती है। ०

 

 

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