December 06, 2016

ताज़ा खबर

 

स्मरण: पत्रकारिता के तरुतात

विद्यार्थीजी का जन्म 26 अक्तूबर 1890 को इलाहाबाद के अतरसुइया मुहल्ले में हुआ था।

Author October 23, 2016 01:05 am
गणेश शंकर विद्यार्थी ।

आनंद शुक्ल

गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम बीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक सक्रिय, निर्भीक और जनप्रिय पत्रकारों में शुमार होता है। वे स्वाधीनता आंदोलन के सच्चे सेनानी थे और पत्रकारिता उनके लिए एक मिशन थी। विद्यार्थीजी का जन्म 26 अक्तूबर 1890 को इलाहाबाद के अतरसुइया मुहल्ले में हुआ था। उनका आरंभिक जीवन सांची और विदिशा के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिवेश में बीता। मिडिल की परीक्षा पास करने के बाद वे बडे भाई शिवव्रत नारायण के पास कानपुर आ गए। 1907 में आगे की पढाई के लिए कायस्थ पाठशाला इलाहाबाद चले गए। यहीं उनके भावी व्यक्तित्व का निर्माण हुआ। पत्रकारिता, लेखन कर्म और समाज सेवा की अलख यहीं जगी। आरंभ में कर्मयोगी और उर्दू ‘स्वराज’ अखबार में लिखने के बाद वे हिंदी की पत्रकारिता से जुड़ते चले गए।

विद्यार्थी का पत्रकार जीवन में बाकायदा प्रवेश 2 नवंबर 1911 से ‘सरस्वती’ में सहायक संपादक के रूप में हुआ। कानपुर में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सान्निध्य में उन्होंने आरंभिक दीक्षा ग्रहण की, लेकिन ‘सरस्वती’ का विशुद्ध साहित्यिक रुझान और विद्यार्थी की राजनीतिक अभिरुचि में तालमेल नहीं बैठ सका। दिसंबर, 1912 में वे ‘अभ्युदय’ में चले गए, जहां 23 सितंबर, 1913 तक कार्यरत रहे। 9 नवंबर, 1913 को उन्होंने कानपुर से हिंदी साप्ताहिक ‘प्रताप’ का प्रकाशन शुरू किया। अपने प्रवेशांक से ही ‘प्रताप’ ने जिस उच्च स्तर पर राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति की थी वह उसके पूरे प्रकाशन काल में निरंतर सृदृढ़ और मुखर होती गई। विद्यार्थीजी किसी भी प्रकार के मतवाद और वैचारिक संकीर्णता से मुक्त थे। वे स्वाधीनता संग्राम के सक्रिय सेनानी और उदार मानवीय चेतना से युक्त थे। उन्होंने पत्रकारिता के उच्च आदर्शों और आचरण की श्रेष्ठता का मानदंड स्थापित करते हुए ‘प्रताप’ के प्रवेशांक में लिखा,‘किसी की प्रशंसा या अप्रशंसा, किसी की प्रसन्नता या अप्रसन्नता, किसी की घुड़की या धमकी, हमें अपने मार्ग से विचलित न कर सकेगी। सांप्रदायिक और व्यक्तिगत झगड़ों से प्रताप सदा अलग रहने की कोशिश करेगा। उसका जन्म किसी विशेष सभा, संस्था, व्यक्ति या मत के पालन-पोषण, रक्षा तथा विरोध के लिए नहीं हुआ है किंतु उसका मत स्वातंत्र्य विचार और उसका धर्म सत्य होगा।’

उनका मानना था कि कुछ लोग निहित स्वार्थों के लिए देश की साधारण जनता को धर्म और ईमान के नाम पर विभाजित कर रहे हैं। 27 अक्तूबर 1924 को प्रकाशित आलेख ‘धर्म की आड़’ में उन्होंने लिखा, ‘धर्म के नाम पर, कुछ इने-गिने आदमी अपने हीन स्वार्थों की सिद्धि के लिए, करोड़ों आदमियों की शक्ति का दुरुपयोग किया करते हैं।…’ अपने मत को और अधिक स्पष्ट करते हुए 1925 के कौंसिल चुनाव के समय बनारसीदास चतुर्वेदी को प्रेषित पत्र में लिखा,‘मैं हिंदू-मुसलमानों के झगडेÞ का मूल कारण इलेक्शन आदि को समझता हूं और कौंसिल में जाने के बाद आदमी देश और जनता के काम का नहीं रहता।’
वे स्वाधीन भारत के स्वप्न के साकार होने में सांप्रदायिकता और जातीयता की समस्या को सबसे बड़ी बाधा के रूप में देखते थे। विद्यार्थीजी के बहुआयामी व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि उन्होंने सामाजिक-राजनीतिक जीवन में अत्यधिक सक्रियता के बावजूद साहित्य और संस्कृति की परंपरा को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ा। उन्होंने भाषा की आजादी को देश की आजादी से अधिक अहम माना था। उनका लेखन केवल राजनीतिक विषयों तक सीमित नहीं था, बल्कि समय मिलने पर वे वैचारिक और रचनात्मक लेखन भी करते रहे। महाराणा प्रताप, दादाभाई नौरोजी, महात्मा गोखले, लोकमान्य तिलक, कर्मवीर गांधी आदि महापुरुषों पर लिखे रेखाचित्र, हाथी की फांसी नामक कहानी, विक्टर ह्यूगो के उपन्यासों के ‘आहुति’ और ‘बलिदान’ नाम से किए गए अनुवाद, जेल जीवन के अनुभव आदि रचनाएं विद्यार्थीजी की रचनात्मक सामर्थ्य का प्रमाण हैं।

निसंदेह वे अपने दौर के सर्वाधिक सक्रिय, संघर्षशील, निर्भीक, स्पष्टवादी और जनप्रिय पत्रकार थे। पत्रकारिता उनके लिए सामाजिक राजनीतिक सरोकारों की सकर्मक अभिव्यक्ति का सार्थक माध्यम और निष्काम कर्म के रूप में हमेशा नैतिक और मानवीय पक्षधरता के आदर्शों का प्रतिरूप रही। ‘प्रताप’ के 3 मई, 1920 में प्रकाशित लेख ‘सुगमता की माया’ में उन्होंने लिखा, ‘काम करने के दो मार्ग हैं। एक तो यह कि आगे बढ़ा जाए, लेकिन आदि से लेकर अंत तक नैतिक आधार न छोड़ा जाए। दूसरा यह कि काम हो, और फिर चाहे जिस तरह, नैतिक आधारों के बल से या उन्हें छोड़कर। पहले ढंग से काम करने वाले अपनी दृष्टि से अपने नैतिक सिद्धांतों को रखते हैं। वे उन उसूलों के बल पर जीते हैं और उन्हीं पर मरने के लिए तैयार रहते हैं। वे उसूलों पर शहीद होकर अपनी लाशों का जीना तैयार करते हैं और ऊपर चढ़ने की लालसा रखने वाले पथिक को इस जीने पर कदम रखते हुए आकाशचुंबी चोटी पर पहुुंच जाने का प्रबल संदेश देते हैं। पहला ढंग मन को ऊपर चढ़ने के लिए मार्ग देता है, दूसरा अंत में उसे नीचे उतरने के लिए विवश करता है। पहला, समाज में विश्वास और निर्भयता का साम्राज्य स्थापित करता है, दूसरा मनुष्य को मनुष्य पर बिल्कुल अविश्वास करना सिखाता है और समाज में भय और कायरता का संचार करता है। आदर्शों पर मरना और उसके लिए जीना उन लोगों की दृष्टि में केवल मूर्खता है जिन्हें सुगमता प्रिय है, और जो हाथ के पास का लाभ ही देख सकते हैं, और जिनकी संख्या अब दिन-दिन बढ़ती ही जाती है।’

उन्होंने जिस मिशनवादी पत्रकारिता का नेतृत्व किया था, उसमें आई कमजोरी के प्रति भी वे जागरूक थे। विद्यार्थीजी के जेल जाने पर ‘प्रताप’ के संपादन का दायित्व कृष्णदत्त पालीवाल, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी, प्रकाशनारायण शिरोमणि, श्रीनिवास बाला जी हार्डीकर आदि ने भली-भांति संभाला। विद्यार्थीजी की शहादत के बाद बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ के संपादकत्व में ‘प्रताप’ स्वाधीनता संघर्ष में पूरी तेजस्विता और प्रखरता के साथ सक्रिय भूमिका निभाता रहा। पत्रकारों की यह पीढ़ी पत्रकारिता के मिशनवादी आग्रहों को आगे भी बढ़ाना चाहती थी, हालांकि व्यावसायिकता के दबाव वे महसूस कर रहे थे और इसके दुष्परिणामों और दूरगामी प्रभावों को समझ रहे थे। विद्यार्थीजी ने अपने जीवनकाल में ही पत्रकारिता के आदर्शों और मानकों में आई कमजोरी को लक्षित करते हुए 1930 में प्रकाशित विष्णुदत्त शुक्ल की पुस्तक ‘पत्रकार कला’ की भूमिका में लिखा था, ‘अब बहुत से समाचार पत्र सर्व साधारण के कल्याण के लिए नहीं रहे, सर्वसाधारण उनके प्रयोग की वस्तु बनते जा रहे हैं। इसके दो मुख्य कारणों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा कि अधिकांश बड़े समाचार-पत्र धनी मानी लोगों द्वारा संचालित होते हैं, दूसरे, पत्रकार का दुर्बल व्यक्तित्व, उसकी दायित्व विमुखता और धन लिप्सा।’

एक सजग और कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार के रूप में उन्होंने कामना की थी कि पैसे का मोह और बल की तृष्णा भारतवर्ष के किसी भी नए पत्रकार को ऊंचे आचरण के पवित्र आदर्श से बहकने न दे। उनकी अगुआई में ‘प्रताप’ निरंतर चुनौतियों का सामना करते हुए स्वाधीनता आंदोलन का ध्वजवाहक पत्र बना रहा। 23 मार्च, 1931 को सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी हुई। कानपुर हिंदू-मुस्लिम दंगे की आग में जल उठा। 24 मार्च को दंगों का रूप और विकराल हो गया। विद्याथीर्जी लोगों को शांत करने और सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए सक्रिय हुए। 25 मार्च, 1931 को कानपुर के चौबे गोला इलाके में उन्हें अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। 27 मार्च को उनका शव अस्पताल में ढूंढ़ा जा सका और 29 मार्च को गुपचुप उनका अंतिम संस्कार करा दिया गया।

वे आजीवन सभी प्रकार के सत्ता प्रतिष्ठानों के विरुद्ध संघर्षरत रहे। विद्यार्थीजी का अंतिम अग्रलेख था- ‘अंत का आरम्भ’। वे लिखते हैं, ‘निराश होने की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार की प्रत्येक घटना जिसकी भयंकरता से हृदय कांप उठे, जिसकी कटुता भावी संतति के लिए कलेजा छेदने वाली कही जा सके, आशा और शुभ संदेश की वाहिनी है। देश में जिस स्वाधीनता का जनम हो रहा है, यह उसी की प्रसव-वेदना है।’ उनकी शहादत ने सामाजिक सद्भाव की अनूठी मिसाल कायम की। महात्मा गांधी ने विद्यार्थीजी की शहादत पर कहा था,‘ गणेशशंकर विद्यार्थी एक मूर्तिमान संस्था थे। उन्हें ऐसी मृत्यु मिली, जिस पर हम सबको स्पर्धा हो।’

आज हिंदी पत्रकारिता प्रगति के पथ पर आगे बढ़ी है, उसके कलेवर में बदलाव आया है, वह लोकतंत्र का मजबूत आधार स्तंभ भी है, लेकिन कहीं न कहीं वह उन आदर्शों, मान्यताओं और मूल्यों के संदर्भ में विचलन का शिकार हुई है जिसकी स्थापना स्वाधीनता पूर्व की पीढ़ी ने की थी। आज हिंदी पत्रकारिता के लिए सबसे आवश्यक है विश्वसनीयता का निर्माण करना, जिसके माध्यम से पाठक को जोड़ा जा सकता है। हिंदी के कई पत्र और पत्रिकाएं इस दिशा में कार्य कर रही हंै। अभी भी कुछ साहित्यकार, पत्रकार और संस्कृतिकर्मी हैं जो साहित्य, पत्रकारिता और कला के क्षेत्र में लोकोन्मुखता की अपनी पुरानी परंपरा को जीवित करने की चेष्टा के साथ ही उसके मूलगामी आशयों को समझने की कोशिश भी कर रहे हैं।

वर्तमान संदर्भों में हम देख रहे हैं कि अवसरवादी राजनीति, धार्मिक कट्टरता, उग्र जातीयता और बाजारवादी संस्कृति हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को प्रभावित करने का कुचक्र रच रही है। अगर आज की युवा पत्रकार पीढ़ी आजादी के पहले की पीढ़ी को अंतर्मन से जानने, समझने और आत्मसात करने का प्रयास करेगी तो न केवल वर्तमान दौर की चुनौतियों का डटकर मुकाबला करने में सफल होगी बल्कि एक स्वस्थ जनतांत्रिक, समता मूलक और विकसित समाज और राष्ट्र के निर्माण में सार्थक पहल कर सकेगी। इस दिशा में विद्यार्थीजी के सोद्देश्य जीवन, निष्काम कर्मठता और विकासोन्मुख भविष्य दृष्टि से सर्वाधिक मदद मिल सकती है। ०

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on October 23, 2016 1:05 am

सबरंग