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मुद्दा- कृषि उपज की कीमत का सवाल

मध्यप्रदेश के मंदसौर से शुरू हुए किसान आंदोलन की आंच पूरे देश में महसूस की जाने लगी है। किसानों की मांग है कि उन्हें अपनी फसल का वाजिब मूल्य मिले और ऋण माफी किया जाए।
Author July 2, 2017 01:08 am
किसानों की कर्मभूमि रहा पंजाब आज उनकी मरनभूमि बन रहा है।

हितेंद्र श्रीवास्तव

मध्यप्रदेश के मंदसौर से शुरू हुए किसान आंदोलन की आंच पूरे देश में महसूस की जाने लगी है। किसानों की मांग है कि उन्हें अपनी फसल का वाजिब मूल्य मिले और ऋण माफी किया जाए। किसानों को फसल उगाने से लेकर बेचने तक तरह-तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सरकारी मशीनरी को किसानों की इन समस्याओं के बारे में पता है, लेकिन बाजार की शोषणकारी शक्तियों के सामने जैसे वे बेबस हैं। देश में फसलों के मूल्यों में उतार-चढ़ाव पर नजर डालें तो कुछ साल बाद किसी खास फसल का दाम बहुत ऊपर चला जाता है। लोगों के अत्यधिक परेशान होने पर सरकारी मशीनरी हरकत में आती है। आमतौर पर अगली फसल आने तक उसके दाम ऊपर रहते हैं। फिर कुछ समय बाद खबरों की सुर्खियां बनती हैं कि अमुक फसल का मुनासिब दाम नहीं मिल रहा और किसान उसे नष्ट कर रहे हैं। यानी किसानों ने फसल बोने में बीज, पानी, खाद आदि पर जितना खर्च किया है, वह तक निकालना मुश्किल है। ऐसे में किसानों को खून के आंसू तक रोने पड़ते हैं। फसलों के दाम अत्यधिक घटने या बढ़ने पर कृषि उत्पादों के विपणन से जुड़ा एक तबका हमेशा सरकार की लचर नीतियों के कारण फायदा उठा लेता है।

फसल के थोक व्यापार से जुड़े लोग खेत में फसल पकते ही अनुमान लगाते हैं कि बाजार में कितनी फसल है, उसकी कितनी मांग है और कितनी नई फसल आने वाली है। एक तरह से थोक व्यापार से जुड़े लोग सामूहिक रूप से सोची-समझी साजिश के तहत फसलों की खरीद-फरोख्त करते हैं। इनका मकसद यह होता है कि अगर बाजार की मांग से कम फसल आ रही है, तो उसे किसी भी भाव पर खरीद लिया जाए और फिर बाजार में दाम बढ़ने पर उसे महंगे दामों पर बेचा जाए। जैसे देश में प्राकृतिक कारणों से फसल खराब होने पर सब्जियों के दाम 1979, 1983, 1987, 1997-98 और 2011 में अत्यधिक बढ़ गए थे। फसलों के दाम अत्यधिक बढ़ने पर जब तक सरकार हरकत में आती है, तब तक इस धंधे से जुड़े कुछ मुनाफाखोरों के वारे-न्यारे हो जाते हैं। फसलों के दाम बढ़ने पर किसानों को तो ज्यादा फायदा नहीं होता, पर मांग और आपूर्ति सामान्य होने पर भी कभी-कभी खासी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। मंडियों में थोक व्यापारी किसानों की मजबूरी का पूरा फायदा उठाते हैं, क्योंकि उन्हें यह मालूम होता है कि किराया भाड़ा खर्च करके फसल मंडी तक लेकर आने वाला किसान इसे बेच कर ही जाएगा। इसलिए उत्तर भारत की कई थोक मंडियों में व्यापारी लगी-बंधी चाल के तहत उपज को खराब या दाम गिरा हुआ बता कर बहुत कम दाम लगाते हैं। इसके लिए थोक व्यापारियों ने अपने गुप्त इशारे तक बना रखे हैं। मसलन, कुछ मंडियों में थोक व्यापारी रूमाल निकालने के बहाने अंगूठे के पास वाली उंगली के नीचे वाले जोड़ से अंगूठे को छूते हैं और उससे आहिस्ता-आहिस्ता ऊपर की तरफ लेते हैं, जिसे देख कर आसपास खड़े आढ़ती फसल के दाम बढ़ाते हैं। जैसे ही संबंधित व्यक्ति इस अंगुली के सबसे ऊपर वाले हिस्से को छूता है, तो आसपास के लोग उसके बाद फसल का दाम एक रुपया तक नहीं बढ़ाते। ऐसे में किसान को फसल घर वापस लेकर जाने का भी किराया खर्च करना पड़ता है। इसलिए किसान को औने-पौने दाम पर फसल बेचनी पड़ती है।

फसल बेचने के बाद किसान जब बीज, खाद, कीटनाशक आदि खरीदने के लिए बाजार का रुख करता है तो वहां भी उसे विभिन्न तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कृषि उत्पाद से जुड़ी कई कंपनियों ने अपनी धुआंधार मार्केटिंग करनी शुरू कर दी है। ये छोटे दुकानदारों को अच्छा कमीशन देती हैं। किसान को अपनी फसल पक कर आने पर पता चलता है कि वह उत्पाद कैसा था। तब तक ऐसी कंपनियों की नजर किसी दूसरे क्षेत्र के किसानों पर केंद्रित हो जाती है या वे कुछ साल बाद नाम बदलकर अपने उत्पाद को बेचने लगती हैं। क्षेत्रीय मीडिया समय-समय पर नकली बीज, खाद, कीटनाशक की खबरें छापता रहता है। स्वाभाविक है कि नकली बीज, खाद, कीटनाशक के लिए किसान को पैसा पूरा या कुछ कम देना पड़ता है, लेकिन फसल का हश्र क्या होता है, इसका अंदाजा हमारे हुक्मरान नहीं लगा पाते या नहीं लगाते हैं।फसल पक कर बाजार में आने से पहले ही वायदा कारोबारी अपने लाभ का चक्रव्यूह रच चुके होते हैं। वायदा कारोबार में फसल आने से पहले ही अनुमान के आधार पर दाम तय हो जाता है। जब वायदा कारोबार शुरू किया गया था तो यह तर्क दिया गया था कि इससे किसानों को अपनी फसल के मुनासिब दाम मिलने में मदद मिलेगी। लेकिन हश्र कुछ और हुआ है। वायदा कारोबार से जुड़ी कंपनियां इसी जुगत में लगी रहती हैं कि भारत से आयात-निर्यात होने वाली फसल, वैश्विक मांग और देश में उसके उत्पादन का अंदाजा लगा कर खरीद-फरोख्त कर सकें। इसमें उनका एकमात्र ध्येय किसी खास फसल की मांग और आपूर्ति का अंदाजा लगा कर लाभ कमाना होता है। वायदा कारोबार का सबसे ज्यादा फायदा उससे जुड़ी कंपनियां कमाती हैं। उत्तर भारत की वायदा कारोबार की कुछ कंपनियों का हाल यह है कि उनका कारोबार बीते कुछ वर्षों में कई गुणा बढ़ गया है।

देश के कृषि वैज्ञानिक और अन्य विशेषज्ञ लंबे अरसे से इन मुद्दों को उठाते रहे हैं, लेकिन सरकारी मशीनरी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहती है। ऊपर से किसानों की खेती की जमीन अधिगृहित होने का खतरा भी मंडराता रहता है। किसानों से सस्ती दर पर जमीन खरीद कर आवासीय परिसर या रुपए उगलने वाली फैक्टरियां बनवाई जाती हैं। किसान या उनके परिवार के सदस्य सोशल मीडिया या सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने लगे हैं। ऐसे में उन्हें अपने साथ होने वाले कपट की जानकारी अब आसानी से मिलने लगी है। लिहाजा सरकार को सूचना प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया का इस्तेमाल किसानों की समस्याओं के निदान में करना चाहिए। जैसे सरकार सूचना प्रौद्योगिकी की मदद से किसानों को तेजी से सही ढंग से यह सूचना पहुंचा सकती है कि कौन-सी फसल की बुआई कितनी हो चुकी है ताकि किसान भेड़ चाल की तरह उस फसल को न लगाए। सरकार यह काम कर रही है, लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी की मदद से इसे कहीं बेहतर ढंग से अंजाम दिया जा सकता है। मंडी में किसानों को फसल का कम मूल्य मिलने की तकलीफ से बचने के लिए जगह-जगह सप्ताह में एक दिन किसान बाजार लगाए जा सकते हैं। इस तरह का प्रयोग देश में हस्त शिल्पियों के लिए कुछ जगहों पर किया गया है, लेकिन इसका फायदा हस्त शिल्पियों की आड़ में दुकानदार जगह पा जाते हैं। लिहाजा सरकार जब भी किसानों के लिए शहरों या बड़े शहरों में ऐसे बाजार लगाए, तो यह सुनिश्चित करे कि इसका फायदा किसान को ही मिले। किसानों को अपनी उपज की वाजिब मूल्य मिले, इसको लेकर विभिन्न उपजों में न्यूनतम समर्थन मूल्य की आवाज जोरदार ढंग से उठने लगी है। इस पर सरकार को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में कृषि उत्पादों को बेहतर ढंग से प्रसंस्कृत कर सरकार कुछ सहजता से न्यूनतम समर्थन मूल्य दे सकती है। ०

 

 

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