December 04, 2016

ताज़ा खबर

 

संचार: पढ़ने का बदलता चलन

इ-बुक्स ने पुस्तक बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। किताबों की बिक्री घट रही है।

Author नई दिल्ली | November 20, 2016 01:31 am
प्रतीकात्मक तस्वीर ।

कविता भाटिया

इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने पारंपरिक माध्यमों को हाशिए पर धकेल दिया है। अब संप्रेषण के रूप बदल गए हैं। बीते वर्षों में उभरे नए संचार माध्यमों के चलते पठन-पाठन के तरीके भी बदल रहे हैं। आज मुद्रित पुस्तकों, पाठ्य पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं के विकल्प मौजूद हैं। ऐसे में यह चिंता वाजिब है कि क्या छपी हुई किताबों का अंत नजदीक है? एक वह भी दौर था, जब बच्चों को जन्मदिन पर कॉमिक्स उपहार में दिए जाते और वे फूले नहीं समाते थे। गरमी की छुट्टियां शुरू होने से पहले ही पत्रिकाएं खरीद ली जाती थीं। पास-पड़ोस के मित्रों से भी पुस्तकें मिल-बांट कर पढ़ने का चाव होता था। पड़ोस की कोई बड़ी दीदी अक्सर छोटे बच्चों को इकट्ठा कर कहानियां सुनाया करती थी, जिनमें जीवन की सीख और नैतिक शिक्षा भी सम्मिलित रहती थी। समय बदला और नब्बे के दशक में कॉमिक्स के पात्र टेलीविजन और वीडियो गेम्स में साकार हो गए। मनोरंजन के नए माध्यमों के रूप में हर मोहल्ले में वीडियो गेम्स के पार्लर खुल गए और इस तरह उसने बच्चों में लोकप्रियता हासिल की।

आज नव-विकसित संचार के माध्यम एक तरह की पॉपुलर संस्कृति रच रहे हैं। हम अपने आसपास, घर-बाहर, ट्रेन, बसस्टॉप, मेट्रो और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर लोगों को अपने मोबाइल या टैब पर अंगुलियां फिराते देख सकते हैं, किसी समाचारपत्र या पत्रिका के पन्ने पलटते नहीं। आज अधिकतर पुस्तक बिक्रेता बताते हैं कि बच्चों की किताबों की बिक्री में काफी कमी आई है। किताबों के बजाय बच्चों के हाथों में टैब है। आज टेलीविजन पर पौराणिक, ऐतिहासिक धारावाहिकों को चलते देख बच्चा नाक-भौं सिकोड़ लेता है। उसे सामान्य ज्ञान भी रट कर जाना पड़ता है।

आज पुस्तक प्रदर्शनी और पुस्तक मेलों में भीड़ आश्वस्ति जरूर देती है, पर किताबों की बढ़ती कीमतें अवश्य निराश करती है। यह सच है, अब भी बाल और किशोर साहित्य पर काम करने की जरूरत है। बाल पत्रिकाओं की औपचारिक शुरुआत भारतेंदु काल से मानी जाती है। सन 1882 में ‘बालदर्पण’ और फिर ‘बालाबोधिनी’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। इन पत्रिकाओं में नैतिक मूल्यों को केंद्र में रखकर उपदेशात्मक सामग्री प्रकाशित की जाती थी। बाद के समय में प्रकाशित पत्रिकाओं में शावक, पराग, मधुमुस्कान, चंदामामा, गुड़िया, बालभारती, नंदन, चंपक आदि प्रमुख रही। इन पत्रिकाओं में कहानियों के अलावा हास्यकथाएं, चुटकुले, चित्रकथाएं और बच्चों की रचनात्मकता को उभारने के लिए बालपहेली, रंग भरो, कहानी लिखो और सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता भी सम्मिलित रहती है। ‘चकमक’ में सरल ढंग से विज्ञान संबंधी जानकारियां दी जाती हैं।

दरअसल, किताबें हमारे लिए एक नई दुनिया रचती हैं। जब कोई पाठक कहानी पढ़ता है तो वह उस कहानी के विभिन्न पात्रों, परिस्थितियों और दृश्यों की एक छवि भी अपने मन में गढ़ता है। इस प्रकार पाठक लेखक द्वारा गढ़े गए पात्रों के लिए एक नई सोच गढ़ता है। मगर आज की आभासी दुनिया ने नई पीढ़ी की स्वतंत्र सोच को बुरी तरह प्रभावित किया है, क्योंकि यह पीढ़ी किताबों से कटी हुई है। आज की व्यस्ततापूर्ण जिंदगी में आॅनलाइन पुस्तकें खरीदने और विभिन्न एप्स द्वारा पुस्तकें डाउनलोड कर पढ़ने का चलन बढ़ रहा है। समय और पैसे की कमी के कारण भी इ-पुस्तकों का चलन विस्तार पा रहा है।

दिल्ली में सितंबर 2012 के पुस्तक मेले में इ-बुक्स को अपनी थीम बना कर भारतीय प्रकाशकों ने ई-बुक्स में अपनी रुचि प्रकट की थी। अब बदलते समय में मोबाइल या टैब के एक क्लिक पर मनपसंद पुस्तक हाथ में उपस्थित है। इ-बुक्स ने पुस्तक बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। किताबों की बिक्री घट रही है। अब विद्यार्थी केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए ही पुस्तकें खरीदता है। पढ़ने या पुस्तकालय के लिए साहित्य की किताबें पाठकों की निगाह जोहती रह जाती हैं। इस तरह निस्संदेह डिजिटल दुनिया का बढ़ता विस्तार पारंपरिक किताबों के लिए चुनौती बन रहा है।

आज सोशल मीडिया के विभिन्न एप्स बच्चों में दोस्त बनाने, विचार शेयर करने के लिए खूब प्रचलित है। ‘क्लब पेंग्विन’ नामक एक अनूठा चाइल्ड फ्रेंडली एप है, जो वर्चुअल दुनिया का सदस्य बना कर उनका मनोरंजन करता है। ऐसे विभिन्न मनोरंजन एप बच्चों को आउटडोर खेलों से दूर कर घर के एक कोने में कैद कर देते हैं, जहां बच्चा अपनी आभासी दुनिया में खोकर मस्त रहता है। ये एप्स बच्चों को एक नई दुनिया से अवश्य जोड़ते हैं, पर यथार्थ की जमीन से हटा कर। आज के बड़े होते बच्चों में से कितनों ने बाल-मनोविज्ञान से जुड़ी ‘ईदगाह’, ‘बड़े भाई साहब’, ‘पाजेब’ और ‘गिल्लू’ जैसी कहानियां पढ़ीं और उस पर विचार किया होगा।

पढ़ने के इन नए तरीकों के कारण बच्चों और युवाओं में आंखों का कमजोर होना, एकाग्रता में कमी, आरामपरस्ती, वयस्क उम्र की किताबों तक पहुंच जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं। आज विभिन्न एप्स, यू-ट्यूब और विभिन्न वीडियो गेम्स के कारण बच्चों में पढ़ने की आदत में भी कमी आई है। कोलटन ने कहा था- ‘सच्चे मित्र के चुनाव के बाद सर्वप्रथम और प्रधान जरूरत है- अच्छी और उत्कृष्ट पुस्तक का चयन।’ सत्य है कि पढ़ने की आदत बौद्धिक क्षमता में वृद्धि करती है, साथ ही व्यक्तित्व को भी समृद्ध करती है। पुस्तकें पढ़ने से उत्सुकता में वृद्धि होती है, वे पाठक की विश्लेषणात्मक क्षमता को विकसित करती है, भाषा को समृद्ध करती है और सबसे बड़ी बात यह कि एक अच्छे मनुष्य के रूप में उसकी संवेदनाओं का विस्तार होता है। पर आज संवेदना विकसित करने वाले साहित्य की जगह उपयोगिताप्रधान सामग्री पढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

सोशल मीडिया के विस्तार के कारण फेसबुक रीडिंग, ब्लॉग पोस्ट पढ़ने को एक तरह का स्टे््टस सिंबल माना जाता है। वर्चुअल दुनिया की इलेक्ट्रॉनिक कहानियों में थ्रिल, बेवजह ठूंसे अश्लीलता और हिंसा के तत्त्व मौजूद रहते हैं, जिस कारण आज की पीढ़ी में मूल्यों का ह्रास स्पष्ट देखा जा सकता है। तकनीक की दुनिया से बाहर आकर पुस्तकें पढ़ना अब उन्हें रुचिकर और आनंदप्रद नहीं लगता। इसी कारण बच्चों में साहित्य न पढ़ने की संस्कृति विकसित हो रही है। पढ़ने के पारंपरिक ढंग को धकिया कर उसका स्थान वर्चुअल रीडिंग ने ले लिया है। इंटरनेट ने एक नई पाठकीय दुनिया का निर्माण किया है।

आज पत्र-पत्रिकाओं के विभिन्न अंक कम्प्यूटर पर देखे जा सकते हैं। यही नहीं, अब तो बहुत से पुस्तकालय भी डिजिटल होने की प्रक्रिया में हैं। अब मुद्रण और प्रसारण माध्यम सभी इलेक्ट्रॉनिक हो गए हैं। तकनीकी विकास या डिजिटल तकनीक ने विभिन्न माध्यमों के बीच का अंतर ही समाप्त कर दिया है। यह सच है कि हर परिवर्तन अपने साथ कुछ सकारात्मक, तो कुछ नकारात्मक प्रभाव लेकर आता है। डिजिटल कम्प्यूटरीकृत तकनीक भी इसी प्रक्रिया में आया नव-परिवर्तन है, जिसने परपंरागत किताबों को एक नया चेहरा प्रदान किया है। आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों में अच्छा साहित्य पढ़ने की आदत बची-बनी रहे, वे अपनी संस्कृति, अपनी जड़ों से जुड़े रहें और व्यावसायिकता और गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में उनके आदर्श और संस्कार छीजे नहीं-संरक्षित और सुरक्षित रहें।

जानिए ATM और बैंकों के बाहर कतारों में खड़े लोग क्या सोचते हैं नोटबंदी के बारे में

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on November 20, 2016 1:21 am

सबरंग