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हमारे दौर में गांधी की लोकशाही

आज के दौर में भूमंडलीकरण, उदारीकरण और शस्त्रीकरण की होड़ मची हुई है। ऐसे में गांधी के सत्याग्रह, स्वदेशी और स्वराज जैसे विचारों का क्या मूल्य रह गया है? इसकी पड़ताल कर रहे हैं कृष्णस्वरूप आनंदी।
Author October 2, 2016 01:12 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

कृष्णस्वरूप आनंदी

गांधी अपने पूर्ववर्ती और समकालिक विचारकों, क्रांतिकारियों और स्वाधीनता-सेनानियों से कई मायने में सर्वथा अलग थे। उन्होंने शोषक व्यवस्था और उसके पोषकों के खिलाफ छेड़े गए जन-संघर्ष में उन परंपरागत हथियारों या तौर-तरीकों के इस्तेमाल का निषेध किया, जिनके जरिए वह व्यवस्था अस्तित्त्व में आई थी। उनका मानना था कि अगर हम प्रतिरोध की उसी प्रक्रिया का इस्तेमाल करेंगे, तो जाने-अनजाने हम उसी व्यवस्था की तर्ज पर एक दूसरी व्यवस्था का बीजारोपण करेंगे, जिसके खिलाफ हमने लड़ाई छेड़ी है। उन्होंने स्वराज, सत्याग्रह और स्वदेशी की वकालत की। साथ ही, जिस नई व्यवस्था का जन्म होगा, उसे टिकाए रखने के लिए वैसा ही शोषण-तंत्र जारी रखना पड़ेगा। नतीजतन, शीघ्र ही उससे भी बदतर व्यवस्था आएगी, जिस व्यवस्था के विकल्प के तौर पर हमने नई व्यवस्था का अधिष्ठान किया था। इसलिए जिस नई व्यवस्था की हम परिकल्पना करते हैं, उसको अवतरित करने का साधन भी उसी के अनुरूप होना चाहिए। वे बराबर कहा करते थे कि शैतान की उपासना करके ईश्वर का साक्षात्कार नहीं किया जा सकता। गांधी ने कहा है, ‘मेरे स्वराज को लोग अच्छी तरह से समझ लें। भूल न करें। संक्षेप में, वह विदेशी सत्ता से सपूर्ण मुक्ति और साथ ही, संपूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता। परंतु इसके दो सिरे और भी हैं।… इनमें से एक है नैतिक और सामाजिक और दूसरा है धर्म। धर्म अपने ऊंचे से ऊंचे में। नैतिक और सामाजिक उत्कर्ष को हमने अहिंसा का नाम दिया है। यह है स्वराज का चतुष्कोण।….’
गांधी की नजर में साधन और साध्य के बीच एकरूपता है। जैसे साधन होंगे, वैसा ही साध्य होगा। वे यह मानते थे कि सत्य और अहिंसा के बीच अन्योन्याश्रय-संबंध है यानी वे दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। साधन और साध्य की शब्दावली में अहिंसा साधन है और सत्य साध्य है। गांधी का सत्य और अहिंसा एकांत साधना के जड़ प्रत्यय नहीं है, बल्कि उनकी सिद्धि लोकजीवन और प्रकृति के साथ समरसता स्थापित करके ही की जा सकती है। गांधी की निगाह में दरअसल ये सामाजिक मूल्य हैं। उन्हें वे ऐसे मूल स्रोत के रूप में देखते हैं, जिनसे सारी नीतियों, कार्यक्रमों, विधि-व्यवस्थाओं, संस्थाओं, प्रक्रियाओं और प्रणालियों को पुष्पित-पल्लवित और प्रकाशित होना चाहिए। गांधी के सत्याग्रह के दो पहलू हैं- रचना और संघर्ष। ज्यों-ज्यों हम रचनात्मक कार्य में आगे बढ़ेंगे, त्यों-त्यों हमारी संघर्षशीलता में पैनापन आता जाएगा। रचना के बगैर जुझारू संघर्ष की बात सत्याग्रह की मूल भावना के खिलाफ है। गांधी का मंतव्य है कि रचनात्मक प्रवृत्तियां क्रांतिकर्म का अभिन्न अंग हैं। उनका एकमात्र हेतु ऐसी समाज-व्यवस्था कायम करना है जिसमें सभी को ईमान की रोटी इज्जत की जिंदगी मयस्सर हो। रचनात्मक कार्य को राहत कार्य समझना भूल होगी। गांधी के शब्दों में, ‘अहिंसक सेना के लिए रचनात्मक कार्य वही महत्त्व रखता है, जो महत्त्व संहारक युद्ध हेतु गठित की गई सेना के लिए कवायद वगैरह का है।’

गांधी मानते थे कि हर देश की अपनी अलग-अलग प्रकृति, मनीषा और प्रतिभा होती है। इसलिए उसे अपने ढंग से अपनी आवश्यकताओं, आकांक्षाओं और संसाधनों के अनुरूप स्थानीय स्वशासन का ढांचा खड़ा करना चाहिए। किसी विशेष नुस्खे पर बना-बनाया राजनीतिक मॉडल उस पर थोपा नहीं जाना चाहिए। हर राष्ट्र ने अपनी शासन-व्यवस्था को चलाने के लिए अपने ढंग से विविध देशज संस्थाएं विकसित की थीं। औपनिवेशिक काल में उन्हें रौंदा गया। गांधी का मानना था कि हर नवस्वाधीन देश स्थानीय लोगों के पुरुषार्थ, पराक्रम और सहयोग से अपनी क्षतविक्षत संस्थाओं को पुनरुज्जीवित करे, उनका कायाकल्प करे या जरूरत के हिसाब से नई संस्थाएं गढ़े। हर जनगण को पूरा हक है कि वह अपनी संस्थाओं की पुनर्रचना के लिए, उनकी बेहतरी के लिए जो कदम उठाना चाहे, उठाए। बस शर्त यह है कि इस कार्य में जनता की भागीदारी होनी चाहिए, यह कार्य जनता के अभिक्रम से चले और नेतृत्व उसके बीच से उभर कर सामने आए। जो व्यवस्था अवाम की शक्ति से प्रस्फुटित होगी, उसकी सलामती भी वही करेगी।
गांधी का मानना था कि हर राष्ट्र को अपनी प्रेरणा से अपनी जनता के हित में संसाधनों, क्षमताओं और विचारों का सम्मिलन करते हुए अपना खुद का शासनतंत्र विकसित करना चाहिए। ऐसी शासन व्यवस्था ही टिकाऊ होगी, उसकी महत्त्वाकांक्षाओं के अनुरूप होगी और उसकी प्रतिभा को निखारने का काम करेगी। स्व तंत्रता-संग्राम के दौरान गांधी ने यह अनुभव किया था कि कोई भी राष्ट्र विश्व-बिरादरी में तभी सच्चा योगदान कर सकेगा, अगर वह पूरी तरह स्वाधीन हो। किसी राष्ट्र को इसकी इजाजत कतई नहीं दी जानी चाहिए कि वह दूसरे राष्ट्रों का किसी भी रूप में शोषण करे। हर राष्ट्र का यह जन्मसिद्ध अधिकार है कि वह दूसरे राष्ट्रों को अपना दोहन न करने दे। गांधी के शब्दों में, ‘सभ्यता के उद्धार के लिए आप विभिन्न देशों के बीच सहयोग की आकांक्षा रखते हैं। मैं भी यही चाहता हूं, लेकिन सहकार स्वाधीन राष्ट्र की परिकल्पना करता है, ताकि वे परस्पर सहयोग कर सकें।’ ‘हमारी राष्ट्रीयता दूसरे देशों के लिए खतरा नहीं बन सकेगी, अगर हम किसी का शोषण नहीं करेंगे और न ही किसी को इस बात की इजाजत देंगे कि वह हमारा शोषण करे।

दुनिया की बेहतरी के लिए हमें नहीं चाहिए एक-दूसरे से लड़ते-भिड़ते परम स्वतंत्र राष्ट्र; बल्कि हमें चाहिए एक-दूसरे से सख्य संबंध रखने वाले परस्परावलंबी मुक्त देशों का महासंघ।’ जिस प्रकार गांधी ने राजव्यवस्था या लोकशाही के लिए स्वराज की संकल्पना की थी, उसी प्रकार अर्थव्यवस्था के लिए स्वदेशी का विचार रखा। स्वदेशी और स्वराज्य एक ही सिक्के दो पहलू हैं।  गांधी यह मानकर चलते थे कि आदमी जिस समुदाय में पैदा हुआ है, वह प्राथमिक समुदाय उसके अभ्युदय के लिए नर्सरी का काम कर सकता है। उसके जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं वहीं पूरी की जानी चाहिए। सामुदायिक सहजीवन की इस प्राणवान् इकाई की विविध गतिविधियों प्रवृत्तियों और संस्थाओं में वह कारगर ढंग से सक्रियतापूर्वक हिस्सा ले सकता है। उनका कहना था,‘अहिंसक पूर्ण स्वराज की मुख्य चाभी है- आर्थिक समानता। आर्थिक समानता माने सब आदमियों के पास एक सरीखी संपत्ति का होना, यानी कि सबके पास कुदरती जरूरतें पूरी करने लायक संपत्ति का होना।’ इन बुनियादी समुदायों में रहने वाले लोग स्थानीय संसाधनों को इस्तेमाल करते हुए समुचित श्रम-सघन तकनीक के जरिए आसपास की जरूरतों को पूरा करने के लिए उत्पादन करेंगे। प्राकृतिक संसाधनों पर सामुदायिक स्वामित्व रहेगा।

गांधी बराबर कहा करते थे कि इन प्राथमिक समुदायों (गांवों/टोलों/पुरवों/मोहल्लों) में स्वयंपूर्णता और आत्मनिर्भरता रहेगी। ये एक-दूसरे से अलग-थलग कतई नहीं रहेंगे, बल्कि सामान्य हितों के लिए बढ़-चढ़ कर, बगैर एक दूसरे का शोषण किए हुए, परस्पर सहकार करेंगे। ये मिलजुल कर उन कामों या उद्यमों को लेंगे, जिन्हें अकेले दम चलाना उनके बस की बात नहीं। ये प्रत्यक्ष समुदाय क्षेत्रीय इकाई में संघबद्ध होंगे। ये क्षेत्रीय इकाइयां, मिलकर बृहत्तर समुदाय में गुंथेंगी। ये बृहत्तर समुदाय इसी ढर्रे पर उत्तरोत्तर और बृहत्तर होते जाएंगे। एकीकरण, समन्वयीकरण और ऊर्ध्वीकरण का यह सिलसिला तब तक चलेगा, जब तक राष्ट्रीय समुदाय नहीं आ जाता। अंत में, राष्ट्रीय समुदाय विश्व-समुदाय में समन्वित होंगे।…स्वराज और स्वदेशी पर टिकी विश्व-व्यवस्था पर ‘यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे’ की उक्ति चरितार्थ होगी। गांधी के शब्दों में,‘

ऐसा समाज अनगिनत गांवों (प्राथमिक पड़ोसी समुदायों) का बना होगा। उसका स्वरूप एक क े ऊपर एक के ढंग पर नहीं, बल्कि लहरों की तरह एक के बाद एक की शक्ल में होगा। जिंदगी मीनार की शक्ल में नहीं होगी, जहां ऊपर की तंग चोटी को नीचे के चौड़े पाए पर खड़ा होना पड़ता है। वहां तो समुद्र की लहरों की तरह जिंदगी एक के बाद एक घेरे की शक्ल में होगी और व्यक्ति उसका मध्य बिंदु होगा। यह व्यक्ति हमेशा अपने गांव के खातिर मिटने को तैयार रहेगा। गांव अपने इर्दगिर्द के गांवों के लिए मिटने को तैयार रहेगा। इस तरह आखिर सारा समाज ऐसे लोगों का बन जाएगा, जो उद्धत बन कर कभी किसी पर हमला नहीं करते, बल्कि हमेशा नम्र रहते हैं और अपने में समुद्र की उस शान को महसूस करते हैं, जिसके वे एक अंग हैं। इसलिए सबसे बाहर का घेरा या दायरा अपनी ताकत का उपयोग भीतर वालों को कुचलने में नहीं करेगा, बल्कि उन सबको ताकत देगा और उनसे ताकत पायेगा।…(उनमें) न कोई पहला होगा, न कोई आखिरी।’

इन दिनों भूमंडलीकरण का दौर तेजी से चल रहा है। लेकिन, यह ऊपर से नई बहुराष्ट्रीय साम्राज्यी शक्तियों द्वारा गरीब और कमजोर राष्ट्रों पर जबरन थोपा जा रहा है। गांधी भी वैश्वीकरण के पक्षधर थे। लेकिन, वे नीचे यानी बुनियाद से अंतरराष्ट्रीय करण का ढांचा खड़ा करना चाहते थे। केंद्रित उद्योगवाद के चलते विश्व में ऐसी व्यवस्था कायम हुई थी, जिसके तहत भीमकाय औद्योगिक प्रतिष्ठानों का पेट भरने के लिए भूमंडल में जहां कहीं भी कच्चा माल मिला, वहीं से उसका दोहन किया गया और इनसे बने पक्के माल की लगातार उपलब्धता और बाजार की सुनिश्चितता के लिए औद्योगिक देशों ने तमाम देशों को अपने शासनाधीन किया। इन अधीनस्थ देशों की अर्थव्यवस्थाएं अपने आका देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए चलाई जाने लगीं। भारी पैमाने पर औद्योगीकरण के चलते गलाकाट प्रतियोगिता बढ़ती गई, जिसके फलस्वरूप अधिकाधिक उपनिवेश हथियाने के लिहाज से औद्योगिक देशों ने आपस में भी लड़ाइयां लड़ीं। आज भी कमोबेश वही स्थिति चल रही है। विश्व अर्थव्यवस्था में मुट्ठीभर अमीर और ताकतवर देश केंद्रस्थ हैं, जबकि तमाम गरीब और कमजोर देश परिधि पर हैं। परिधि पर जो देश हैं, उनका दोबारा औपनिवेशीकरण हो रहा है। केंद्रस्थ अर्थव्यवस्थाओं ने वित्त, व्यापार, पूंजी और प्रौद्योगिकी नियंत्रण करने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ गठजोड़ करके नई वैश्विक संप्रभु साम्राज्यी शक्तियों का संजाल तैयार किया है।

गांधी वास्तव में युगद्रष्टा थे-उन्होंने भांप लिया था कि हिंसा और केंद्रीयकरण एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप में जुड़े हुए हैं। उन्होंने 1940 में ही लिखा था, ‘जो समाज हिंसा का सामना हिंसा से करने का विचार पहले से ही रखकर उसके लिए प्रबंध करता है, वह या तो खतरे की जिंदगी बिताता है या बड़े-बड़े शहर और रक्षा के लिए शस्त्रागार खड़े कराता है। यूरोप की स्थिति से यह मान लेना अनुचित नहीं होगा कि वहां के शहर, विशालकाय कारखाने और भीमकाय शस्त्रास्त्र एक-दूसरे से इतने घनिष्ठ रूप में संबंधित हैं कि एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं रह सकता।’ इसीलिए उन्होंने चेतावनी दी थी, ‘आप कारखानों की सभ्यता के आधार पर अहिंसा का निर्माण नहीं कर सकते, शोषण हिंसा का सार है।’ इसलिए जो लोग ये तर्क देते हैं कि औद्योगीकरण ने, कम से कम, उत्पादन की समस्या का हल तो निकाल ही लिया है, गांधी उनसे सहमत नहीं थे।

औद्योगीकरण के पक्षधर कहते हैं कि अगर उत्पत्ति के साधनों को पूंजीवादी चंगुल से निकालकर, उनका समाजीकरण कर दिया जाए, तो आम लोगों के उपभोग के लिए उत्पादों की बहुतायत हो जाएगी और उन्हें कमरतोड़ जिस्मानी मेहनत से उबारा जा सकेगा। गांधी की निगाह में दरअसल बुराई औद्योगिक पद्धति में ही है। व्यक्तिगत स्वामित्व के बजाय राज्यगत स्वामित्व कर देने से औद्योगीकरण के चरित्र में कोई मूलभूत बदलाव नहीं आएगा। इस तरह का जो विकल्प है, उसकी स्थिति किसी महानदी की उस अनुषंगिक धारा जैसी है, जो अंततोगत्वा मुख्यधारा में मिलकर रहेगी। होता भी यही है, पूर्वी यूरोप में साम्यवाद का विसर्जन इसका ज्वलंत उदाहरण है। गांधी ने कहा था, ‘पंडित नेहरू औद्योगीकरण चाहते हैं, क्योंकि उनका ऐसा खयाल है कि ये बुराइयां उद्योगवाद के मूल में ही हैं और उद्योगों का कितना भी समाजीकरण क्यों न किया जाए, फिर भी वे जड़ से दूर नहीं हो सकतीं।’ स्वतंत्रता के बाद भारत ने औद्योगीकरण के मामले में  पश्चिम का अंधानुकरण किया, उसी का परिणाम है कि वे हमारी अर्थव्यवस्था में विलीन होती गई हैं। भूमंडलीकरण के नाम पर जो अंतरराष्ट्रीय आर्थिक ढांचा संगठित हो रहा है, वह गरीब अर्थव्यवस्थाओं को निगलता जा रहा है।

केंद्रित उद्योगवाद के विकल्प के रूप में उन्होंने विकेंद्रित उत्पादन-प्रणाली का विचार रखा। यह पद्धति मानव-केंद्रित है। इसलिए उत्पादन प्राथमिकता के तौर पर आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाएगा, न कि अनाम और दूरस्थ बाजारों के लिए। यंत्र, उपकरण ऐसे हों, जो मनुष्य के सच्चे साथी-संगी होंगे।…यंत्रों को इस बात की इजाजत नहीं दी जाएगी की वे मनुष्य के अंगों को ही बेकार कर दें। उन्हें शोषण का वाहन नहीं बनने दिया जाएगा। विकेंद्रित अर्थरचना में ऐसे यंत्रों को कोई स्थान न मिलेगा, जो अधिकाधिक लोगों के व्यापक हितों को ताक पर रखकर मुट्ठी भर लोगों के हाथों में सत्ता और संपत्ति केंद्रित कर देते हैं। गांधी बराबर कहा करते थे कि उत्पादक लोगों की सृजनशीलता का भरपूर विकास हो, समूचा उत्पादनकर्म कलापूर्ण, आनंदप्रद और सौंदर्य की श्रीवृद्धि करने वाला हो। प्रकृति के साथ उत्पादन-प्रक्रिया का मैत्रीभाव, साहचर्य या शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व हो। शिल्प उत्पादन की विविधता को नष्ट करने वाला न हो।

विकेंद्रित अर्थरचना में ऐसा नहीं है कि केंद्रित उद्योगों के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा। लेकिन, वे मुख्य गतिविधि के रूप में नहीं चलेंगे। जिस प्रकार विष का अपना स्थान होता है, वैसा ही स्थान इन उद्योगों का रहेगा। विष कभी-कभी औषधि का काम करता है, एक निश्चित परिणाम में थोड़ा-सा लिए जाने पर विष से दवा बन जाती है।आज जो विकेंद्रित उत्पादन हो रहा है, वह मुख्यरूप से केंद्रित उत्पादन को टिकाए रखने के लिए है। इसके अतिरिक्त विकेंद्रित उत्पादन का अगर कोई ढांचा अस्तित्व में है, तो उस पर केंद्रित उत्पादन की गाज गिर रही है।
गांधी की दृष्टि में केंद्रित उद्योगों को विकेंद्रित उत्पादन के लिए कच्चा माल और आवश्यक साज-सरंजाम जुटाने की भूमिका निभानी पड़ेगी यानी विकेंद्रित अर्थरचना के लिए उनकी भूमिका पोषण की होगी, उसका भक्षण करने वाली नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि केंद्रित उद्योग मुनाफे और लालच के लिए नहीं चलेंगे, बल्कि व्यापक सार्वजनिक हित में वे नियोजित होंगे। गांधी उस ढांचे को बदलना चाहते थे, जिसमें विकेंद्रित उद्योग केंद्रित उद्योग की मेहरबानी पर चलते हैं, लेकिन वे अब भी चलेंगे, पर न्यूनतम ढंग से गौण रूप में और वह भी विकेंद्रित अर्थरचना को शक्ति-सामर्थ्य देने के लिए या व्यापक सार्वजनिक उपयोग में।

‘सभ्यताएं आती हैं और चली जाती हैं। अगर कोई सभ्यता ऐसी है, जो धरती का दर्जा घटाती है, तो धरती नष्ट नहीं होती, परंतु वह सभ्यता नष्ट होती है।’ यह था गांधी का नजरिया। उन्होंने बार-बार इस बात पर बल दिया कि यह धरती हरेक की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने की क्षमता रखती है, लेकिन किसी एक की भी लोलुपता या वासना की संतुष्टि नहीं करती। अगर उसे बलात् कुछ लोगों की लालच का शिकार बनने दिया जाएगा, तो वह भयानक ढंग से प्रतिकार करेगी, जो मानव सभ्यता के लिए अभिशाप सिद्ध होगा। १

 

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First Published on October 2, 2016 1:12 am

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