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चिंता: महामारी बनती एक बीमारी

2014 में इन देशों ने एड्स पीड़ित मरीजों के इलाज पर 19.2 अरब डॉलर खर्च किया।
प्रतिकात्मक चित्र।

केंद्र सरकार ने एचआइवी और एड्स पीड़ितों से भेदभाव करने पर दो साल की कैद और एक लाख रुपए के जुर्माने का प्रावधान कर एक मानवीय पहल की है। एचआइवी एवं एड्स विधेयक, 2014 को मंजूरी मिलने के बाद अब कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों, घर खरीदने या किराए पर घर लेने और बीमा संबंधी मामलों में अगर कोई एड्स पीड़ितों की उपेक्षा करता है तो कानून के मुताबिक वह दंड का भागीदार होगा। विधेयक में प्रावधान किया गया है कि सौ कर्मचारियों वाले संगठनों में पीड़ितों की शिकायतों को देखने के लिए एक शिकायत अधिकारी रखना होगा और साथ ही राज्यों को भी कानून का उल्लंघन देखने के लिए लोकपाल की नियुक्ति करनी होगी। एचआइवी से संक्रमित लोगों की सूचना का रिकार्ड रखने वाले संस्थानों को डेटा संबंधी कदम उठाने होंगे। प्रस्तावित कानून के अनुसार अठारह साल से कम उम्र के एचआइवी पीड़ित को साझे घर में रहने और घर की सुविधाओं का उपयोग करने का अधिकार होगा और उन्हें तब तक एचआइवी संबंधी स्थिति के बारे में खुलासा करने के लिए विवश नहीं किया जा सकेगा जब तक की उनकी सहमति न हो।

निसंदेह इस कानून के आकार लेने के बाद एड्स पीड़ितों के साथ उपेक्षा का बर्ताव थमेगा और वे स्वाभिमानपूर्वक अपनी जिंदगी जी सकेंगे। बेहतर होगा कि सरकार एड्स पीड़ित हर मरीज का इलाज करने और जागरूकता फैलाने के लिए भी ठोस कदम बढ़ाए ताकि भारत से एड्स को मिटाया जा सके। यह पहल इसलिए आवश्यक है कि जागरूकता और सतर्कता के कार्यक्रम के बावजूद एड्स का संक्रमण तेजी से बढ़ता जा रहा है। वैश्विक आंकड़ों पर गौर करें तो मौजूदा समय में लातीनी अमेरिका में 17 लाख, पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया में 15 लाख, खाड़ी देश और उत्तर अफ्रीका में 2.8 लाख, पूर्वी, मध्य यूरोप और उत्तरी अमेरिका में 24 लाख, एशिया और प्रशांत क्षेत्र में 50 लाख, कैरेबियाई देश में 2.4 लाख और उप-सहारा क्षेत्र में 2.58 करोड़ एचआइवी पीड़ित हैं।

भारत एचआइवी संक्रमित लोगों का तीसरा सबसे बड़ा घर बन चुका है। भारत में एचआइवी पीड़ितों की संख्या 21 लाख से अधिक है और उसमें तेजी से वृद्धि हो रही है। यानी एड्स महामारी का रूप ले चुका है और उससे निपटना एक बड़ी चुनौती बन गया है। एड्स किस तरह जानलेवा साबित हो रहा है इसी से समझा जा सकता है कि पिछले साल इससे दुनिया भर में ग्यारह लाख लोगों की मौत हुई और हर वर्ष लाखों लोग इसकी चपेट में आ रहे हैं। विडंबना यह कि एड्स अब सीमित समूहों और शहरों तक सीमित न रहकर गांवों और कस्बों को भी अपने जद में लेने लगा है। त्रासदी यह कि एड्स पीड़ितों में तकरीबन 1.9 करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्हें पता ही नहीं कि वे एचआइवी संक्रमित हैं। यह स्थिति एड्स के खिलाफ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अभियान की गंभीरता और सफलता की पोल खोलता है। लेकिन अच्छी बात यह है कि एड्स से निपटने के लिए अब धन की कमी आड़े नहीं आ रही है और मध्य आय वाले देशों ने एड्स से निपटने के लिए 2020 तक 26 अरब डॉलर खर्च करने की कार्ययोजना तैयार करने के अलावा 90 फीसद मरीजों तक पहुंचने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

2014 में इन देशों ने एड्स पीड़ित मरीजों के इलाज पर 19.2 अरब डॉलर खर्च किया। लेकिन विडंबना यह है कि एड्स से बचाव के लिए सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर जागरूकता कार्यक्रमों में तेजी के बाद भी बचाव की दर सिर्फ 0.34 फीसद ही है। बेहतर होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ, सरकारें और स्वयंसेवी संस्थाएं एड्स से बचाव के प्रभावी कदम उठाने के साथ ही लोगों को यह भी बताएं कि एड्स क्या है। यह सच्चाई है कि एड्स के बारे में लोगों को पर्याप्त जानकारी नहीं है और उसी का नतीजा है कि 1981 में एड्स की खोज से अब तक लगभग तीस करोड़ लोगों की जान जा चुकी है। आमतौर पर एड्स के संक्रमण की तीन मुख्य वजहें हैं-असुरक्षित यौन संबंध, रक्त का आदान प्रदान और मां से शिशु में संक्रमण। लेकिन यूनिसेफ की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में एड्स के तेजी से बढ़ते संक्रमण का एक अन्य कारण लोगों की बदलती जीवन शैली और युवाओं में रोमांच के लिए जोखिम लेने की प्रवृत्ति भी है।

चिकित्सा वैज्ञानिकों की मानें तो भारत में 85.6 फीसद एड्स पाश्चात्य जीवन पद्धति अपनाने से फैल रही है। इस लिहाज से 24 से 45 साल के आयु के लोगों के इस बीमारी की चपेट में आने की आशंका सदैव बनी रहती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि एचआइवी संक्रमण की सबसे ज्यादा संभावना संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन संपर्क से होती है। लेकिन आश्चर्य है कि सुरक्षित यौन संबंध के प्रचार-प्रसार के बावजूद लोग चेतने को तैयार नहीं। युवा वर्ग तो और भी गंभीर नहीं है। विभिन्न सर्वेक्षणों के आंकड़े बताते हैं कि देश के बड़े महानगरों में संक्रमित यौनकर्मियों की तादाद में लगातार इजाफा हो रहा है। 2003 के एक सर्वेक्षण के मुताबिक मुंबई के 70 फीसद यौनकर्मियों के शरीर में एचआइवी वायरस पाया गया है।

इ सी तरह सूरत में किए गए एक सर्वेक्षण से खुलासा हुआ कि वहां के यौनकर्मियों में 1992 में 17 फीसद के शरीर में एचआइवी वायरस था जबकि 2001 में बढ़कर 43 फीसद हो गया। यह एक खतरनाक संकेत है। देखा जाए तो इस स्थिति के लिए एड्स के विरुद्ध अभियान को गंभीरता से न लिया जाना ही मुख्यरूप से जिम्मेदार है। 2001 में राष्ट्रीय आचरण सर्वेक्षण (नेशनल बिहैवियर सर्वे) में पचासी हजार लोगों से उनके यौन आचरण से जुड़े सवाल पूछे गए। इनमें पचास फीसद से अधिक लोग 25 से 40 वर्ष के थे। उन्होंने बताया कि उन्हें एड्स के बारे में बहुत कम जानकारी है। बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश में सिर्फ साठ फीसद लोगों ने ही एड्स का नाम सुना था। सर्वे के मुताबिक देश के अन्य हिस्सों में भी एड्स संबंधी जानकारी सिर्फ 70 से 80 फीसद लोगों को थी। यही नहीं वे इस जानकारी से भी वंचित थे कि एड्स यौन संपर्क से भी होता है। 90 फीसद लोगों का मानना था कि एड्स मच्छर के काटने से भी हो सकता है। यह सर्वेक्षण रेखांकित करता है कि देश के एक बड़े हिस्से में आज भी लोगों के बीच एड्स के बारे में समुचित जानकारी का अभाव है। एचआइवी के संक्रमण का दूसरा सबसे बड़ा प्रमुख कारण रक्त संक्रमण माना जाता है। यह किसी से छिपा नहीं है कि चेतावनी के बावजूद देश के अस्पतालों में एचआइवी संक्रमित व्यक्ति द्वारा इस्तेमाल की हुई सुई का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है जिससे एचआइवी का जोखिम बढ़ता जा रहा है।

देश में इक्कीस हजार बच्चे प्रतिवर्ष माता-पिता के कारण एचआइवी संक्रमण का शिकार होते हैं। एचआइवी का संक्रमण रोकने के लिए 2006 में नेशनल पीडियाट्रिक एंटीरेट्रो तकनीकी आरंभ हुआ। अब तक देश में इसके चार सौ से अधिक एआरटी सेंटर भी स्थापित हो चुके हैं। लेकिन इस तकनीक के बाद भी आज बचाव की दर सिर्फ 0.2 फीसद है। इसे ध्यान में रखते हुए रिपोर्ट में इस जानलेवा महामारी से बचने के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं को अमल में लाने के साथ ही सामाजिक कार्यक्रमों और शिक्षा के जरिए इसके रोकथाम के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत पर बल दिया गया है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय समाज में यौन विषयों पर चर्चा शुरू से वर्जना का विषय रहा है और जिसका नतीजा यह है कि लोगों के बीच एड्स को लेकर भ्रम की स्थिति है। यही नहीं समाज में इस बीमारी से ग्रसित लोगों से असहिष्णुता का व्यवहार किया जाता है।  यह मानवता के विरुद्ध है। हालांकि अब लोगों में एड्स और इससे पीड़ित लोगों को लेकर जागरूकता और संवेदनशीलता दोनों बढ़ी है। आमजन को समझना होगा कि एड्स स्वयं में कोई रोग नहीं बल्कि एक संलक्षण है जो मनुष्य की अन्य रोगों से लड़ने की क्षमता को घटा देता है। बेहतर होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व के सभी देश और स्वयंसेवी संस्थाएं एड्स की रोकथाम के लिए लोगों को जागरूक बनाएं और साथ ही प्रभावी इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित करें। ०

 

 

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First Published on October 9, 2016 12:04 am

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