ताज़ा खबर
 

भाषा: भाषा में पुरुषसत्ता का वर्चस्व

जेंडर के लिए लिंग शब्द का प्रयोग व्याकरण के पुरुषवादी होने का सबसे पहला प्रमाण है। लिंग पुरुष-यौनांग है। उस की जगह योनि शब्द भी इस्तेमाल किया जा सकता था।
Author October 2, 2016 02:38 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

रवींद्र कुमार पाठक

अ गर किसी संस्कृति में पसरा भेदभाव, विषमता या हिंसा की परख करना करना चाहते हैं, तो हमें सबसे पहले उसकी भाषा को परखना होगा। भाषा को खंगालने से वह सब कुछ सामने आने लगता है, जो व्यक्त हुआ या होते रहा है। हम जानते हैं कि सभ्यता-संस्कृति में जो लिंग-भेद है, वह भाषा में भी प्रतिबिंबित होता है। फिर, हम उस भाषा का विश्लेषण (व्याकरण-भाषाविज्ञान) करें, तो उसमें भी वह लिंग-भेद प्रतिच्छवित होगा।  व्याकरण, भाषा में अंतर्निहित नियमों के विवेचन का नाम है। जब तक भाषा में लिंग-भेद बना रहेगा, तब तक व्याकरण के नियमों में भी झलकता रहेगा। यानी, व्याकरण का लिंग-भेदी होना, भाषा और भाषिक समाज के लिंगभेदी होने का नतीजा है। फिर भी, वैयाकरण उसमें अपनी तरफ से कुछ मजबूती ला देते हैं, जब वे भाषा का व्याकरण लिखते हैं। इस विसंगति का एक प्रमुख आधार वैयाकरणों की पांत में स्त्री की नगण्यता भी है। वैसे इक्का-दुक्का स्त्री वैयाकरण होकर भी क्या कर सकती है, जबकि पितृसत्तात्मक सोच का वर्चस्व हो। वैयाकरण, लक्षण या परिभाषा बनाते और उनके उदाहरण देते वक्त स्त्री के हीन या दोयम दर्जे पर मुहर भी लगाते चले हैं। हिंदी के यशस्वी वैयाकरण पंडित किशोरीदास वाजपेयी (हिंदी-शब्दानुशासन में ) ‘आत्मा’ के स्त्रीलिंग और ‘परमात्मा’ के पुल्लिंग होने का यह तर्क पेश करते हैं, तो बात खुल कर सामने आ जाती है। वे कहते हैं कि आत्मा तो ईश्वर के अधीन है, स्वतंत्र नहीं है। परमात्मा स्वाधीन है, स्वतंत्र है। स्वतंत्रता की व्यंजना के लिए ‘परमात्मा’ पुल्लिंग में और पराधीनता के प्रदर्शन के लिए ‘आत्मा’ स्त्रीलिंग में है।

स्पष्ट है कि स्त्री और पुरुष को लेकर गुणों या सामाजिक व्यवहार के कोटीकरण की लिंगभेदी-अलोकतांत्रिक मानसिकता व्याकरण जैसे शास्त्र में भी घर कर गई है, जब कि आमतौर पर समझा जाता है (और यह एक हद तक सही भी है ) कि व्याकरण समाज के किसी भेदभाव या पूर्वग्रह से मुक्त, स्वतंत्र और तटस्थ विवेचन का शास्त्र होता है। स्त्री को कमजोर, घरेलू, अबोध, देह-बोध, सौंदर्य से ग्रस्त, खाना पकाती या पतिभक्ति करती आदि रूपों में ही उदाहरण बनाना आम है, जबकि पितृसत्ता की विविध  गुलामियों की जकड़बंदी से निकल कर सशक्त हो रही – पढ़ती, खेलती, कुश्ती करती, गाती, झूमती, नौकरी करती आदि स्त्री भी उदाहरण बनाई जा सकती है। कुछ नहीं तो, अंतहीन संकटों और मजबूरियों में पड़ी या डाली गई, भूखी, पराश्रित, मनोवांछित मित्रता बनाने या मनमाफिक कपड़े पहनने तक को तरसती स्त्री उदाहरण बन सकती है। पर नहीं, वैयाकरणों को ऐसा करना काहे को सूझेगा? हिंदी-संस्कृत और अंग्रेजी के व्याकरणों में लड़की की सुंदरता को इतना बखाना गया है कि पूछिए मत।

भाषा के व्याकरण में व्याप्त ‘लिंग’ नामक अवधारणा सदियों से समाज में चल रहे स्त्री-पुरुषमूलक विभेद-भावना का प्रतिबिंब है, पर साथ ही (जैसा कि समाज में रहा है, वैसा ही) पुल्लिंग का वर्चस्व भी स्त्रीलिंग पर दिखाती है। यानी, पुल्लिंग के सामने स्त्रीलिंग को दोयम दर्जे का सिद्ध मान कर, ‘लिंग’ (जेंडर) नामक अवधारणा खड़ी हुई है। किसी भाषा में मुख्यत: रूप-रचना (शब्द-रूप और धातु-रूप / क्रिया की रचना) और गौणत: शब्द-रचना (व्युत्पत्ति) में लिंग की भूमिका प्रभावी रहने से मानना होगा कि उस भाषा में लिंग-भेद है। इस नजरिए से तो हिंदी में लिंग-भेद बहुत मजबूत अवस्था में है । हिंदी भाषा और उसके व्याकरण के पुरुषवादी होने के ढेर सारे संकेत हैं।

जैसे, जेंडर के लिए लिंग शब्द का प्रयोग व्याकरण के पुरुषवादी होने का सबसे पहला प्रमाण है। लिंग पुरुष-यौनांग है। उस की जगह योनि शब्द भी इस्तेमाल किया जा सकता था, जिसका अर्थ जीवविज्ञान और सांस्कृतिक अर्थविज्ञान के लिहाज से दूर तक (जाति-प्रजाति तक) चला जाता है, जबकि लिंग का अर्थ तो चिह्न तक ही सिमट कर रह जाता है। कुछ खास प्रत्यय (जिन्हें स्त्री-प्रत्यय कहा जाता है) हिंदी-संस्कृत-अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में होते हैं, जो पुल्लिंग शब्दों में लग कर स्त्रीलिंग शब्द बनाते हैं। जैसे – लड़का + ई = लड़की। भाषा की यह व्यवस्था स्त्रीलिंग को पुल्लिंग के सामने कमतर आंकने की मानसिकता की देन है। पर, लोक में चल रही शब्द-निर्माण प्रक्रिया की व्याकरण द्वारा यह निर्दाेष व्याख्या मात्र नहीं है, क्योंकि शब्द-रचना में लोक कितना भी स्वतंत्र हो, उसकी प्रक्रिया से वह मुक्त नहीं होता। इस तरह पुल्लिंग शब्द को मूल और स्त्रीलिंग को गौण बताने का दोष तो व्याकरण ने ही अपने सिर पर लिया है। वह चाहता तो लड़का और लड़की दोनो को मूल शब्द मान सकता था या द्विमुखी व्युत्पत्ति-प्रक्रिया के तहत लड़का से लड़की और लड़की से लड़का को व्युत्पन्न प्रतिपादित कर सकता था। जब अध्यक्ष और अध्यक्षा दोनो शब्द मौजूद या संभव हंै, तो स्त्री के भी कर्म को अध्यक्षता ही क्यों कहते हैं? महादेवी वर्मा ने सभा की अध्यक्षता की। अध्यक्षाता क्यों नहीं?

व्याकरण की एकशेष-प्रक्रिया में आमतौर पर स्त्रीलिंग को पुल्लिंग में विलीन कर दिया जाता है, पर इस का उलटा प्राय: नहीं होता। जैसे- बच्चे खेल रहे हैं या कई आदमी गए आदि का प्रयोग कर हम मान लेते हैं कि इन में बच्चियां या औरतें भी आ गर्इं। इस स्थिति में बच्चियां या औरतें का प्रयोग कर इन में बच्चे या आदमी को भी निहित मानने में हम कठिनाई का अनुभव करते हैं। भाषा में कार्यरत यह प्रवृत्ति पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना के उस विराट् दोष की छाया है, जिसके तहत स्त्री को कहीं जगह नहीं दी गई है। हर जगह भाईचारा शब्द चलता है, लगता है कि बहन रहती ही नहीं दुनिया में। हिंदी भाषा में जहां लिंग की अनिचितता होती है, वहां केवल पुल्लिंग का प्रयोग होता है। जैसे – कौन गया ? वह कौन था ? इस की जगह यदि कौन गई ? वह कौन थी? आदि का प्रयोग कर दें, तब लिंग की अनिश्चितता नहीं रह जाती।

इतना स्पष्ट हुआ रहता है कि जाने वाली या वह स्त्री है और सवाल केवल इसलिए पूछा जा रहा है ताकि यह पता चले कि जाने वाली या उस स्त्री की पहचान क्या है? जहां कहीं लिंग-विशेष जान कर भी उसे प्रकट करना जरूरी न समझा जाए, वहां पुल्लिंग का ही बोलबाला रहता है। किसी पुरुष को ही नहीं, किसी स्त्री को भी आता देख कर कहा जा सकता है- कोई आ रहा है। वाच्य प्रकरण में जहां क्रिया, कर्त्ता या कर्म के प्रभाव से मुक्त हो जाती है वहां हिंदी में पुल्लिंग-एकवचन क्रिया होती है। जैसे – रमेश ने खाया। रजनी ने खाया। रमेश ने साथियों को पुकारा। रजनी ने सहेलियों को पुकारा। अव्यय और क्रिया के विशेषण भी हिंदी-व्याकरण में पुल्लिंग में सिद्ध माने गए हैं । राम अच्छा करता है । सीता अच्छा करती है। करने वाला चाहे स्त्री हो, या पुरुष, पर अच्छा ही करेगा, न कि कभी अच्छी करेगा। यही तो पुल्लिंगवाद है। सभी क्रियार्थक भाववाचक संज्ञाएं हिंदी में पुल्लिंग होती हैं। जैसे- पढ़ना अच्छा लगेगा। क्रियार्थक संज्ञा की रचना भी ‘ना’

पुंप्रत्यय से होती है, न कि ‘नी’ स्त्रीप्रत्यय से। ये पढ़ना, जाना आदि रूपों में ही होती हैं, न कि पढ़नी, जानी आदि । समास में भी पुल्लिंग की विजययात्रा जारी है । जैसे – द्वंद्व समास बनाने में घटक रूप में भले स्त्रीलिंग पद की भी भूमिका हो, परंतु समस्त पद पुल्लिंग में ही सिद्ध होता है उदाहरणस्वरूप, राजा-रानी आए। ऊनवाचक यानी छोटे या हीन अर्थ में किसी संज्ञा को ढालने के लिए उसे स्त्रीलिंग रूप में सिद्ध कर देना भी स्त्रीलिंग की हीनता का परिचायक है। जैसे- डिब्बा से डिबिया। इन रूपों में हिंदी-व्याकरण में लिंग नामक अवधारणा प्रतिष्ठित है, जो व्याकरण जैसे वस्तुनिष्ठ शास्त्र में भी स्त्री और पुरुष के बीच भेदभाव खड़ा करती है। इतना ही नहीं, स्त्री को पुरुष के सामने तुच्छ भी ठहराती है। व्याकरण का पुरुषवादी होना भले मूलत: भाषा (या भाषिक समाज) के पुरुषवादी होने का कुफल हो, पर वह वैयाकरणों की पुरुषवादी मानसिकता का भी कुपरिणाम है । १

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग